पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ का दिल्ली दौरा रद्द हो गया है। हूतियों ने सऊदी अरामको, तेल रिफाइनरी और हवाई अड्डों पर हमले का दावा किया है। खाड़ी देशों में हालात बिगड़ रहे हैं।
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और सैन्य तनाव के बीच दो अहम घटनाक्रम सामने आए हैं। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स संसदीय मंच के सम्मेलन में शामिल होने का अपना प्रस्तावित दौरा रद्द कर दिया है। दूसरी ओर, यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, रिफाइनरी और कई हवाई अड्डों को निशाना बनाने का दावा किया है। इन घटनाओं से क्षेत्र में संघर्ष के और व्यापक होने की आशंका बढ़ गई है।
हालांकि, दोनों घटनाक्रमों के बीच सीधा संबंध स्थापित करने वाला कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ईरानी संसद अध्यक्ष के दौरे को रद्द करने के लिए ईरानी दूतावास ने अप्रत्याशित परिस्थितियों का हवाला दिया है, जबकि हूतियों के हमलों के दावों की सऊदी अधिकारियों ने तत्काल पुष्टि नहीं की थी।
ईरानी संसद अध्यक्ष गालिबाफ का दिल्ली दौरा रद्द
ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ 26 और 27 अक्टूबर को नई दिल्ली में होने वाले 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे। यह सम्मेलन ब्रिक्स सदस्य देशों की संसदों के अध्यक्षों की बैठक के रूप में आयोजित किया जा रहा है। गालिबाफ की जगह ईरान का संसदीय प्रतिनिधिमंडल सम्मेलन में भाग लेगा।
नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास ने 24 अक्टूबर को इस संबंध में जानकारी दी। दूतावास के मुताबिक, कुछ अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण गालिबाफ बैठक में शामिल नहीं हो सकेंगे। हालांकि, बयान में इन परिस्थितियों का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया। गौरतलब है कि यह फैसला ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी टकराव के कारण क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी गालिबाफ के दौरे के रद्द होने को पश्चिम एशिया में फिर से संघर्ष भड़कने की आशंकाओं के बीच अहम घटनाक्रम बताया है।
ईरान ने ब्रिक्स में भागीदारी जारी रखने की बात कही
दौरा रद्द होने के बावजूद ईरान ने ब्रिक्स के साथ अपने संबंधों और सहयोग को जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है। ईरानी दूतावास के बयान के अनुसार, उसका संसदीय प्रतिनिधिमंडल सम्मेलन में भाग लेगा और ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत तथा विचार-विमर्श जारी रखेगा। ईरान ने विशेष रूप से संसदीय संबंधों को मजबूत करने और द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। दूतावास ने सम्मेलन की मेजबानी और व्यवस्थाओं के लिए भारत सरकार का आभार भी व्यक्त किया तथा बैठक की सफलता की कामना की।गालिबाफ की अनुपस्थिति के बावजूद ईरानी प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी से संकेत मिलता है कि तेहरान ब्रिक्स के मंच पर संवाद जारी रखना चाहता है। हालांकि, पश्चिम एशिया का संघर्ष सम्मेलन के औपचारिक एजेंडे में शामिल नहीं बताया गया है, लेकिन इस मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच अलग से बातचीत होने की संभावना बनी हुई है।
हूतियों का दावा- सऊदी अरामको, तेल रिफाइनरी और हवाई अड्डों को बनाया निशाना
यमन के हूती विद्रोहियों ने 24 अक्टूबर को दावा किया कि उन्होंने सऊदी अरब के कई महत्वपूर्ण तेल प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी के अनुसार, निशाने पर सऊदी अरामको का यान्बू स्थित प्रतिष्ठान, राबिघ तेल रिफाइनरी और रियाद, दम्माम तथा नजरान के हवाई अड्डे थे। उन्होंने खमीस मुशैत स्थित एयरबेस को भी निशाना बनाने का दावा किया। हूतियों के दावों में ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन का भी उल्लेख किया गया।
यान्बू तेल निर्यात के लिहाज से क्यों महत्वपूर्ण है?
