इस चुनाव का सबसे बड़ा नुकसान ट्रंप को ही हुआ है
क्या धार्मिक ध्रुवीकरण, सामाजिक विभाजन और नफ़रत की राजनीति के सहारे कोई राजनीतिक दल हमेशा सत्ता में बना रह सकता है? अमेरिकी राजनीति का अनुभव बताता है कि लोकतंत्र में कोई भी नेता और विचारधारा जनता की नाराज़गी से बड़ी नहीं होती। भारतीय दक्षिणपंथ को भी इस सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को अमेरिकी चुनावों में लगे झटके ने एक बार फिर दुनिया भर की दक्षिणपंथी राजनीति के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति का टर्निंग पाइंट नहीं है। इसका असर उन तमाम देशों की राजनीति पर पड़ सकता है जहाँ राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक श्रेष्ठता और किसी समुदाय के प्रति भय को राजनीतिक समर्थन जुटाने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
भारत भी इससे अछूता नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण, अल्पसंख्यकों के प्रति नफ़रत, सामाजिक विभाजन और आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रभाव लगातार बढ़ा है। ऐसे में ट्रम्प की चुनावी पराजय या उनकी पार्टी को मिले जनादेश का संदेश भारतीय दक्षिणपंथी दलों के लिए भी विचारणीय है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नफ़रत और विभाजन की राजनीति के सहारे जनता को हमेशा अपने साथ रखा जा सकता है? क्या मतदाता की धार्मिक और भावनात्मक पहचान उसके आर्थिक और सामाजिक हितों पर हमेशा भारी पड़ सकती है?
नफ़रत की राजनीति चुनाव जिता सकती है, शासन नहीं चला सकती
राजनीति में धर्म, जाति, नस्ल और राष्ट्रीय पहचान का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। दुनिया के अनेक देशों में राजनीतिक दल इन पहचानों के सहारे अपना जनाधार मजबूत करते रहे हैं। किसी समुदाय को दूसरे समुदाय के सामने ख़तरे के रूप में प्रस्तुत करना, अतीत की घटनाओं को लगातार वर्तमान की राजनीति में इस्तेमाल करना और समाज को स्थायी रूप से दो खेमों में बाँट देना चुनावी दृष्टि से लाभदायक हो सकता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इस राजनीति को शासन का विकल्प बना दिया जाता है।
आखिर जनता को रोज़गार चाहिए, महँगाई से राहत चाहिए, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहिए। युवाओं को अपने भविष्य की चिंता है। किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य चाहिए। मध्यम वर्ग को आर्थिक सुरक्षा चाहिए।
इन सवालों का जवाब किसी धार्मिक नारे या किसी समुदाय के प्रति नफ़रत से नहीं दिया जा सकता।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि चुनाव के समय भावनात्मक मुद्दे जनता को आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन जब आप सत्ता में होते हैं, सरकार चला रहे होते हैं तो जनता अपने जीवन की वास्तविक समस्याओं के हल भी माँगती है।
ट्रम्प की राजनीति में भी राष्ट्रवाद, प्रवासन विरोध और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन इन मुद्दों के साथ आर्थिक असंतोष, महँगाई और प्रशासनिक प्रदर्शन से जुड़े सवाल भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करते हैं।
जनता की चुप्पी को उसकी सहमति मत समझिए
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण सबक़ यह है कि जनता की सहनशीलता को उसकी स्थायी सहमति नहीं समझना चाहिए। कई बार समाज में नफ़रत की भाषा सामान्य होने लगती है। सार्वजनिक मंचों से किसी समुदाय के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियाँ की जाती हैं। हिंसा की घटनाओं पर राजनीतिक चुप्पी दिखाई देती है। संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। इसके बावजूद चुनावी समर्थन बना रह सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि समाज ने इन सबको हमेशा के लिए स्वीकार कर लिया है।
लोग कई कारणों से चुप रह सकते हैं। वे तत्काल विरोध न करें, लेकिन उनके मन में असंतोष जमा होता रहता है। जब आर्थिक परेशानियाँ, सामाजिक तनाव और राजनीतिक अहंकार एक साथ जुड़ते हैं, तो चुनावी परिणाम बदल सकते हैं।
किसी नेता की लोकप्रियता और किसी राजनीतिक दल की अजेयता दो अलग-अलग बातें हैं। लोकतंत्र में जनता किसी को सत्ता सौंपती है, लेकिन वह सत्ता वापस लेने का अधिकार भी अपने पास रखती है।
क्या अमेरिकी और भारतीय मतदाताओं का चरित्र अलग है?
यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। क्या अमेरिकी मतदाता और भारतीय मतदाता इतने अलग हैं कि अमेरिका में जिस तरह का चुनावी बदलाव दिखाई देता है, उसकी भारत में कल्पना नहीं की जा सकती? निश्चित रूप से दोनों देशों की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में अंतर है। अमेरिका में मुख्यतः दो बड़ी पार्टियों के बीच मुकाबला होता है। वहाँ नस्ल, प्रवासन, गर्भपात, धार्मिक स्वतंत्रता और आर्थिक नीतियाँ चुनावी विमर्श को प्रभावित करती हैं।
भारत की स्थिति अलग है। यहाँ बहुदलीय लोकतंत्र है। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय नेतृत्व चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी मतदाताओं की प्राथमिकताएँ बदल सकती हैं। लेकिन इन भिन्नताओं के बावजूद दोनों देशों के मतदाताओं की कुछ बुनियादी आकांक्षाएँ समान हैं। वे बेहतर जीवन चाहते हैं, अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित देखना चाहते हैं और ऐसी सरकार चाहते हैं जो उनकी समस्याओं का समाधान करे।
भारतीय मतदाता को केवल धार्मिक पहचान से संचालित होने वाला मतदाता मान लेना भी एक बड़ी राजनीतिक भूल होगी। भारत के 2024 के लोकसभा चुनाव इसका उदाहरण हैं। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी। उसे सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ी।
इस चुनाव ने स्पष्ट किया कि भारतीय मतदाता सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता रखता है। इसलिए यह मानना गलत होगा कि भारतीय समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रभाव हमेशा एक जैसा बना रहेगा।
धार्मिक बहुसंख्यकवाद स्थायी जनादेश नहीं है
भारतीय दक्षिणपंथी राजनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या धार्मिक बहुसंख्यकवाद को स्थायी राजनीतिक समर्थन की गारंटी मान लिया गया है? लोकतंत्र में बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन बहुसंख्यक होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी सरकार को अल्पसंख्यकों के अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी करने का अधिकार मिल जाता है।लोकतंत्र केवल बहुमत से सरकार बनाने की व्यवस्था नहीं है। यह असहमति का सम्मान करने, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखने की व्यवस्था भी है। यदि किसी राजनीतिक दल को लगता है कि धार्मिक ध्रुवीकरण के सहारे वह हमेशा चुनाव जीतता रहेगा, तो यह उसकी राजनीतिक दूरदर्शिता की कमी है।
समाज की बनावट स्थिर नहीं होती। नई पीढ़ियाँ आती हैं। उनकी आकांक्षाएँ बदलती हैं। रोज़गार, शिक्षा, तकनीक और आर्थिक अवसरों से जुड़े सवाल अधिक महत्वपूर्ण होते जाते हैं। धार्मिक पहचान के साथ-साथ नागरिक अपने व्यक्तिगत और आर्थिक हितों को भी महत्व देते हैं।
विपक्ष की भी है बड़ी जिम्मेदारी
हालाँकि यह उम्मीद करना पर्याप्त नहीं होगा कि जनता एक दिन अपने आप नफ़रत की राजनीति से ऊब जाएगी। विपक्षी दलों की भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। उन्हें केवल सत्ता विरोधी भावना या धार्मिक ध्रुवीकरण के विरोध के आधार पर राजनीतिक समर्थन हासिल करने उम्मीद नहीं करनी चाहिए। उन्हें रोज़गार, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और युवाओं के सवालों पर विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना होगा। सामाजिक सद्भाव को केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि बेहतर लोकतंत्र और बेहतर जीवन की बुनियादी शर्त के रूप में सामने लाना होगा।
विपक्ष को यह भी समझना होगा कि जनता केवल किसी सरकार को हराने के लिए वोट नहीं करती, वह किसी बेहतर विकल्प की उम्मीद में भी वोट करती है।
लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक है
ट्रम्प की चुनावी पराजय को दक्षिणपंथी राजनीति के अंत के रूप में देखना जल्दबाज़ी होगी। अमेरिका में दक्षिणपंथी राजनीति समाप्त नहीं हुई है और न ही किसी एक चुनाव से वहाँ के समाज की पूरी राजनीतिक सोच बदल जाने का निष्कर्ष निकाला जा सकता है। लेकिन यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण चेतावनी अवश्य देता है।
कोई भी नेता अपनी लोकप्रियता को स्थायी जनादेश नहीं समझ सकता। कोई भी राजनीतिक दल यह नहीं मान सकता कि धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान के आधार पर बना उसका समर्थन कभी कम नहीं होगा।
भारतीय राजनीति के लिए भी यही सबसे बड़ा सबक़ है। नफ़रत की राजनीति कुछ समय तक भावनाओं को प्रभावित कर सकती है, लेकिन वह हमेशा जनता के जीवन की वास्तविक समस्याओं को ढककर नहीं रख सकती। आखिरकार लोगों को अपने बच्चों के लिए शिक्षा चाहिए, युवाओं को रोज़गार चाहिए, परिवारों को आर्थिक सुरक्षा चाहिए और समाज को शांति चाहिए।
जनता किसी राजनीतिक दल की स्थायी अनुयायी नहीं होती। वह लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत और सत्ता की वास्तविक मालिक होती है। नफ़रत के सहारे कुछ चुनाव जीते जा सकते हैं, लेकिन जनता के विश्वास के बिना लोकतंत्र में लंबे समय तक शासन नहीं किया जा सकता। यही वह सबक़ है जिसे अमेरिकी चुनावों के बाद भारतीय दक्षिणपंथी राजनीति को भी गंभीरता से समझने की ज़रूरत है।
लेकिन मौजूदा भारत में मतदाताओं के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है जो अमेरिका में नहीं है और वह है चुनाव चोरी। अमेरिका में मतदाता अपनी राय को व्यक्त कर सके क्योंकि वहाँ सचमुच में चुनाव हुए। भारत में पिछले पाँच-छह साल से चुनाव के नाम पर धोखाधड़ी की जा रही है।
यानी अगर मतदाता मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ है तो भी वह जनमत सामने नहीं दिख पा रहा है। इसीलिए भारतीय लोकतंत्र के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती बन गया है कि चुनाव प्रणाली को दुरुस्त किया जाए, सत्तारूढ़ दल को छद्म जनमत के आधार पर सत्ता हासिल करने से रोका जाए।