स्टॉकहोम से हर्ष रंजन की विशेष रिपोर्ट: क्या स्वीडन अपनी पुरानी उदारवादी और कल्याणकारी पहचान को बनाए रखेगा, या आप्रवासन, अपराध और राष्ट्रीय पहचान की राजनीति उसे धीरे-धीरे एक नए राजनीतिक रास्ते पर ले जाएगी? पढ़िए, स्वीडन के आम चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टियों के उभार के मायने क्या।
स्वीडन में एक मतदान बूथ का नज़ारा
स्वीडन में आज, 13 सितंबर, आम चुनाव होने जा रहा है। पहली नजर में यह एक सामान्य यूरोपीय चुनाव लग सकता है, लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है। स्वीडन की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में काफी बदली है। जो देश कभी अपनी उदार सोच, खुलेपन और मजबूत कल्याणकारी व्यवस्था के लिए जाना जाता था, वहां अब इमिग्रेशन, अपराध, राष्ट्रीय पहचान और देश की संप्रभुता बड़े राजनीतिक मुद्दे बन गए हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि दक्षिणपंथी स्वीडेन डेमोक्रेट्स अब स्वीडन की राजनीति के हाशिए पर रहने वाली पार्टी नहीं है। वह इतनी मजबूत हो चुकी है कि अगर प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन का गठबंधन दोबारा सत्ता में आता है तो इस पार्टी के सरकार में शामिल होने की संभावना है।
क्या स्वीडन यूरोप से दूर जा रहा है?
यह सवाल आज स्वीडन में काफी चर्चा में है।
कुछ छोटे और राष्ट्रवादी राजनीतिक समूह यूरोपीय संघ के बढ़ते प्रभाव और ब्रसेल्स से आने वाले फैसलों पर सवाल उठाते हैं। वे चाहते हैं कि स्वीडन अपने फैसले खुद ज्यादा ले और राष्ट्रीय संप्रभुता मजबूत हो।
लेकिन यहां एक अहम बात समझना ज़रूरी है। इस चुनाव में कोई बड़ी पार्टी स्वीडन को यूरोपीय संघ से बाहर निकालने यानी “Swexit” स्वेक्सिट का अभियान नहीं चला रही है।
स्वीडन में बहस फिलहाल यह नहीं है कि ईयू में रहना है या नहीं। बहस ज्यादा इस बात पर है कि ईयू की स्वीडन के घरेलू मामलों में कितनी दखल होनी चाहिए।
जनता के बीच भी ईयू से बाहर निकलने का समर्थन बहुत कम है। मई 2026 के आधिकारिक सर्वे में करीब 64.5% लोग ईयू सदस्यता के पक्ष में थे, जबकि केवल 11.4% इसके खिलाफ थे। लेकिन राष्ट्रवाद जरूर बढ़ा है। असल बदलाव यहां दिखाई देता है।
स्वीडन में इमिग्रेशन और अपराध पिछले कुछ वर्षों में बहुत बड़े मुद्दे बन गए हैं। स्वीडेन डेमोक्रेट्स ने इसी मुद्दे को सबसे ज्यादा जोर से उठाया है।
प्रधानमंत्री क्रिस्टरसन की सरकार ने भी इमिग्रेशन को लेकर अपनी नीतियां काफी सख्त की हैं। यहां तक कि सरकार ने कुछ गैर ईयू प्रवासियों को स्वेच्छा से स्वीडन छोड़कर अपने देश लौटने के लिए आर्थिक सहायता देने की योजना शुरू की है।
यानी जो बातें कुछ साल पहले स्वीडन की मुख्यधारा की राजनीति में बहुत कठोर मानी जाती थीं, वे आज चुनावी बहस का हिस्सा बन चुकी हैं।
स्वीडन की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा कौन?
