ईरान में होर्मुज पर अमेरिकी ब्लॉकेड ने क्या अमेरिका के ही साथी सऊदी अरब और क़तर जैसे देशों को ही नुक़सान पहुँचा दिया है? सऊदी अरब अमेरिका से कह रहा है कि ईरान के बंदरगाहों पर लगाए गए ब्लॉकेड को हटा लो और बातचीत की मेज पर लौटो। सऊदी डर रहा है कि अमेरिका का यह क़दम ईरान को भड़का सकता है और ईरान बदले में दूसरे अहम समुद्री रास्ते को बंद कर देगा, जिससे सऊदी अरब का अपना तेल निर्यात बुरी तरह प्रभावित होगा। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अरब अधिकारियों ने बताया कि सऊदी अरब अमेरिका को चेतावनी दे रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस फ़ैसले से ईरान भड़क सकता है और बाब अल मंदेब स्ट्रेट को बंद कर सकता है। यह रास्ता लाल सागर का एक संकरा रास्ता है और फिलहाल सऊदी अरब के तेल निर्यात का मुख्य लाइफलाइन बन चुका है।
ईरान से युद्ध के बीच अमेरिका ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर और दबाव डालने के लिए सोमवार से ईरान के सभी बंदरगाहों पर नौसैनिक ब्लॉकेड लगा दिया। इसका मक़सद ईरान को कमजोर करना है। लेकिन सऊदी अरब को लग रहा है कि यह क़दम उल्टा पड़ सकता है।
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सऊदी अरब ने युद्ध के दौरान होर्मुज ब्लॉक होने पर अपना तेल निर्यात बचाने के लिए रेगिस्तान के रास्ते पाइपलाइन से तेल लाल सागर के यानबू टर्मिनल तक पहुंचाया। अब सऊदी रोजाना क़रीब 7 मिलियन बैरल तेल निर्यात कर रहा है, जो युद्ध से पहले का स्तर है। लेकिन अगर ईरान बाब अल मंदेब बंद कर देता है तो यह रास्ता भी खत्म हो जाएगा।

हूती और ईरान का ख़तरा

बाब अल मंदेब के पास का लंबा तटीय इलाका ईरान के सहयोगी हूती के नियंत्रण में है। हूतियों ने ग़ज़ा युद्ध के दौरान इस रास्ते को काफी प्रभावित किया था। अब ईरान हूतियों पर दबाव डाल रहा है कि वे फिर से इसे बंद करें।

यदि ईरान बाब अल मंदेब बंद करना चाहे तो हूती उसके लिए सबसे सही साथी हैं। गजा संघर्ष के दौरान उन्होंने साबित कर दिया कि वे ऐसा करने की क्षमता रखते हैं।

ईरान की अर्द्ध सरकारी तस्नीम न्यूज एजेंसी ने भी कहा कि अमेरिका का ब्लॉकेड ईरान को लाल सागर का रास्ता बंद करने पर मजबूर कर सकता है। ईरान के सुप्रीम लीडर के सलाहकार अली अकबर वेलायती ने 5 अप्रैल को सोशल मीडिया पर लिखा था कि बाब अल मंदेब हमारे लिए होर्मुज जितना ही अहम है। अगर व्हाइट हाउस फिर से गलती करता है तो उसे जल्दी समझ आएगा कि वैश्विक ऊर्जा और व्यापार को एक सिग्नल से ही बाधित किया जा सकता है।
ईरान की सेना ने सोमवार को चेतावनी दी कि अगर उसके फारस की खाड़ी और ओमान सागर के बंदरगाहों की सुरक्षा पर खतरा हुआ तो वहां के किसी भी बंदरगाह की सुरक्षा सुरक्षित नहीं रहेगी।
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सऊदी अरब की चिंता और अमेरिका का जवाब

सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे दूसरे खाड़ी देश लंबे समय से ईरान के साथ सीधा टकराव टालते आए थे। उनका मानना था कि युद्ध से सबकी अर्थव्यवस्था को नुक़सान होगा। लेकिन अब यह समझ टूट चुकी है। खाड़ी देश नहीं चाहते कि युद्ध ईरान के होर्मुज पर कंट्रोल के साथ खत्म हो। लेकिन कई देश, खासकर सऊदी अरब, अमेरिका से कह रहे हैं कि मुद्दे को बातचीत से सुलझाओ। वे फिर से वार्ता शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं।

क़तर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान बिन जसीम अल थानी ने अपने सऊदी समकक्ष प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद से बात की है। मंत्रालय ने कहा है, 'इस बातचीत के दौरान दोनों पक्षों ने समन्वय को मज़बूत करने और तनाव को रोकने के लिए साझा प्रयासों को तेज़ करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।'
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इधर, व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने कहा, 'राष्ट्रपति ट्रंप साफ़ कर चुके हैं कि होर्मुज पूरी तरह खुला रहना चाहिए ताकि ऊर्जा का मुक्त प्रवाह हो। हम अपने खाड़ी सहयोगियों से लगातार संपर्क में हैं। राष्ट्रपति ईरान को अमेरिका या किसी भी देश को ब्लैकमेल न करने दें, यही मदद कर रहे हैं।'

वर्तमान में स्थिति बेहद नाजुक है। सऊदी अरब जैसे अमेरिका के क़रीबी सहयोगी भी चिंतित हैं कि एक ग़लत क़दम पूरे इलाक़े को फिर युद्ध की आग में झोंक सकता है और वैश्विक तेल संकट और गहरा सकता है। दोनों पक्ष मध्यस्थों के ज़रिए बातचीत के दरवाजे खुले रखे हुए हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से सख्ती दिखा रहे हैं। यह युद्ध न सिर्फ मध्य पूर्व, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है।