ईरान ने अपनी तटरेखा से 2,000 मील (लगभग 3,000 किलोमीटर) से अधिक दूरी पर स्थित अमेरिका-ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे डिएगो गार्सियां पर हमला करने की कोशिश की। इससे तेहरान की सैन्य क्षमताओं और उसकी मिसाइलों की मारक दूरी को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। इसके बाद ब्रिटेन ने ईरान के हमले की निन्दा करते हुए इस द्वीप के पास अपनी परमाणु पनडुब्बी तैनात कर दी है।
स्थानीय समय के अनुसार शुक्रवार सुबह ईरान ने हिंद महासागर में स्थित Diego Garcia पर दो मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। एक अमेरिकी अधिकारी ने CNN को बताया कि दोनों मिसाइलें लक्ष्य को भेदने में नाकाम रहीं। माना जा रहा है कि यह पहली बार है जब इस दूरदराज और रणनीतिक रूप से सुरक्षित माने जाने वाले सैन्य अड्डे को निशाना बनाने की कोशिश की गई।
हालांकि हमला सफल नहीं रहा, लेकिन इससे संकेत मिलता है कि ईरान शायद खुद अपने द्वारा बताई गई 2,000 किलोमीटर की मिसाइल सीमा का पालन नहीं कर रहा है। यानी उसके पास उससे ज्यादा दूरी की मिसाइल मौजूद है। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि तेहरान पहले की तुलना में अधिक दूर स्थित अमेरिकी और यूरोपीय हितों को भी निशाना बना सकता है।
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मिडिलबरी कॉलेज में वैश्विक सुरक्षा के प्रतिष्ठित विद्वान Jeffrey Lewis ने बताया कि ईरान एक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) विकसित कर रहा था, जिसे 2017 में तत्कालीन सर्वोच्च नेता अली खामेनेई द्वारा 2,000 किलोमीटर की सीमा तय करने के बाद अंतरिक्ष प्रक्षेपण कार्यक्रम की ओर मोड़ दिया गया था।
लुईस का कहना है कि “वे खामेनेई के अपना फैसला बदलने या उनके अगले आदेश का इंतजार कर रहे थे। अब वो मारे जा चुके हैं। ईरानी सेना (आईआरजीसी) अब अपने फैसले खुद ले रही है।”
वहीं एक अन्य विश्लेषक तृता पारसी (Trita Parsi) का मानना है कि अमेरिकी मुख्यभूमि फिलहाल ईरानी हमलों से सुरक्षित है, लेकिन इस हमले की कोशिश यह संकेत देती है कि जिन सैन्य अड्डों को अमेरिका ईरान की मारक क्षमता से बाहर मानता था, वे वास्तव में उसकी पहुंच में हो सकते हैं। इसमें वे अमेरिकी युद्धपोत भी शामिल हैं जिन्हें लगभग 3,000 किलोमीटर दूर रखा गया था।
पारसी ने यह भी आशंका जताई कि इस घटना के बाद कुछ यूरोपीय देश, जिन्होंने अमेरिका को अपने सैन्य अड्डों के उपयोग की अनुमति दी है, अपने फैसले पर पुनर्विचार कर सकते हैं। इस महीने की शुरुआत में ब्रिटेन ने ईरान के मिसाइल ठिकानों के खिलाफ अभियानों के लिए अमेरिकी बलों को अपने अड्डों के उपयोग की अनुमति दी थी। वहीं Romania ने भी अमेरिकी ईंधन भरने वाले विमानों, निगरानी और सैटेलाइट उपकरणों को अपने अड्डों पर तैनात होने की अनुमति दी है।
पारसी ने कहा, “इससे कुछ यूरोपीय अड्डे उनकी मारक सीमा में आ जाते हैं। यह यूरोपीय पक्ष में पुनर्विचार कराएगा या नहीं, कहना मुश्किल है, लेकिन जोखिम जरूर बढ़ गया है।”
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कई बार दावा किया है कि तेहरान ऐसी मिसाइलें बना रहा है जो “जल्द ही अमेरिकी मुख्यभूमि तक पहुंच सकती हैं।” हालांकि 2025 में रक्षा खुफिया एजेंसी की एक गैर-गोपनीय रिपोर्ट में कहा गया था कि यदि तेहरान इस दिशा में निर्णय लेता है तो वह 2035 तक “सैन्य रूप से सक्षम” अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल विकसित कर सकता है।
सूत्रों ने पिछले महीने CNN को यह भी बताया था कि फिलहाल ऐसा कोई खुफिया संकेत नहीं है कि ईरान अमेरिका पर हमला करने के लिए ICBM कार्यक्रम पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है।
पारसी के अनुसार, डिएगो गार्सिया पर असफल हमले ने यह भी सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या ईरान के पास ऐसे अन्य हथियार भी हैं, जिनके बारे में पहले अनुमान नहीं लगाया गया था।
रणनीतिक एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र (CSIS) के मुताबिक ईरान के पास 2,000 किलोमीटर तक मार करने वाली कई मिसाइलें हैं, जिनमें सेजेल और खोर्रमशहर शामिल हैं। इसके अलावा लंबी दूरी की सुमार क्रूज़ मिसाइल की मारक क्षमता लगभग 3,000 किलोमीटर तक बताई जाती है।
जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज़ के शोध सहयोगी Sam Lair ने कहा कि ईरान के अंतरिक्ष प्रक्षेपण वाहन- जैसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का ठोस ईंधन वाला ‘घाएम-100’- यदि बैलिस्टिक मिसाइल की तरह इस्तेमाल किए जाएं तो क्षेत्रीय मिसाइल बलों की तुलना में कहीं अधिक दूरी तक पहुंच सकते हैं।
उन्होंने कहा, “लोग अक्सर भूल जाते हैं कि अंतरिक्ष प्रक्षेपण और बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक मूल रूप से एक ही होती है।”
लेयर ने यह भी संभावना जताई कि ईरान ने हल्के विस्फोटक पेलोड का उपयोग करके किसी मिसाइल की मारक दूरी बढ़ाई हो सकती है-जैसे बहुत छोटे पेलोड के साथ खोर्रमशहर मिसाइल।

क्या ईरान के पास पूरी खुफिया जानकारी है

इसी बीच पारसी ने सवाल उठाया कि क्या ईरान के पास दूर स्थित लक्ष्यों को सफलतापूर्वक निशाना बनाने के लिए पर्याप्त “टार्गेटिंग इंटेलिजेंस” और मिसाइल सटीकता मौजूद है। उनके मुताबिक हिंद महासागर के बड़े हिस्से में ईरान के पास अपने सैटेलाइट या निगरानी संसाधनों के जरिए लक्ष्य निर्धारण की क्षमता सीमित है।
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उन्होंने कहा, “ऐसी खुफिया जानकारी संभवतः रूस और चीन से आ रही है- और यह इस युद्ध का एक ऐसा पहलू है जिसने ट्रंप प्रशासन को चौंका दिया है।”
इस महीने की शुरुआत में CNN ने बताया था कि अमेरिकी खुफिया आकलनों से परिचित कई सूत्रों के अनुसार रूस ईरान को अमेरिकी सैनिकों, जहाजों और विमानों की लोकेशन और गतिविधियों से जुड़ी जानकारी मुहैया करा रहा है।