इस चुनाव में दो बड़े नाम हैं। एक तरफ हैं वर्तमान प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन और उनका दक्षिणपंथी गठबंधन। दूसरी तरफ़ हैं सोशल डेमोक्रेट्स की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मगदालेना एंडरसन, जो फिर से सत्ता में लौटना चाहती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि चुनाव से कुछ ही दिन पहले मुकाबला बहुत करीबी हो गया है। ताजा सर्वे में सोशल डेमोक्रेट्स के नेतृत्व वाला सेंटर लेफ्ट समूह मामूली बढ़त पर है। रायटर्स के अनुसार, सेंटर लेफ्ट को लगभग 175-180 सीटें, जबकि दक्षिणपंथी गठबंधन को 169-174 सीटें मिलने का अनुमान है। स्वीडन की 349 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए 175 सीटें चाहिए।
इसका मतलब है कि कुछ सीटों का अंतर ही अगली सरकार तय कर सकता है।
स्टॉकहोम में आज ली गई तस्वीरें इस चुनाव के माहौल को समझने के लिए काफी दिलचस्प है।
स्वीडन में एक मतदान बूथ का नज़ारा
एक पोस्टर में प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन का चेहरा है और नारा है— “Vi får saker gjorda” यानी— “हम काम करके दिखाते हैं।”
दूसरे पोस्टर में वित्त मंत्री Elisabeth Svantesson हैं। उनका संदेश है— “आपकी तनख्वाह में ज्यादा पैसा बचे, परिवार और आराम के लिए ज्यादा समय मिले।” यानी सरकार का चुनावी संदेश सिर्फ इमिग्रेशन या ईयू नहीं है। वह आम स्वीडिश नागरिक की जेब, परिवार, नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी की बात भी कर रही है।
यही इस चुनाव की एक बड़ी खासियत है।
तो क्या स्वीडन दक्षिणपंथी हो गया है?
पूरी तरह ऐसा कहना भी सही नहीं होगा। स्वीडन अभी भी एक मज़बूत कल्याणकारी राष्ट्र है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और आम आदमी की आर्थिक सुरक्षा यहां के बड़े मुद्दे हैं।
लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि स्वीडन का राजनीतिक केन्द्र बिंदु दाईं तरफ खिसका है। इसका सबसे बड़ा कारण है, इमिग्रेशन और अपराध। और इसका फायदा स्वीडेन डेमोक्रेट्स को हुआ है।
यह पार्टी अब इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि प्रधानमंत्री क्रिस्टरसन ने संकेत दिया है कि अगर उनका गठबंधन जीतता है तो उन्हें सरकार में मंत्री पद भी मिल सकते हैं।
एक और दिलचस्प विरोधाभास
स्वीडन में एक तरफ इमिग्रेशन कम करने की बात हो रही है, दूसरी तरफ देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी कामगारों की जरूरत भी है। स्वास्थ्य, बुज़ुर्गों की देखभाल और दूसरे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में विदेशी लोग काम करते हैं।
यानी स्वीडन के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “कितने आप्रवासी आएं?” सवाल यह भी है कि “अगर आप्रवासी कम होंगे तो बूढ़ी हो रही स्वीडिश आबादी की जरूरतें कौन पूरी करेगा?”
यही आने वाले वर्षों की बड़ी चुनौती हो सकती है। आज का चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का चुनाव नहीं होगा। मेरे हिसाब से स्वीडन का यह चुनाव एक बड़े बदलाव की कहानी है।
एक ऐसा देश जिसे दुनिया लंबे समय तक उदारवादी और प्रगतिशील के रूप में देखती रही, वहां अब राष्ट्रीय पहचान, आप्रवासन, अपराध और राष्ट्रीयता जैसे मुद्दे केंद्र में आ गए हैं। लेकिन साथ ही स्वीडन यूरोप से अलग होने के रास्ते पर नहीं है। वह ईयू में है, नाटो में है और यूरोप के साथ आर्थिक और राजनीतिक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ है।
असल सवाल शायद यह है— “यूरोप के साथ रहते हुए स्वीडन अपने फैसले कितने स्वतंत्र रूप से लेना चाहता है?”
और दूसरा सवाल इससे भी बड़ा है— “क्या स्वीडन अपनी पुरानी उदारवादी और कल्याणकारी पहचान को बनाए रखेगा, या आप्रवासन, अपराध और राष्ट्रीय पहचान की राजनीति उसे धीरे-धीरे एक नए राजनीतिक रास्ते पर ले जाएगी?”
13 सितंबर का चुनाव इस बदलाव की दिशा काफी हद तक तय कर सकता है। और सबसे दिलचस्प बात, इस बार स्वीडन में कोई एक पार्टी नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारों के बीच मुकाबला है। इसलिए चुनाव के बाद सरकार बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना चुनाव जीतना।