दिल्ली में करीब 33 लाख मतदाताओं को “logical discrepancy” अथवा पिछली SIR सूची से नाम न मिलने के आधार पर नोटिस जारी किए गए हैं। मसौदा मतदाता सूची से लगभग 47 लाख पुराने नाम बाहर हैं। पश्चिम बंगाल में 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिनमें से 22.21 लाख ने अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए अपील कर दी। कुल 38 लाख से अधिक अपीलों में करीब 37 लाख अभी लंबित हैं। मौजूदा गति से इन्हें निपटाने में कई वर्ष लग सकते हैं। इन तथ्यों के बाद भी यदि कोई कहता है कि SIR सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है और चिंता की कोई बात नहीं, तो वह समस्या को समझ नहीं रहा या समझना नहीं चाहता।
आज सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली SIR से संबंधित जिस याचिका की सुनवाई सूचीबद्ध है, उसका सवाल बहुत सीधा है। चुनाव आयोग उन नागरिकों के नाम और प्रत्येक नोटिस का वास्तविक कारण सार्वजनिक क्यों नहीं करता जिन्हें “logical discrepancy” के नाम पर अपने दस्तावेज लेकर उपस्थित होने को कहा गया है? यह कौन-सा algorithm है, किन मापदंडों पर काम करता है और किसी नागरिक के नाम, उम्र या पारिवारिक विवरण में ठीक कौन-सी विसंगति पाई गई—यह उसे स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बताया जाता?
“Logical discrepancy” कोई जादुई मंत्र नहीं है जिसे बोलते ही संवैधानिक सवाल समाप्त हो जाएँ। यदि किसी व्यक्ति से उसका मताधिकार छीने जाने की संभावना पैदा की जा रही है तो उसे अपने विरुद्ध मौजूद सामग्री जानने का अधिकार है। अस्पष्ट नोटिस न्यायपूर्ण सुनवाई का आधार नहीं हो सकता।
दिल्ली में विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, स्वयं चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू, विदेश सचिव, CBI निदेशक, पूर्व RBI गवर्नर, पूर्व वायुसेना प्रमुख, वरिष्ठ नौकरशाहों और पूर्व न्यायाधीशों के परिवारों तक को नोटिस मिले हैं। दिवंगत अर्थशास्त्री विवेक देबरॉय तक का नाम नोटिस वाली सूची में आ गया। यदि देश के सर्वोच्च पदों पर रहे लोग और स्वयं चुनाव आयुक्त आयोग के software की कसौटी पर संदिग्ध बन सकते हैं, तो किसी झुग्गी में रहने वाले मजदूर, किरायेदार, प्रवासी, बुजुर्ग महिला, बेघर व्यक्ति, यौनकर्मी अथवा अनपढ़ ग्रामीण की क्या स्थिति होगी?
चुनाव आयोग कहता है कि नोटिस मिलने का अर्थ नाम कटना नहीं है और अंतिम निर्णय से पहले सुनवाई होगी। यह स्पष्टीकरण आधा सच है। नोटिस लाखों में हों, उसका आधार अस्पष्ट हो, पुरानी मतदाता सूची से नाम न मिलने को संदेह में बदल दिया जाए और नागरिक को वर्षों पुराने दस्तावेज लेकर सरकारी कार्यालय में उपस्थित होना पड़े—तो यह अपने-आप में दंड है। राज्य के database, spelling, transliteration और mapping की त्रुटि का बोझ नागरिक पर क्यों डाला जाए?
