अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर डिजिटल रूप से संशोधित (edited) तस्वीर साझा की, जिसमें उन्होंने खुद को “Acting President of Venezuela” यानि वेनेजुएला का कार्यवाहक राष्ट्रपति बताया है। यह पोस्ट विवादों और कूटनीतिक अनिश्चितता को और गहरा कर रहा है।
ट्रंप का यह दावा निकोलस मदुरो की गिरफ्तारी के कुछ दिनों बाद आया है, जिन्हें अमेरिकी सेना ने अवैध रूप से हिरासत में ले रखा है। लेकिन सवाल यह है कि एक स्वतंत्र देश वेनेजुएला के कार्यकारी राष्ट्रपति के रूप में खुद को घोषित करने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को कैसे मिल सकता है? वेनेजुएला में अभी भी एक कार्यकारी राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और पूरी तरह से कार्यरत सरकार है, जो देश पर पूर्ण नियंत्रण रखती है। ट्रंप के इस बयान को अत्यधिक आपत्तिजनक और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जा रहा है।

मदुरो को 5 जनवरी 2026 को न्यूयॉर्क की अदालत में पेश किया गया था, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि वे वेनेजुएला के प्रभारी हैं। मदुरो की गिरफ्तारी के बाद, उनकी सहयोगी डेलसी रोड्रिग्ज को वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट ने कार्यकारी राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई है।

वेनेजुएला सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश की संप्रभुता बरकरार है और अमेरिकी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर अपनी जो फोटो पोस्ट की, जो स्पष्ट रूप से एक मजाक या प्रचार का हिस्सा लगती है, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकती है। वेनेजुएला की नई नेता डेलसी रोड्रिग्ज को ट्रंप ने धमकी दी है कि उनका हश्र मादुरो से भी बदतर होगा।


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अमेरिकी साम्राज्यवाद की नई मिसाल

यह घटना अमेरिकी साम्राज्यवाद की नई मिसाल है। वेनेजुएला एक स्वतंत्र राष्ट्र है, जिसकी अपनी संवैधानिक व्यवस्था है। सुप्रीम कोर्ट और संसद अभी भी कार्यरत हैं, और देश की सेना तथा प्रशासन मदुरो की अनुपस्थिति में भी सुचारू रूप से चल रहे हैं। ट्रंप का यह दावा न केवल वेनेजुएला की संप्रभुता का अपमान है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन है। कैसे एक विदेशी नेता खुद को किसी अन्य देश का राष्ट्रपति घोषित कर सकता है? यह कॉलोनियल युग की याद दिलाता है, जहां शक्तिशाली देश कमजोर राष्ट्रों पर कब्जा करने का प्रयास करते थे।


ट्रंप की इस हरकत पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। सीएनएन होस्ट एबी फिलिप ने इसे "दुनिया का राजा" बनने की कोशिश बताया है। एक्स पर भी इसकी चर्चा जोरों पर है, जहां लोग इसे "आधुनिक उपनिवेशवाद" और "ट्रंप का पागलपन" बता रहे हैं। 
इन तमाम एक्स पोस्ट में कहा गया कि ट्रंप वेनेजुएला को मुक्त करने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह तेल संसाधनों पर कब्जे की साजिश लगती है।

जनवरी की शुरुआत में अमेरिकी सेनाओं ने वेनेजुएला में बड़े पैमाने पर एक सैन्य अभियान चलाया, जिसमें राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क लाया गया। इसके बाद वेनेजुएला के सुप्रीम ट्रिब्यूनल ने उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज को देश का अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त किया और उन्होंने 5 जनवरी को शपथ ली थी। ट्रंप ने तब कहा था कि अमेरिका वेनेजुएला को तब तक ‘चलाएगा’ जब तक एक “सुरक्षित और न्यायपूर्ण सत्ता हस्तांतरण” संभव नहीं हो जाता। हालाँकि, इस सैन्य कार्रवाई और सत्ता नियंत्रण के दावे को अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों के स्पष्ट उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।

क्या वास्तव में ट्रंप को अधिकार है?

बिलकुल नहीं। ट्रंप की यह पोस्ट एक प्रोवोकेटिव/राजनीतिक बयान के रूप में ज्यादा लगती है, न कि किसी वैध कूटनीतिक निर्णय के रूप में। इस दावे को किसी भी आधिकारिक सरकारी दस्तावेज या किसी अन्य देश ने मान्यता नहीं दी है। यूरोपीय संघ, दक्षिण अमेरिकी और अरब देशों सहित कई सरकारों ने कहा है कि वेनेजुएला के लिए किसी विदेशी राष्ट्रपति का दावा मान्य नहीं है और अंतरिम नेतृत्व केवल देश के संविधान के तहत ही मान्य हो सकता है।
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस विषय पर चर्चा हुई, जिसमें कई सदस्य देशों ने अमेरिका की कार्रवाई को सम्राज्यवादी हस्तक्षेप करार दिया। बहरहाल, यह बात बहुत साफ है कि वास्तविक सत्ता वेनेजुएला के संविधान, सुप्रीम कोर्ट और उसके नागरिकों के हाथ में है, न कि किसी अन्य देश के राष्ट्रपति के सोशल मीडिया पोस्ट में। इस घटना से स्पष्ट होता है कि राजनीति, शक्ति संघर्ष और मीडिया प्रभाव के बीच का अनैतिक तंत्र परदा उठाकर विश्व राजनीति में एक खतरनाक precedent (नमूना) पेश कर रहा है।