अमेरिका-इसराइल हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता ख़ामेनेई के मारे जाने के बाद अब ईरान का भविष्य क्या होगा? जानिए तीन दशक तक सत्ता पर काबिज रहे ख़ामेनेई आख़िर सत्ता तक कैसे पहुँचे और कैसे वह इतने लंबे समय तक बने रहे।
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई अमेरिकी-इसराइली हमले में मारे गए। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दावे के बाद ईरान ने भी इसकी पुष्टि कर दी। ईरान के सरकारी मीडिया ने इसकी आधिकारिक पुष्टि करते हुए कहा कि इसराइल और अमेरिका की संयुक्त सैन्य कार्रवाई में वे मारे गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले दावा किया था कि ख़ामेनेई की मौत इसराइल-अमेरिका के संयुक्त ऑपरेशन में हुई है। ईरान ने उनकी 'शहादत' के सम्मान में 40 दिनों का सार्वजनिक शोक और 7 दिनों की सार्वजनिक छुट्टियां घोषित कर दी हैं।
यह घटना ईरान और पूरे मध्य पूर्व के लिए बहुत बड़ी है। ख़ामेनेई पिछले 36 साल से ज्यादा समय से ईरान के सबसे ताकतवर व्यक्ति थे। उन्होंने देश को मौजूदा रूप दिया, अमेरिका से कड़ी दुश्मनी रखी और सख्ती से शासन किया। आइए जानते हैं कि आख़िर आठ भाई बहनों में से एक ख़ामेनेई कैसे धर्मगुरु बने और फिर ईरान की सत्ता पर काबिज हुए, उनका जीवन, राजनीति और विचारधारा क्या थी।
ईरान में सर्वोच्च नेता की क्या ताकत होती है?
ईरान में इस्लामी व्यवस्था है, जहां सर्वोच्च नेता सबसे ऊपर होता है। राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका से भी ऊपर उसकी ताक़त होती है। ख़ामेनेई सेना के कमांडर-इन-चीफ थे। वे न्यायपालिका के प्रमुख, राज्य मीडिया के प्रमुख और महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुख नियुक्त करते थे। वे चुने हुए अधिकारियों को हटा सकते थे, क़ानूनों को रोक सकते थे और युद्ध या शांति का फ़ैसला कर सकते थे। इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी और कुद्स फोर्स के ज़रिए उनकी नज़र विदेश नीति और सैन्य मामलों पर भी रहती थी।ख़ामेनेई की ताक़त का राज़ क्या था?
यह पद 'वेलायत-ए-फकीह' यानी 'इस्लामी न्यायविद् की संरक्षकता' पर आधारित है। शिया मान्यता के अनुसार, 12वें इमाम यानी इमाम मेहदी ग़ैबत में यानी अभी छिपे हुए हैं। उनके आने तक समाज और सरकार की देखभाल और नेतृत्व एक योग्य, न्यायप्रिय और इस्लामी क़ानूनों का गहरा जानकार फ़क़ीह यानी इस्लामी न्यायशास्त्री या धर्मगुरु के हाथ में होना चाहिए। इसका मतलब है कि राज्य की सारी बड़ी राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक शक्तियाँ इस वली-ए-फ़क़ीह यानी सर्वोच्च नेता के पास होती हैं।
ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अयातुल्ला खुमैनी ने इस सिद्धांत को अपनाया और इसे देश की संविधान में जगह दी। वहाँ पहले खुमैनी, अब ख़ामेनेई के रूप में सुप्रीम लीडर इसी वेलायत-ए-फकीह के तहत सबसे ताक़तवर होता है। राष्ट्रपति और संसद भी हैं, लेकिन अंतिम फैसला वली-ए-फ़क़ीह का होता है।
खामेनेई कौन थे?
