ईरान के क़ेश्म द्वीप पर अमेरिका ने नये हमल किये हैं। इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर नए हमले चाहते हैं। ट्रंप ने तेहरान के साथ समझौते के भी संकेत दिए हैं।
ईरान पर अमेरिका ने फिर हमला किया
अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष में एक नया घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क़ेश्म द्वीप पर गुप्त सैन्य हमले किए हैं। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से सामने आई इस खबर के बाद पश्चिम एशिया में एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की आशंका बढ़ गई है।
इन हमलों की खबर ऐसे समय आई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए संभावित समझौते की बात कर रहे हैं। वहीं, इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनावों के बाद ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का नया दौर शुरू करे।
हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, क़ेश्म द्वीप पर की गई कार्रवाई सीमित थी। इसका उद्देश्य ईरान के साथ बड़े पैमाने पर युद्ध दोबारा शुरू करने का संकेत देना नहीं था।
क़ेश्म द्वीप पर क्या हुआ? अमेरिकी हमलों की खबर के बाद कई धमाके
क़ेश्म द्वीप ईरान के दक्षिणी तट के पास स्थित है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास इसकी रणनीतिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है।
- ईरानी सरकारी समाचार एजेंसी IRNA ने क़ेश्म द्वीप पर कई धमाकों की खबर दी। इसके बाद अमेरिकी मीडिया में खबरें आईं कि अमेरिकी सेना ने द्वीप पर हमले किए हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने हमलों की पुष्टि करते हुए इन्हें सीमित और रक्षात्मक कार्रवाई बताया। एक अधिकारी के अनुसार, ईरानी सेना अमेरिकी सैन्य संसाधनों के खिलाफ सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल कर रही थी। इसी खतरे के जवाब में कार्रवाई की गई।
हालांकि, इन हमलों में कितने लोग मारे गए या घायल हुए, इसकी तत्काल कोई पुष्टि नहीं हुई। हमले से ईरान के सैन्य ठिकानों को कितना नुकसान पहुंचा, इसकी भी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने पिछले कुछ हफ्तों में ईरान के खिलाफ ऐसी सीमित कार्रवाइयां की हैं, जिन्हें सार्वजनिक रूप से ज्यादा प्रचारित नहीं किया गया। इसका उद्देश्य यह संकेत देने से बचना था कि अमेरिका बड़े पैमाने पर युद्ध फिर शुरू करना चाहता है।
ट्रंप का रुख: हमला भी, समझौते की संभावना भी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों में ईरान को लेकर दो अलग-अलग संकेत दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ उन्होंने ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने और जरूरत पड़ने पर नए हमले करने की बात कही है। दूसरी ओर, उन्होंने तेहरान के साथ समझौते की संभावना से भी इनकार नहीं किया है। 2 नवंबर को पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ समझौता हो सकता है। उनसे जब पूछा गया कि क्या वह अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के बाद ईरान पर हमला करने की योजना बना रहे हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, “नहीं।” यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी मीडिया में खबरें थीं कि नेतन्याहू ट्रंप को चुनावों के बाद ईरान पर नए हमले करने के लिए राजी करने की कोशिश कर रहे हैं।ट्रंप ने इससे पहले भी कहा था कि अमेरिका ईरान के साथ बातचीत को लेकर जल्दबाजी में नहीं है। उनके मुताबिक, अमेरिका पहले ही ईरान की नौसेना, वायुसेना और सैन्य क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचा चुका है। लेकिन ट्रंप के इन बयानों के बावजूद क़ेश्म द्वीप पर हमले की खबर ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका बातचीत के साथ-साथ ईरान पर सैन्य दबाव बनाए रखने की रणनीति अपना रहा है।
ट्रंप पर नेतन्याहू का दबाव
इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू करने के पक्ष में हैं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नेतन्याहू ने 31 अक्टूबर को ट्रंप के साथ फोन पर बातचीत में ईरान पर नए हमलों का मुद्दा उठाया था। नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका 3 नवंबर के मिडटर्म चुनावों के तुरंत बाद ईरान के खिलाफ एक नया सैन्य अभियान शुरू करे। इस दबाव के पीछे इसराइल की घरेलू राजनीति भी एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है।इसराइल में हालिया चुनावों के बाद नेतन्याहू के गठबंधन को 120 सदस्यीय संसद यानी नेसेट में 53 सीटें मिली हैं। सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। ऐसे में नेतन्याहू के सामने राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान के खिलाफ नए युद्ध से इसराइल में राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीतिक एकजुटता पैदा हो सकती है और नेतन्याहू को सरकार बनाने में मदद मिल सकती है।
अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्टों के अनुसार, नेतन्याहू और ट्रंप के बीच बातचीत में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं पर चर्चा हुई, लेकिन ट्रंप ने कोई अंतिम फैसला नहीं किया है। अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारी बातचीत को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं, जबकि इसराइल नए सैन्य अभियान की वकालत कर रहा है।
कतर की मध्यस्थता से अमेरिका-ईरान बातचीत जारी
ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव के बावजूद कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। कतर दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कर रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, कतर के अधिकारियों ने ईरानी प्रतिनिधियों के साथ लगातार कई दौर की बातचीत की है। इन चर्चाओं का उद्देश्य युद्ध समाप्त करने के लिए एक ऐसा समझौता तैयार करना है, जिस पर अमेरिका और ईरान दोनों सहमत हो सकें। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि बातचीत जारी है, लेकिन अभी तक कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है।ईरान की ओर से सामने आए प्रस्ताव में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की संभावना भी शामिल है। अराघची के मुताबिक, यदि अमेरिका ईरान की शर्तें स्वीकार करता है, तो इस समुद्री मार्ग को दो दिनों के भीतर खोला जा सकता है। ईरान की प्रमुख मांगों में अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करना, तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में राहत देना और क्षेत्र में जारी सैन्य कार्रवाई रोकना शामिल है।
हालांकि, ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि बातचीत का मतलब अपनी सैन्य तैयारी कमजोर करना नहीं है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की ओर से ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रज़ाई को बातचीत दोबारा शुरू करने के संबंध में पत्र भेजे जाने की खबरें भी सामने आई हैं। इससे संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
होर्मुज़ पर संकट का असर, तेल की कीमतों में उछाल
क़ेश्म द्वीप पर हमले की खबर का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी दिखाई दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को शुरुआती एशियाई कारोबार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.5 प्रतिशत बढ़कर 105.25 डॉलर प्रति बैरल हो गई। अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमत भी 0.5 प्रतिशत बढ़कर 96.93 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। इससे पहले सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत में 7.63 प्रतिशत की गिरावट आई थी और यह 104.77 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था।तेल बाजार में इस उतार-चढ़ाव की वजह अमेरिका-ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता है। एक तरफ समझौते की संभावनाओं से तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, दूसरी तरफ नए हमलों की खबरें आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ा रही हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक है। यहां लंबे समय तक सैन्य टकराव होने से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
इसका असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर भी पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से आयात बिल, महंगाई और ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
क्या मिडटर्म चुनावों के बाद फिर शुरू होगा बड़ा युद्ध?
अमेरिका-ईरान संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक बातचीत एक साथ चल रही हैं। क़ेश्म द्वीप पर अमेरिकी हमलों की खबरें इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बनाए हुए है। लेकिन इन हमलों को बड़े युद्ध की वापसी का संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, कार्रवाई सीमित और रक्षात्मक थी। ट्रंप ने भी ईरान पर नए हमले की संभावना को लेकर स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं जताई है। दूसरी ओर, नेतन्याहू की मांग, अमेरिकी सैन्य तैयारियां और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जारी तनाव इस संघर्ष को और गंभीर बना सकते हैं। यदि बातचीत विफल होती है और अमेरिका-इसराइल नए हमले शुरू करते हैं, तो ईरान की जवाबी कार्रवाई से पूरे पश्चिम एशिया में संघर्ष फैलने का खतरा बढ़ सकता है। इसमें खाड़ी देशों की ऊर्जा सुविधाएं, समुद्री व्यापार और अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी प्रभावित हो सकते हैं।