सऊदी अरब का यान्बू बंदरगाह लाल सागर के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण तेल निर्यात केंद्र है। होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही बाधित होने की स्थिति में यह सऊदी अरब के लिए कच्चे तेल के निर्यात का एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराता है। ऐसे में यान्बू के तेल प्रतिष्ठानों या ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को निशाना बनाए जाने का दावा केवल सऊदी अरब की सुरक्षा तक सीमित मामला नहीं है। यदि तेल आपूर्ति से जुड़ी इन सुविधाओं को वास्तविक नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और तेल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
मक्का, मदीना और जेद्दा में मिसाइलों के मलबे गिरने की खबरः सऊदी अरब के नागरिक सुरक्षा विभाग ने 24 अक्टूबर को मक्का और मदीना क्षेत्रों की ओर दागी गई दो बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने की जानकारी दी। विभाग के अनुसार, मिसाइलों को हवा में रोकने के बाद उनका मलबा जेद्दा, ताइफ और राबिघ सहित कई स्थानों पर गिरा। मक्का के बाहर वादी मुगामास में भी कुछ मलबा गिरने की सूचना दी गई।
अधिकारियों ने संभावित हवाई खतरे को लेकर पहले आपात चेतावनी जारी की थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। लोगों से सुरक्षा निर्देशों का पालन करने, घटनास्थलों पर भीड़ न लगाने और सैन्य कार्रवाई से संबंधित तस्वीरें या वीडियो साझा करने से बचने की अपील भी की गई। यह घटनाक्रम दिखाता है कि सऊदी अरब को केवल तेल प्रतिष्ठानों पर हमले के दावों से ही नहीं, बल्कि मिसाइल हमलों और उनके मलबे से नागरिक क्षेत्रों को होने वाले संभावित खतरे से भी जूझना पड़ रहा है।
अदन में भी सैन्य ठिकानों पर हमलों का दावा
हूतियों के दावों का दायरा सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहा। संगठन के सैन्य प्रवक्ता ने यमन के अदन शहर में सऊदी समर्थित बलों के ठिकानों और एक नौसैनिक अड्डे को निशाना बनाने की बात कही। अदन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार का अंतरिम केंद्र है। इसी दौरान सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में हूती-नियंत्रित क्षेत्रों पर हवाई हमले किए। हूती मीडिया के अनुसार, सना और उसके आसपास के इलाकों के अलावा तटीय शहर मोचा के आसपास भी हमले हुए। हूती मीडिया ने इन हमलों में 16 लोगों की मौत का दावा किया, हालांकि इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती। यह टकराव ऐसे समय तेज हुआ है जब दोनों पक्ष एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, परिवहन केंद्रों और रणनीतिक सुविधाओं को निशाना बनाने के आरोप लगा रहे हैं।
यमन का पुराना गृहयुद्ध और नया क्षेत्रीय संकट
यमन में संघर्ष की जड़ें एक दशक से भी पुरानी हैं। हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के समर्थन में हस्तक्षेप किया। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम के बाद लड़ाई में काफी कमी आई थी, लेकिन हालिया घटनाओं के बीच संघर्ष फिर तेज हो गया है। मौजूदा टकराव ने पहले से गंभीर मानवीय संकट का सामना कर रहे यमन की स्थिति को और जटिल बना दिया है। अदन में सऊदी हवाई हमलों की खबरें इस संघर्ष को एक नए चरण में ले जा सकती हैं।भारत के लिए क्या मायने हैं?
ईरानी संसद अध्यक्ष का दिल्ली दौरा रद्द होना और सऊदी अरब पर हूती हमलों के दावे ऐसे समय सामने आए हैं जब पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय संघर्ष का असर कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
भारत के लिए इस घटनाक्रम के तीन प्रमुख पहलू हैं:
- - कूटनीतिक संबंध: ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन भारत को ईरान सहित विभिन्न सदस्य देशों के साथ संवाद का अवसर देता है। गालिबाफ की अनुपस्थिति के बावजूद ईरानी प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी जारी रहेगी।
- - ऊर्जा सुरक्षा: यान्बू और राबिघ जैसे तेल प्रतिष्ठानों से जुड़े हमलों के दावों की पुष्टि होने और आपूर्ति प्रभावित होने पर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर असर पड़ सकता है।
- - समुद्री व्यापार: लाल सागर और बाब अल-मंदेब के आसपास संघर्ष बढ़ने से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही और माल ढुलाई की लागत पर दबाव पड़ने की आशंका है।
इन संभावित प्रभावों का वास्तविक स्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि हमलों के दावे कितने सही साबित होते हैं, तेल और परिवहन सुविधाओं को कितना नुकसान पहुंचता है तथा क्षेत्रीय शक्तियां आगे क्या कदम उठाती हैं।
कूटनीतिक अनिश्चितता के साथ सैन्य तनाव भी बढ़ा
पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ का दिल्ली दौरा रद्द होना एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम है। वहीं, सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, रिफाइनरी, हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों पर हमलों के हूती दावे संघर्ष के भौगोलिक दायरे के विस्तार की आशंका बढ़ाते हैं। फिलहाल, गालिबाफ के दौरे को रद्द करने की आधिकारिक वजह अप्रत्याशित परिस्थितियां बताई गई है और सऊदी अरब ने बताए गए सभी ठिकानों पर हमलों की तत्काल पुष्टि नहीं की थी। इसलिए इन दोनों घटनाओं को व्यापक क्षेत्रीय तनाव के संदर्भ में देखना उचित होगा, लेकिन इनके बीच प्रत्यक्ष संबंध मान लेना जल्दबाजी होगी।