डोनाल्ड ट्रंप को अब्राहम एकोर्ड्स पर हाल में उनकी 'आँखों का तारा' बने पाकिस्तान से ही झटका लगा है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अब्राहम समझौते की मांग को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा है कि इसराइल को मान्यता देना पाकिस्तान की विचारधारा के ख़िलाफ़ है। पाकिस्तान की यह प्रतिक्रिया तब आई है जब ट्रंप ने एक दिन पहले ही कहा है कि ईरान समझौते से पहले पाकिस्तान सहित 6 मुस्लिम देशों को अब्राहम एकोर्ड्स में शामिल होना 'अनिवार्य' है।

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को तब मुश्किल में डाल दिया जब उन्होंने पाकिस्तान से मांग कर दी कि वह अब्राहम एकोर्ड्स में शामिल हो जाए और इसराइल को औपचारिक रूप से मान्यता दे। ट्रंप ने इसे ईरान के साथ शांति समझौते से भी जोड़ दिया। इस मांग ने पाकिस्तान को दो मुश्किल रास्तों के बीच खड़ा कर दिया। लेकिन अब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक टीवी इंटरव्यू में साफ़ कह दिया कि अपनी मूल विचारधारा से समझौता करना उनके लिए स्वीकार्य नहीं है।
ताज़ा ख़बरें

ख्वाजा आसिफ का बयान

समा टीवी को दिए इंटरव्यू में ख्वाजा आसिफ ने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि हमें ऐसे किसी समझौते में शामिल होना चाहिए जो हमारी मूल विचारधारा से टकराता हो। जिन लोगों पर एक दिन भी भरोसा नहीं किया जा सकता, उनके साथ कैसे बैठेंगे?' उन्होंने इसराइल पर तंज कसते हुए कहा कि पाकिस्तान का इसराइल के प्रति रुख बिल्कुल साफ़ है। आसिफ ने पासपोर्ट नीति का भी ज़िक्र किया। उन्होंने बताया, 'हमारे पासपोर्ट में इसराइल का नाम तक नहीं लिखा होता। हम दुनिया के इकलौते देश हैं जो ऐसा करते हैं। हमारा स्टैंड बहुत साफ़ है- यह हमारे लिए स्वीकार्य नहीं है।'

अब्राहम एकोर्ड्स क्या है?

अब्राहम एकोर्ड्स फिलीस्तीन मुद्दे के स्थायी समाधान के बिना ही इसराइल को मान्यता देने और मध्य पूर्व में शांति व सामान्यीकरण की पहल हैं। अब्राहम एकोर्ड्स 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका की मदद से इसराइल और कुछ अरब देशों के बीच रिश्ते सामान्य करने वाले समझौते हैं।

अब्राहम एकोर्ड्स के तहत यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान ने इसराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे। बाद में कजाकिस्तान भी शामिल हुआ। मिस्र के 1979 और जॉर्डन के 1994 से ही इसराइल के साथ संबंध हैं, लेकिन अब्राहम समझौते में शामिल नहीं हैं।

ट्रंप ने अब सऊदी अरब, कतर, तुर्की और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से भी यही मांग की है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर सोमवार को लिखा, 'ईरान के साथ बातचीत अच्छी चल रही है। यह या तो सबके लिए बहुत अच्छा समझौता होगा, वरना कोई समझौता नहीं होगा।' उन्होंने चेतावनी भी दी कि यदि समझौता नहीं हुआ तो फिर 'बड़ी और मजबूत लड़ाई' हो सकती है। ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन का नाम लेकर कहा कि ये देश अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करें। उन्होंने यूएई और बहरीन से भी इस बारे में बात की है। ट्रंप का कहना है कि सऊदी अरब और कतर से इस प्रक्रिया की शुरुआत होनी चाहिए, बाकी देश बाद में शामिल हों।

पाकिस्तान की मुश्किल स्थिति

पाकिस्तान ने 78 साल से इसराइल को मान्यता नहीं दी है। पाकिस्तानी पासपोर्ट पर इसराइल घूमना भी मुमकिन नहीं है। पाकिस्तान का पुराना स्टैंड है कि इसराइल को तभी मान्यता मिलेगी जब 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फिलिस्तीन देश बन जाए। इस साल जनवरी में पाकिस्तान ग़ज़ा बोर्ड ऑफ़ पीस में शामिल हुआ तो भी विदेश मंत्रालय ने साफ़ किया था कि 'यह अब्राहम एकोर्ड्स से बिल्कुल जुड़ा नहीं है। पाकिस्तान का रुख नहीं बदलेगा।'
दुनिया से और ख़बरें

पाकिस्तान में अंदरूनी विरोध

अंदरूनी तौर पर भी पाकिस्तान में कड़ा विरोध है। धार्मिक संगठन इसराइल के साथ किसी भी तरह के रिश्ते के खिलाफ हैं। अगर पाकिस्तान इसराइल को मान्यता देता है तो घरेलू स्तर पर बड़ी नाराजगी हो सकती है। दूसरी तरफ, पाकिस्तान अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है। अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने के बाद दोनों देशों के रिश्ते खराब हुए थे। साथ ही, पाकिस्तान आर्थिक और सैन्य मदद के लिए सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों पर निर्भर है। ये देश अब इसराइल से नज़दीकियाँ बढ़ा रहे हैं। यही पाकिस्तान के सामने मुश्किल है। लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल तो यह है कि पाक यदि इसराइल को मान्यता देता है तो घरेलू स्तर पर लोगों के बड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

पाकिस्तान का अब्राहम समझौते पर विरोध अब तक बहुत मजबूत और लगातार रहा है। यह 1948 से चली आ रही इसराइल को न मानने की नीति और फिलिस्तीन समर्थन पर आधारित है। इसी साल जनवरी में विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ने कहा था कि पाकिस्तान अब्राहम समझौते का पक्ष नहीं बनेगा' और फिलिस्तीन-इसराइल पर उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं है।

पूर्ववर्ती इमरान खान सरकार का रुख

यूएई, बहरीन जैसे देशों के अब्राहम समझौते में शामिल होने के बाद 2020 के आसपास इमरान खान ने साफ़ कहा था कि पाकिस्तान इसराइल को तब तक मान्यता नहीं देगा जब तक फिलिस्तीन को स्वतंत्र राज्य नहीं मिल जाता। उन्होंने अमेरिका और कुछ खाड़ी देशों से दबाव की बात कही, और कहा था कि लेकिन 'मेरी अंतरात्मा' इसे स्वीकार नहीं करेगी।
सर्वाधिक पढ़ी गयी ख़बरें

विरोध के कारण

पाकिस्तान में फिलिस्तीन समर्थन बहुत गहरा है। किसी भी सामान्यीकरण से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं, खासकर जमात-ए-इस्लामी, टीएलपी जैसी धार्मिक पार्टियों द्वारा। संसद में प्रस्ताव भी पास होते रहे हैं।

क्या होगा आगे?

ख्वाजा आसिफ के साफ़ इनकार के बाद अब देखना होगा कि ट्रंप इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। एक तरफ ट्रंप की मांग और अमेरिका-ईरान मुद्दा, दूसरी तरफ देश की मूल नीति और घरेलू दबाव। पाकिस्तान ने फिलहाल अपनी पुरानी नीति पर कायम रहने का फैसला किया है, लेकिन यह फैसला महंगा भी पड़ सकता है।