अली खामेनेई का जन्म 1939 में ईरान के उत्तरी शहर मशहद में हुआ था। वे 8 बच्चों में दूसरे थे। उनके पिता एक साधारण धर्मगुरु थे। ख़ामेनेई ने भी पिता के रास्ते पर चलते हुए 1958 से 1964 तक क़ुम में धार्मिक पढ़ाई की। 60 के दशक में वह आयतुल्लाह खुमैनी के आंदोलन में शामिल हो गए, जो शाह के खिलाफ था।
शाह की सरकार ने उन्हें कई बार जेल में डाला। 1979 की इस्लामी क्रांति में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। 1981 से 1989 तक वे ईरान के राष्ट्रपति रहे और ईरान-इराक युद्ध के दौरान देश का नेतृत्व किया। खुमैनी की मौत के बाद 1989 में वे सर्वोच्च नेता बने। खामेनेई की विचारधारा
अपने शुरुआती जीवन में वह ईरानी बुद्धिजीवियों से मिलते थे, धर्मनिरपेक्ष और इस्लामी विचारों को पढ़ते थे। साहित्य को पसंद करते थे। उन्होंने विक्टर ह्यूगो की किताब 'ले मिजरेबल्स' को 'इतिहास की सबसे अच्छी उपन्यास' कहा था। 2004 में सरकारी टीवी के अधिकारियों से कहा था, 'ले मिजरेबल्स एक बार जरूर पढ़ो, यह उपन्यास लेखन की दुनिया में चमत्कार है।'
ख़ामेनेई उदार लोकतंत्र और पूंजीवाद को गलत मानते थे। वे पश्चिम को भौतिकवादी और इस्लाम-विरोधी कहते थे। लेकिन पूरी तरह पश्चिम-विरोधी नहीं थे। 1999 में युवाओं से कहा था, 'पश्चिमी संस्कृति में अच्छी और बुरी चीजें हैं। समझदार राष्ट्र अच्छी चीजें अपनाएगा और बुरी को ठुकराएगा।' उनका मुख्य विरोध पश्चिम की भौतिकवादिता से था। उन्होंने कहा था कि पश्चिम सिर्फ भौतिक आयाम देखता है, जबकि इस्लामी सभ्यता में न्याय, प्रार्थना, स्वतंत्रता और ईश्वर की ओर बढ़ना शामिल है। उनका आदर्श सिर्फ मजबूत ईरान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ ईरान था।
उन पर मिस्र के इस्लामी विचारक सैयद कुत्ब और आयतुल्लाह खुमैनी का प्रभाव था। खुमैनी अमेरिका को 'महान शैतान' और इसराइल को 'छोटा शैतान' कहते थे। ख़ामेनेई भी इन दोनों देशों से कड़ी दुश्मनी रखते थे। 2010 में कुरान जलाने की धमकी पर उन्होंने कहा था कि यह साम्राज्यवादी और जायोनी साजिश का हिस्सा है।
खामेनेई ने क्या किया?
ख़ामेनेई के समय में ईरान क्षेत्रीय ताक़त बना। ईरान ने लेबनान से यमन तक हिजबुल्लाह, हमास, हूती और इराक-सिरिया के मिलिशिया जैसे प्रॉक्सी गुटों को फंड, ट्रेनिंग और हथियार दिए। इससे इसराइल, सऊदी अरब और अमेरिका से टकराव बिना सीधे युद्ध के हुआ। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार विदेशी विश्लेषक मोहसिन मिलानी ने लिखा कि ख़ामेनेई का मिशन था क्रांतिकारी पहचान को बचाना, इस्लामी सिद्धांतों पर कायम रहना और पश्चिम का विरोध करना।
ख़ामेनेई ने आर्थिक रूप से 'प्रतिरोध की नीति' अपनाई। प्रतिबंधों से कम प्रभावित होने के लिए तेल पर निर्भरता कम की, चीन-रूस से व्यापार बढ़ाया और सब्सिडी घटाई। लेकिन अर्थव्यवस्था अभी भी तेल पर टिकी है और सब्सिडी कटौती से विरोध प्रदर्शन हुए।
परमाणु कार्यक्रम पर नज़रिया
परमाणु कार्यक्रम को वे राष्ट्रीय गौरव मानते थे। यूरेनियम संवर्धन को संप्रभुता का अधिकार कहा। उन्होंने कहा कि ईरान परमाणु हथियार नहीं चाहता। 2015 के परमाणु समझौते की अनुमति दी, लेकिन अमेरिका के बाहर निकलने की आलोचना की। घरेलू स्तर पर उन्होंने वफादार लोगों को हर जगह लगाया, सुधारवादियों को दबाया और विरोध को क्रूरता से कुचला।
ख़ामेनेई की मौत से ईरान में सत्ता का बड़ा संकट है। उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, यह साफ़ नहीं है। कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि शाह वंश के शाह मोहम्मद रेज़ा पहलवी के बेटे रेज़ा पहलवी को अमेरिका सत्ता पर बैठाना चाहता है। ईरान के भविष्य और क्षेत्र की शांति पर इस सबका गहरा असर पड़ेगा।