सवाल ये नहीं है कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश में भारत के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में घुसपैठ की है या नहीं? सवाल तो ये है कि जिन क्षेत्रों को भारत और चीन दोनों अघोषित रूप से नो मैन्स लैंड मान चुके थे, उन क्षेत्रों में चीन नयी सड़कें, नए सैनिक ठिकाने और नयी बस्तियाँ बना रहा है या नहीं? अघोषित रूप में स्वीकृत नो मेन्स लैंड इलाक़े में भारत और चीन, दोनों के सैनिक और अर्ध सैनिक गश्त करते थे। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय किसान अपने पशुओं को चराने के लिए ले जाते थे। आरोप ये है कि पिछले कुछ महीनों से चीन उन इलाक़ों में भारतीय गश्ती दल को जाने नहीं दे रहा है।
अरुणाचल में भारत के एलएसी यानी लाइन ऑफ़ कंट्रोल के बाद चीन के एलएसी के बीच चीन की कोई बस्ती, सैनिक अड्डा और सड़क नहीं थी। अब इन क्षेत्रों का नक्शा बदल रहा है। चीन अब भारतीय किसानों और स्थानीय लोगों को भी इन क्षेत्रों में नहीं जाने दे रहा है। यानी चीन उसे अपना क्षेत्र घोषित कर चुका है। इसी तरह से चीन ने 2020 में लद्दाख के गलवान और प्योंगयांग झील के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा किया था। बताया जाता है कि इन इलाक़ों के कुछ क्षेत्रों में भारतीय सेना की गश्त अब भी बंद है। सवाल ये भी है कि भारत सरकार इसे बर्दाश्त क्यों कर रही है। इसका जवाब आईटीबीपी के महानिदेशक के हाल के भाषण में मिल जाता है।
आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने 22 अक्टूबर के भाषण में कई अहम मुद्दों को रेखांकित किया। अरुणाचल के अनेक संगठन और विपक्षी पार्टियाँ इन्हीं मुद्दों को लंबे समय से उठा रही हैं। शत्रुजीत कपूर अलवर में आईटीबीपी के एक समारोह में जवानों को संबोधित कर रहे थे। कुछ मुद्दे इस प्रकार हैं-
- अरुणाचल प्रदेश सीमा पर भारत और चीन के सुरक्षा बलों के बीच लगातार ‘फेस ऑफ’ हो रहा है। यह अभी भी जारी है। मतलब ये कि आमने सामने ज़बानी झड़प हो रही है।
- चीन के साथ मुक़ाबला के लिए पारंपरिक हथियार और तैयारी काफ़ी नहीं है।
- यूक्रेन और ईरान उदाहरण हैं जो नयी युद्ध नीति से रूस और अमेरिका जैसी बड़ी ताक़तों का लंबे समय से मुक़ाबला कर रहे हैं।
- चीन “सबसे कठिन” और “सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी” है।
- भारतीय सुरक्षा बलों को ड्रोन, भूमिगत बंकर और आधुनिक प्रशिक्षण की ज़रूरत है।
जिन क्षेत्रों में लगातार भारतीय और चीनी सुरक्षा बलों के बीच फेस ऑफ (झड़प) हो रही है उनमें तक्सिंग सर्कल और आसपास के क्षेत्र माजा और असफीला इलाके शामिल हैं। चीनी सेना जिसका आधिकारिक नाम पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए है, ने जुलाई 2026 के अंत से इन इलाकों में स्थायी टेंट लगाए, जो भारत की एलएसी की धारणा के अनुसार भारत के 6 से 7 किलोमीटर अंदर बताए गए हैं। स्थानीय रिपोर्टों में गेलिमो और शेरा 5 पेट्रोलिंग पॉइंट, और अन्य चरागाह तथा शिकार क्षेत्रों का जिक्र है, जहाँ चीन अब भारतीय लोगों को जाने नहीं दे रहा है। अन्य विवादित और संवेदनशील क्षेत्र जैसे लॉन्गजू, बीसा, माजा, अपर सुबनसिरी, तुल्लुंग ला और यांगत्से को चीन अपना बताता है।
ये मुख्य रूप से फेस-ऑफ यानी आमना-सामना हैं, न कि 2020 के गलवान जैसी बड़ी हिंसक झड़प। दोनों पक्ष गश्त के दौरान आमने-सामने आते हैं क्योंकि एलएसी की धारणा अलग-अलग है। लेकिन जिन क्षेत्रों में पहले भारत पेट्रोलिंग करता था उसमें अब भारतीयों को जाने से रोकना भारत के दावों से पूरी तरह इंकार करने जैसा है।
चीन के अतिक्रमण वाले क्षेत्र
