अमेरिका की एक फेडरल कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस विवादास्पद फैसले को खारिज कर दिया है, जिसके तहत नए H-1B वीजा आवेदनों पर $100,000 (करीब 84 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस लगाने की घोषणा की गई थी। अमेरिकी जज के इस फैसले को अमेरिकी कंपनियों, यूनिवर्सिटीज और हजारों कुशल विदेशी कर्मचारियों विशेषकर भारतीयों के लिए एक बहुत बड़ी जीत माना जा रहा है।

जज ने H-1B वीजा फैसले पर क्या कहा?

बोस्टन के अमेरिकी जिला जज (US District Judge) लियो सोरोकिन ने सोमवार (8 जून, 2026) को इस नीति को पूरी तरह गैरकानूनी (Unlawful) करार देते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की मंजूरी के बिना अपने स्तर पर इतनी बड़ी फीस थोपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

अमेरिका के विपक्ष डेमोक्रेट्स ने दी थी चुनौती

अदालत ने कैलिफोर्निया समेत 20 ऐसे राज्यों (जिनमें डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारें हैं) के पक्ष में फैसला सुनाया, जिन्होंने इस नियम को अदालत में चुनौती दी थी। राज्यों की दलील थी कि राष्ट्रपति ने इस नीति को लागू करके अपने कानूनी दायरे का उल्लंघन किया है। इसके अलावा, यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स और कई बड़े बिजनेस समूहों ने भी इसके खिलाफ अलग से मुकदमे दायर किए थे।
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H-1B वीज़ा पर ट्रंप सरकार का क्या था तर्क?

ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल (2025) सितंबर में अप्रवासियों और विदेशी कामगारों पर कड़े प्रतिबंध लगाने के अभियान के तहत इस भारी-भरकम फीस का ऐलान किया था। सरकार का तर्क था कि इतनी ऊंची फीस होने से अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय अमेरिकी नागरिकों को नौकरियों पर रखने के लिए प्रोत्साहित होंगी।

इस नए नियम से पहले, अमेरिकी नियोक्ताओं (Employers) को एक H-1B वीजा आवेदन के लिए आमतौर पर $2,000 से $5,000 के बीच ही फीस देनी होती थी, जिसे अचानक बढ़ाकर $100,000 कर दिया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन इस अदालती फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील कर सकता है।

भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

H-1B वीजा कार्यक्रम कुशल विदेशी पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण जरिया है। इसके जरिए अमेरिकी कंपनियां टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में दुनिया भर से बेहतरीन टैलेंट को अपने यहाँ काम पर रखती हैं।
भारतीय सबसे बड़े लाभार्थी: हर साल जारी होने वाले कुल H-1B वीजा में से सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय नागरिकों को मिलता है। इस भारी फीस के हटने से भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और टेक कंपनियों को सबसे ज्यादा राहत मिलेगी।
वीजा का आंकड़ा: अमेरिका हर साल कुल 65,000 सामान्य H-1B वीजा जारी करता है, जबकि अमेरिकी उच्च शिक्षण संस्थानों से एडवांस डिग्री (जैसे मास्टर या पीएचडी) करने वालों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा का कोटा होता है।
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H-1B वीजा की मौजूदा स्थिति 

एक इमिग्रेशन एडवोकेसी ग्रुप (FWD.us) के आंकड़ों के मुताबिक, इस समय अमेरिका में लगभग 7,30,000 H-1B वीजा धारक रह रहे हैं, और उनके साथ करीब 5,50,000 उनके आश्रित (पति/पत्नी और बच्चे) भी वहाँ मौजूद हैं। हालांकि हाल ही में अमेरिकी एजेंसियों ने कहा था कि भारत से गलत तरीके से एच1 1बी वीज़ा लेकर भारतीय अमेरिका आते हैं। वहां पर ऐसे वीज़ा धारकों की जांच शुरू हो गई है।
अदालत के इस फैसले से अमेरिकी टेक इंडस्ट्री ने राहत की सांस ली है, क्योंकि इस भारी फीस के कारण कंपनियों के लिए विदेशी टैलेंट को काम पर रखना आर्थिक रूप से नामुमकिन सा हो गया था।