संयुक्त राष्ट्र में भारत सहित 135 देशों ने खाड़ी देशों और जॉर्डन पर ईरानी हमलों की निंदा की तो नये सिरे से सवाल खड़ा हो रहा है कि अमेरिकी-इसराइल हमलों का क्या? अमेरिका-इसराइल ने हमले की शुरुआत की, छोटे बच्चों वाले स्कूल पर बमबारी की और लगातार हमले कर रहा है। एक दिन पहले ही रिपोर्ट आई है कि अमेरिकी सेना ने शुरुआती जाँच में स्कूल पर हमले में अमेरिका की ग़लती मानी है। स्कूल पर हमले में 175 लोग मारे गए हैं जिनमें ज़्यादातर बच्चे हैं। मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मुद्दे को उठाया है। तो क्या ईरान पर हमले को लेकर भी निंदा प्रस्ताव जैसा कुछ आएगा?
यह सवाल इसलिए क्योंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक अहम प्रस्ताव पारित किया, जिसमें ईरान के खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी देशों और जॉर्डन पर किए गए 'गंभीर' हमलों की कड़ी निंदा की गई है। भारत भी इस प्रस्ताव का सह-प्रायोजक है। यह प्रस्ताव बहरीन की अगुवाई में लाया गया था और कुल 135 देशों ने इसका समर्थन किया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य देश हैं। इस प्रस्ताव पर वोटिंग हुई, जिसमें 13 वोट पक्ष में पड़े, कोई वोट विरोध में नहीं था, जबकि स्थायी सदस्य चीन और रूस ने मतदान से परहेज किया। अमेरिका की अध्यक्षता में चल रही इस बैठक में प्रस्ताव पास हो गया।
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भारत का रुख क्या?

भारत का रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान से मेल खाता है, जिसमें उन्होंने खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों की निंदा की थी। उन्होंने कहा था कि ये हमले इन देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करते हैं। भारत ने बहरीन के प्रस्ताव को ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बांग्लादेश, भूटान, कनाडा, मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, इटली, जापान, कुवैत, मलेशिया, मालदीव, म्यांमार, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, ओमान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, सिंगापुर, स्पेन, यूक्रेन, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, यमन और जाम्बिया जैसे कई देशों के साथ मिलकर समर्थन दिया।

प्रस्ताव में क्या कहा गया है?

प्रस्ताव में कहा गया कि यह जीसीसी देशों- बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात, और जॉर्डन की क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता और राजनीतिक स्वतंत्रता का मजबूत समर्थन करता है। प्रस्ताव ईरान के हमलों की सबसे कड़ी शब्दों में निंदा करता है। ये हमले अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन हैं और वैश्विक शांति व सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा हैं।

प्रस्ताव में ईरान से तुरंत सभी हमले रोकने की मांग की गई है। पड़ोसी देशों के ख़िलाफ़ कोई उकसावा या धमकी नहीं देनी चाहिए। इसमें हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही के अधिकार का सम्मान करने की बात दोहराई गई है। ईरान द्वारा इसको बंद करने, रोकने या हस्तक्षेप करने की कोई कार्रवाई या धमकी की निंदा की गई है।

प्रस्ताव में कहा गया कि ईरान के हमलों में नागरिक इलाकों, घरों और नागरिक संपत्तियों को निशाना बनाया गया, जिससे नागरिकों की मौत हुई और इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं। इन देशों और उनके लोगों के साथ एकजुटता जताई गई है। ईरान से अंतरराष्ट्रीय क़ानून, खासकर अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन करने और नागरिकों व नागरिक संपत्तियों की रक्षा करने की अपील की गई है।

रूस का प्रस्ताव खारिज क्यों?

दूसरी तरफ़ रूस ने एक अलग प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें युद्ध में शामिल किसी भी देश का नाम नहीं लिया गया था। उसमें सिर्फ सभी सैन्य गतिविधियों को तुरंत रोकने की अपील थी। लेकिन यह प्रस्ताव पास नहीं हो सका, क्योंकि इसे 9 वोट नहीं मिले।
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क्या ईरान पर हमले का ज़िक्र हुआ?

यूएन में प्रस्ताव लाकर खाड़ी देशों पर हमले की जिस तरह की निंदा की गई, क्या उस तरह की निंदा ईरान पर हमले की हुई? जाहिर है- नहीं। जबकि हमले की शुरुआत अमेरिका और इसराइल ने ही ईरान पर की थी। इसमें ईरान के मिनाब शहर में एक प्राथमिक स्कूल शजराह तैय्येबा एलीमेंट्री स्कूल पर टॉमहॉक मिसाइल से हमला भी शामिल है। हमले में कम से कम 175 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर बच्चे थे। इसमें भी ज्यादातर लड़कियां।
स्कूल पर यह हमला अमेरिकी ग़लती का नतीजा था। अमेरिकी सेना की शुरुआती जाँच में ही यह सामने आया है। अमेरिका के प्रतिष्ठित अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने यह ख़बर अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दी है। यह हाल के दशकों की सबसे बड़ी सैन्य गलतियों में से एक मानी जा रही है। मानवाधिकार संगठन स्कूल पर हमले की निंदा कर रहे हैं। हालाँकि, यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में जगह नहीं बना पाया।
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यह घटना ईरान-अमेरिका-इसराइल युद्ध के बीच हुई है। युद्ध 28 फरवरी से चल रहा है। ईरान ने जीसीसी देशों और जॉर्डन पर मिसाइल व ड्रोन हमले किए हैं, जबकि अमेरिका-इसराइल ने ईरान पर हमले किए हैं। इस प्रस्ताव से दुनिया के ज्यादातर देश ईरान के इन हमलों के खिलाफ एकजुट दिखे हैं। ईरान ने इसे सुरक्षा परिषद का 'दुरुपयोग' बताया है।