स्थानीय संगठन, नाह वेलफेयर सोसायटी और पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल की फैक्ट-फाइंडिंग टीम और अन्य रिपोर्टों में अपर सुबनसिरी (तक्सिंग-गेलिमो क्षेत्र) में पीएलए द्वारा सड़कें, पुल, कैंप बनाने और भारतीय गश्त पॉइंट्स तक पहुँच रोकने की शिकायतें हैं। चरागाह, शिकार के मैदान और पारंपरिक जमीन पर चीन लगातार स्थायी कब्जा कर रहा है। सरकार और भारतीय सेना ने कई बार इन दावों को “गलत” या अतिरंजित बताया है, लेकिन इन क्षेत्रों में चीन की गतिविधि बढ़ने की बात स्वीकार की। ताजा संघर्ष जुलाई 2026 के अंत से शुरू हुआ और अब तक जारी है। आईटीबीपी के डीजी ने पुष्टि की है कि कई स्थानों पर फेस-ऑफ अभी भी चल रहा है। सितंबर 2026 में कोर कमांडर स्तर की वार्ता हुई, लेकिन तनाव बना हुआ है। भारत के आधिकारिक बयान के अनुसार 1962 के युद्ध के बाद चीन ने किसी अतिरिक्त भूमि पर कब्जा नहीं किया है। कुछ छोटे क्षेत्र जैसे लांगर 1959 से और बीसा, माजा आदि लंबे समय से विवादित हैं और चीनी नियंत्रण में हैं।सरकार बार बार कहती है कि 1962 के बाद चीन ने “एक इंच भी” अतिरिक्त भूमि पर कब्जा नहीं किया। लेकिन भारत सरकार इस बात का जवाब नहीं देती कि जिन क्षेत्रों में पहले भारत के सुरक्षा बलों को गश्त करने का अधिकार था उन क्षेत्रों में अब भारतीयों को घुसने दिया जा रहा है या नहीं? स्थानीय लोग पारंपरिक चरागाहों तक जा पा रहे हैं या नहीं? चीन इन क्षेत्रों में सड़क, स्थायी बस्ती और सैनिक अड्डे बना रहा है या नहीं? स्थानीय लोगों ने इन क्षेत्रों में चीन की नयी गतिविधियों की तस्वीर और वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। सैटेलाइट तस्वीरों में भी चीन की गतिविधियां साफ़ दिखाई दे रही हैं। कई जगहों पर स्थानीय लोगों ने भारतीय सुरक्षा बलों के सामने प्रदर्शन करके चीन के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग भी की।
भारत कुल मिलाकर अक्साई चीन इलाके में लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन के अवैध कब्जे में बताता है। दूसरी तरफ़ पूरे अरुणाचल प्रदेश की लगभग 90,000 वर्ग किमी जमीन पर चीन दावा करता है।
ITBP डीजी के बयान पर MEA की सफाई
आईटीबीपी महानिदेशक के बयान के अगले दिन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि “जब चीनी सेनाएँ स्थापित गश्त पैटर्न से हटती हैं तो भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में स्थिति समय-समय पर बिगड़ जाती है। दोनों पक्ष मौजूदा राजनयिक और सैन्य तंत्रों का उपयोग कर मुद्दों को सुलझा रहे हैं और गलतफहमी से बच रहे हैं। एलएसी की समझ सुधारने पर चर्चा हो रही है। सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए जरूरी है।” लेकिन मुश्किल ये है कि सरकार कभी इस बात पर चर्चा नहीं करती कि जिसे अघोषित तौर पर नो मेन्स लैंड मान लिया गया था उसमें चीनी सेना सड़क, स्थायी सैनिक और नागरिक ठिकाने बना कर अपना कब्जा पक्का कर रही है या नहीं?चीन की सीमा पर भारत नरम रूख क्यों अपनाता है, इस सवाल का एक जवाब आईटीबीपी महानिदेशक के बयान में छिपा है। चीनी सीमा क्षेत्र में भारत का सुरक्षा नेटवर्क अब भी कमजोर है। भारत ने पाकिस्तानी सीमा पर चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था कर रखी है। उसके मुकाबले चीनी सीमा उपेक्षित है। सड़कों की अब भी कमी है। आधुनिक बंकर बहुत कम हैं जिसके चलते भारतीय सुरक्षा बल का मजबूत कार्रवाई करना मुश्किल है। चीन इस क्षेत्र में काफ़ी मज़बूत हो चुका है। युद्ध की स्थिति में भारत को ड्रोन और आधुनिक मिसाइलों की ज़रूरत होगी। आईटीबीपी के महानिदेशक के बयान में इस कमज़ोरी के साफ़ संकेत हैं।
ईरान अपने मिसाइलों और ड्रोन की मदद से अमेरिका और इसराइल का मुक़ाबला कर रहा है। यूक्रेन और रूस का युद्ध भी मिसाइल और ड्रोन का युद्ध बन गया है। भारत चीन के मुक़ाबले काफ़ी पीछे माना जाता है। भारत की सबसे बड़ी ताक़त है अरुणाचल प्रदेश की जनता जो मजबूती के साथ भारत से जुड़ी है। भारत की कमजोरी के राजनीतिक और व्यापारिक मुद्दों पर हम यहाँ बात नहीं करेंगे। लेकिन इस क्षेत्र में केंद्र सरकार की ढुलमुल नीति के चलते स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ रही है।