स्विट्ज़लैंड में शनिवार का दिन महत्वपूर्ण है। इसराइल हिज्बुल्लाह के बीच युद्ध विराम की घोषणा के बाद यूएस ईरान डील पर बातचीत फिर से शुरू होने जा रही है। ईरान के अरगची और यूएस के विटकॉफ शनिवार को स्विट्ज़रलैंड में आगे की बातचीत करेंगे। कुशनर पहले से ही मौजूद हैं।
स्विट्ज़रलैंड में यूएस ईरान पीस डील पर आगे की बातचीत फिर से
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते की कूटनीतिक कोशिशों को शनिवार को नया मोड़ मिल सकता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ स्विट्ज़रलैंड पहुंच रहे हैं, जहां ईरान के साथ संभावित परमाणु समझौते पर वार्ता का पहला दौर होने की उम्मीद है। इसी बीच, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची भी शनिवार को स्विट्ज़रलैंड की यात्रा करने वाले हैं।
हालांकि, बातचीत की योजना से जुड़े एक सूत्र ने बताया है कि कार्यक्रम में अंतिम समय पर बदलाव भी संभव है। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के दूत जेरेड कुशनर पहले ही स्विट्ज़रलैंड पहुंच चुके हैं और वार्ता की तैयारियों में लगे हुए हैं।
ट्रंप ने इसराइल पर डाला युद्धविराम का दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुलासा किया है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से इसराइल को हिज़्बुल्लाह के साथ युद्धविराम के लिए राजी करने की कोशिश की थी। ट्रंप ने कहा कि लेबनान में बढ़ती हिंसा न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बन रही थी, बल्कि ईरान के साथ चल रही व्यापक शांति प्रक्रिया को भी पटरी से उतार सकती थी।एनबीसी न्यूज को दिए एक टेलीफोनिक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि उन्होंने इसराइली अधिकारियों से बातचीत कर संयम बरतने की सलाह दी थी। ट्रंप के अनुसार, "कभी-कभी आपको शांत होना पड़ता है और समझदारी से काम लेना पड़ता है।"
हालांकि, उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या उन्होंने सीधे इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बात की थी या नहीं।
भीषण संघर्ष के बाद युद्धविराम लागू
ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब इसराइल और हिज़्बुल्लाह ने हालिया हिंसक झड़पों के बाद लेबनान में युद्धविराम पर सहमति जताई है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ते हमलों ने पूरे क्षेत्र को बड़े युद्ध की ओर धकेलने की आशंका पैदा कर दी थी।एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, लेबनान में स्थानीय समयानुसार शाम करीब 4 बजे युद्धविराम प्रभावी हो गया। अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी और क़तरी वार्ताकारों ने ईरान की मदद से इस समझौते को संभव बनाया। हिज़्बुल्लाह के दो सूत्रों और एक वरिष्ठ इसराइली अधिकारी ने भी युद्धविराम की पुष्टि की है। इसराइली अधिकारी ने कहा, "यदि हिज़्बुल्लाह हम पर हमला नहीं करता है, तो हमारे लिए यह युद्ध का समय नहीं है।" हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इसराइली सेना दक्षिणी लेबनान में तैनात रहेगी।
लेबनानी सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, युद्धविराम लागू होने के पहले घंटे में इसराइल ने कुछ हवाई हमले किए, लेकिन शाम 5 बजे के बाद किसी नए हमले की सूचना नहीं मिली।
लेबनान संकट के कारण टली थी अमेरिका-ईरान वार्ता
लेबनान में अचानक भड़की हिंसा के कारण अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्ज़रलैंड में प्रस्तावित वार्ताएं पहले स्थगित करनी पड़ी थीं। इन वार्ताओं को ईरान के परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा था। इस सप्ताह हुए अंतरिम समझौते के तहत वॉशिंगटन और तेहरान ने व्यापक समझौते तक पहुंचने के लिए खुद को 60 दिनों का समय दिया है। प्रस्तावित व्यापक समझौते में ईरान की परमाणु गतिविधियां, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।हिज़्बुल्लाह सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि आगे की बातचीत तभी संभव होगी जब लेबनान में व्यापक और स्थायी युद्धविराम लागू हो। वहीं ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने चेतावनी दी कि समझौते के तहत किए गए वादों को पूरा कराने की जिम्मेदारी अमेरिका की होगी।
ट्रंप ने किया पीस डील का बचाव
ईरान के साथ हुए अंतरिम समझौते को लेकर ट्रंप को अपने कुछ रिपब्लिकन सहयोगियों की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। आलोचकों का आरोप है कि इस समझौते में तेहरान को जरूरत से ज्यादा रियायतें दी गई हैं। इन आलोचनाओं का जवाब देते हुए ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि हालिया संघर्ष ने ईरान को काफी कमजोर कर दिया है। उन्होंने कहा, "युद्ध ने ईरान को कमजोर कर दिया है। हम मजबूरी में बातचीत नहीं कर रहे थे, ईरान कर रहा था। वे पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।" ट्रंप ने यह भी खारिज किया कि समझौते से ईरान को आर्थिक लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा, "हम पूरे 60 दिन की प्रक्रिया देखेंगे। उन्हें कोई पैसा नहीं मिलेगा, एक पैसा भी नहीं।"
विश्लेषकों का मानना है कि लेबनान में युद्धविराम और स्विट्ज़रलैंड में संभावित अमेरिका-ईरान वार्ता मध्य पूर्व में लंबे समय से चली आ रही अस्थिरता को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। हालांकि, दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और क्षेत्रीय तनाव अभी भी किसी स्थायी समझौते के रास्ते में बड़ी चुनौती बने हुए हैं।