मिडिल ईस्ट में महीनों से जारी तनाव अब एक नए और अधिक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। लाल सागर (रेड सी) और अरब सागर के बीच फैले इस रणनीतिक क्षेत्र में अब केवल हूती विद्रोहियों और जहाजों के बीच टकराव नहीं रह गया है, बल्कि सीधे सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठान भी निशाने पर आने लगे हैं। ऐसे समय में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में सऊदी अरब के साथ एक महत्वपूर्ण असैन्य परमाणु समझौता किया है, हूती विद्रोहियों के हमलों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
यमन के हूती विद्रोहियों ने दावा किया है कि उन्होंने सऊदी अरब के जिजान (Jizan) और यनबू (Yanbu) स्थित अरामको (Saudi Aramco) के तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया है। यदि यह दावा सही है तो यह केवल सऊदी अरब पर हमला नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अमेरिका की पश्चिम एशिया नीति को सीधी चुनौती माना जाएगा।

हूतियों ने क्यों बदला निशाना?

हूती संगठन के सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने कहा कि उनके लड़ाकों ने जिजान और यनबू के तेल प्रतिष्ठानों पर सैन्य अभियान चलाया। हालांकि सऊदी सरकार ने आधिकारिक तौर पर इन हमलों की पुष्टि नहीं की है, लेकिन सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में जिजान स्थित अरामको रिफाइनरी से काला धुआं उठता दिखाई दिया, जिससे वहां हमले की आशंका जताई जा रही है। ग्रीस के सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, यमन से दागी गई दो बैलिस्टिक मिसाइलों को सऊदी वायु रक्षा प्रणाली ने यनबू की दिशा में मार गिराया। इससे पहले सऊदी प्रशासन ने जिजान और यनबू के निवासियों को एहतियाती चेतावनी भी जारी की थी क्योंकि हूतियों ने सऊदी हमलों का बदला लेने की धमकी दी थी।

रेड सी में नया फ्लैश प्वाइंट क्यों बना?

अब तक हूती विद्रोही मुख्य रूप से इसराइल से जुड़े या पश्चिमी देशों के जहाजों को निशाना बना रहे थे। लेकिन अब उन्होंने सीधे सऊदी अरब के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इससे रेड सी में संघर्ष का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। कुछ दिन पहले हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी (Maritime Blockade) की घोषणा की थी। उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने लाल सागर में सऊदी से जुड़े दो जहाजों पर हमला किया है। इनमें से एक घटना की पुष्टि स्वयं रियाद ने भी की थी। इसके बाद अब तेल प्रतिष्ठानों पर हमले इस संघर्ष को और व्यापक बना रहे हैं।

सऊदी अरब की चिंता क्यों बढ़ी? सऊदी अरब पिछले कुछ वर्षों से यमन युद्ध से दूरी बनाकर आर्थिक सुधारों और 'विजन 2030' पर ध्यान देना चाहता था। चीन की मध्यस्थता में ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंधों में भी सुधार हुआ था। लेकिन अब हूती हमलों ने रियाद की सुरक्षा रणनीति को फिर चुनौती दे दी है। सऊदी समर्थित यमनी सरकार भी अब खुलकर सैन्य कार्रवाई कर रही है। सैन्य अधिकारियों के अनुसार, सरकारी विमानों ने मारीब (Marib) और अल-जौफ (Al-Jawf) प्रांतों में हूतियों के मिसाइल और ड्रोन लॉन्चिंग ठिकानों तथा हथियार भंडारों पर हवाई हमले किए हैं। इससे संघर्ष और तेज होने की आशंका बढ़ गई है।

ट्रंप-सऊदी परमाणु समझौते के बाद क्यों बढ़ा तनाव?

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग समझौते को आगे बढ़ाना केवल ऊर्जा सहयोग नहीं, बल्कि ईरान के बढ़ते प्रभाव का जवाब भी है। अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब क्षेत्र में उसका सबसे मजबूत रणनीतिक साझेदार बना रहे।
हूतियों को ईरान समर्थित संगठन माना जाता है। ऐसे में सऊदी अरब की रणनीतिक क्षमता बढ़ाने वाले किसी भी अमेरिकी कदम को तेहरान और उसके सहयोगी अपने खिलाफ शक्ति संतुलन बदलने की कोशिश के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि परमाणु समझौते के तुरंत बाद सऊदी ठिकानों पर हमले केवल सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी माने जा रहे हैं।

रेड सी और होर्मुज, दोनों मोर्चों पर संकट

पश्चिम एशिया में यह तनाव केवल रेड सी तक सीमित नहीं है। फरवरी में अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में दबाव बढ़ाया था। अब रेड सी में हूतियों की आक्रामकता ने दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों को एक साथ संकट में डाल दिया है।
होर्मुज से दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है, जबकि लाल सागर और बाब-अल-मंदेब मार्ग यूरोप और एशिया के बीच व्यापार की जीवनरेखा हैं। यदि दोनों मार्ग अस्थिर रहते हैं तो तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक महंगाई पर व्यापक असर पड़ सकता है।

ईरान पर ट्रंप का बयान क्या संकेत देता है?

इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका फिलहाल ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान को रोककर बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा, "हम उनसे बातचीत कर रहे हैं। मुझे लगता है कि इस बार वे पहले की तुलना में कहीं अधिक गंभीर हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि समझौता निश्चित हो जाएगा।" हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जरूरत पड़ी तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। ट्रंप ने कहा, "हम पूरी तरह तैयार हैं।" उन्होंने दोहराया कि ईरान का परमाणु हथियार क्षमता के करीब पहुंचना अमेरिका के लिए 'रेड लाइन' बना रहेगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि रूस और चीन ईरान को हथियार उपलब्ध करा रहे हैं, हालांकि खुफिया सहयोग की खबरें सामने आती रही हैं।

चीन भी सक्रिय

इस बीच चीन ने भी कूटनीतिक पहल तेज कर दी है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने किर्गिस्तान में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची से मुलाकात की। चीनी सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding) की आवश्यकता पर चर्चा की।

क्या आगे और बड़ा टकराव हो सकता है?

सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर कथित हमले इस बात का संकेत हैं कि पश्चिम एशिया का संघर्ष अब केवल ग़ज़ा, ईरान या यमन तक सीमित नहीं रह गया है। यदि हूती विद्रोही सऊदी ऊर्जा ढांचे को लगातार निशाना बनाते हैं और इसके जवाब में रियाद सैन्य कार्रवाई तेज करता है, तो यह संघर्ष पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैल सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रेड सी और होर्मुज दोनों समुद्री मार्गों पर बढ़ता तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे में अमेरिका, सऊदी अरब, ईरान और चीन की अगली कूटनीतिक एवं सैन्य चालें तय करेंगी कि यह संकट बातचीत से सुलझेगा या पश्चिम एशिया एक और व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की ओर बढ़ेगा।