अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड पर नियंत्रण हासिल करने की बार-बार की कोशिशों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया विवाद खड़ा कर दिया है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बताते हुए इसे हासिल करने के सभी विकल्पों पर विचार करने की बात कही है, जिसमें सैन्य कार्रवाई भी शामिल है। इसके जवाब में डेनमार्क ने अपनी पुरानी सैन्य नीति को याद दिलाया है, जिसमें पहले गोली फिर बात का जिक्र है। अमेरिकी अधिकारियों के बीच ग्रीनलैंड के निवासियों को नकद भुगतान देकर डेनमार्क से अलग होने के लिए मनाने की चर्चा चल रही है।

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। यहां की आबादी करीब 57 हजार है और यह आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसमें दुर्लभ खनिजों के भंडार हैं और अमेरिका की मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए यहां एक सैन्य आधार भी है। ट्रंप 2019 से ही ग्रीनलैंड को खरीदने या नियंत्रित करने की बात कहते रहे हैं, लेकिन हाल के दिनों में उनके बयानों ने तनाव बढ़ा दिया है। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट कहा है कि ग्रीनलैंड हासिल करना अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता है और इसके लिए सभी विकल्प खुले हैं, जिसमें सैन्य बल का उपयोग भी शामिल है।

डेनमार्क की कड़ी चेतावनी और 'शूट फर्स्ट' नीति

डेनमार्क की रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि 1952 की एक पुरानी सैन्य निर्देश अभी भी लागू है, जिसमें कहा गया है कि अगर कोई विदेशी सेना ग्रीनलैंड या डेनमार्क पर आक्रमण करती है, तो सैनिकों को बिना उच्च आदेश का इंतजार किए तुरंत जवाबी कार्रवाई करनी है - यानी 'पहले गोली मारो, बाद में सवाल पूछो'। यह निर्देश कोल्ड वॉर काल का है और इसे डेनिश अखबार बर्लिंग्सके ने उठाया था। रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यह नियम आज भी पूरी तरह प्रभावी है।

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डेनिश प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह नाटो गठबंधन का अंत होगा। उन्होंने कहा, "ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है और अमेरिका को अपने सहयोगी देश की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए।" ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसेन ने भी ट्रंप के बयानों को "कल्पना" बताते हुए कहा, "बस बहुत हो गया। ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला केवल हम करेंगे।"

यूरोपीय देश ग्रीनलैंड और डेनमार्क के साथ खड़े हुए

यूरोपीय देशों ने डेनमार्क का पूरा समर्थन किया है। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, पोलैंड, स्पेन और डेनमार्क के नेताओं ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि ग्रीनलैंड उसके लोगों का है और इसका फैसला केवल डेनमार्क व ग्रीनलैंड करेंगे। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने अगले हफ्ते डेनिश अधिकारियों से बात करने की बात कही है, लेकिन उन्होंने सैन्य कार्रवाई की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया।

ग्रीनलैंड निवासियों को नकद भुगतान की योजना

ट्रंप प्रशासन के अंदर एक और योजना पर चर्चा चल रही है - ग्रीनलैंड के हर निवासी को 10 हजार से 1 लाख अमेरिकी डॉलर (करीब 8 लाख से 80 लाख रुपये) तक का एकमुश्त भुगतान देकर उन्हें डेनमार्क से अलग होने और अमेरिका के साथ जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करना। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने बताया कि व्हाइट हाउस में इस पर गंभीर विचार हो रहा है। कुल मिलाकर यह रकम करीब 6 अरब डॉलर तक हो सकती है।

यह योजना ग्रीनलैंड को पहले स्वतंत्र बनाने और फिर अमेरिका के साथ समझौता करने की है। ग्रीनलैंड में ज्यादातर लोग डेनमार्क से स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन अमेरिका का हिस्सा बनने के खिलाफ हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह योजना 'लेन-देन' जैसी लग सकती है और ग्रीनलैंड के लोगों की स्वतंत्रता की भावना को ठेस पहुंचा सकती है।

रणनीतिक महत्व और वैश्विक चिंता

ट्रंप का तर्क है कि आर्कटिक में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण ग्रीनलैंड अमेरिकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। यहां नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और दुर्लभ खनिज हैं। लेकिन डेनमार्क कहता है कि 1951 के समझौते के तहत अमेरिका को पहले से ही ग्रीनलैंड में व्यापक सैन्य पहुंच है और अतिरिक्त आधार बनाने की जरूरत नहीं।

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यह विवाद नाटो गठबंधन के लिए बड़ा संकट बन सकता है, क्योंकि अमेरिका और डेनमार्क दोनों इसके सदस्य हैं। यूरोपीय देश चिंतित हैं कि ट्रंप की नीतियां पश्चिमी एकता को कमजोर कर सकती हैं। फिलहाल कूटनीतिक बातचीत जारी है, लेकिन तनाव कम होने के संकेत नहीं दिख रहे। यह मामला अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और गठबंधनों की मजबूती की परीक्षा है।