यह पहला अवसर नहीं है जब SIR में सामान्य लोकतांत्रिक सुरक्षा लागू कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा हो। बिहार SIR के दौरान अदालत ने जुलाई 2025 में चुनाव आयोग से कहा था कि निर्धारित 11 दस्तावेजों के अतिरिक्त आधार, मतदाता पहचान-पत्र और राशन कार्ड पर भी विचार किया जाए। आधार को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार करने का प्रश्न 10 जुलाई, 28 जुलाई, 14 अगस्त और 22 अगस्त को अलग-अलग रूप में सामने आया। लेकिन आयोग औपचारिक स्वीकृति से बचता रहा। अंततः 8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट आदेश देना पड़ा कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं, लेकिन पहचान सिद्ध करने वाला वैध बारहवाँ दस्तावेज अवश्य है।
इसी प्रकार बिहार में करीब 65 लाख पुराने मतदाताओं के नाम मसौदा सूची से बाहर हुए तो आयोग ने उनके नाम और बाहर होने के कारण सार्वजनिक करने की मांग का विरोध किया। उसका तर्क था कि ऐसा करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि जिला और बूथवार searchable सूची वेबसाइट पर डाली जाए तथा प्रत्येक नाम के सामने मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरा पंजीकरण या अन्य वास्तविक कारण बताया जाए।
अदालत ने पूछा था कि मतदाता अपना नाम कटने का कारण जानने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता के पीछे क्यों भागे? यदि पूनम देवी का नाम हटाया गया है तो पूनम देवी को सीधे पता चलना चाहिए कि उनका नाम क्यों हटाया गया। यह किसी चुनाव-विरोधी व्यक्ति की मांग नहीं थी; यह सुप्रीम कोर्ट की सामान्य लोकतांत्रिक समझ थी।
फिर दिल्ली में वही गलती क्यों दोहराई गई? बिहार में नाम और कारण सार्वजनिक करने का सिद्धांत स्थापित हो चुका था तो दिल्ली में लाखों नोटिस भेजने से पहले उसे स्वतः क्यों नहीं अपनाया गया? हर राज्य के नागरिक को वही पारदर्शिता प्राप्त करने के लिए बार-बार सुप्रीम कोर्ट क्यों जाना पड़े?
पश्चिम बंगाल का अनुभव और भी भयावह है। चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच विश्वास का संकट इतना गहरा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट को लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों से करीब 60 लाख चिह्नित मतदाताओं की पात्रता का फैसला करवाना पड़ा। फिर अदालत ने अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए और अत्यावश्यक मामलों को प्राथमिकता से सुनने को कहा। इसके बावजूद विधानसभा चुनाव तक केवल 1,607 मतदाताओं के नाम वापस जोड़े जा सके। लाखों अपीलें मतदान के समय लंबित रहीं।
अब आयोग स्वयं बता रहा है कि कुल 38 लाख से अधिक अपीलों में करीब 37 लाख लंबित हैं। वह ट्रिब्यूनलों की संख्या 19 से बढ़ाकर 42 करवाना चाहता है। सवाल है कि इतनी विराट संख्या का अनुमान पहले क्यों नहीं लगाया गया? अपील का अधिकार कागज पर लिख देना पर्याप्त नहीं है। यदि अपील का फैसला आने तक नागरिक दो या तीन चुनावों में वोट ही न डाल सके तो वह उपचार नहीं, प्रशासनिक उपहास है।
और अब तक जिन हटाए गए मतदाताओं की अपीलों पर निर्णय हुआ, उनमें करीब 93 प्रतिशत अपना दावा सही साबित करके वापस मतदाता सूची में आ गए। यह अनुपात केवल निस्तारित मामलों का है, सभी अपीलों का नहीं; फिर भी यह प्रारंभिक प्रक्रिया की गुणवत्ता पर बहुत गंभीर प्रश्न उठाता है। यदि अपील में इतनी बड़ी संख्या में मतदाता सही निकल रहे हैं तो गलती नागरिकों की थी या उन्हें संदिग्ध बनाने वाले तंत्र की?
इसी पृष्ठभूमि में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की आलोचना को सुना जाना चाहिए। ये लोग विपक्षी दलों के प्रवक्ता नहीं हैं। इन्होंने उसी संस्था का नेतृत्व किया है जिसका आज बचाव किया जा रहा है।
कुरैशी ने कहा है कि मौजूदा SIR का जोर inclusion से अधिक exclusion पर दिखाई देता है और इसने चुनावी लोकतंत्र में भारी अव्यवस्था पैदा की है। उनका बुनियादी प्रश्न है कि मतदाता के रूप में दर्ज होना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है या चुनाव आयोग द्वारा दी जाने वाली कृपा? उन्होंने आयोग से सुप्रीम कोर्ट में यह शपथपत्र देने की मांग की है कि कोई भी पात्र नागरिक मतदाता सूची से बाहर नहीं होगा।
अशोक लवासा की बात और अधिक सीधी है—SIR कानूनी हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह निष्पक्ष भी है। कानून की शक्ति और न्याय की भावना एक ही चीज नहीं हैं। लवासा ने पूछा है कि पहले से मतदाता सूची में मौजूद करोड़ों नागरिकों को अपनी नागरिकता और पात्रता फिर से सिद्ध करने के लिए बाध्य करना आवश्यक और न्यायसंगत कैसे है? उन्होंने आयोग से यह भी पूछा कि SIR में वास्तव में कितने गैर-नागरिक पहचाने गए और कितने मामले सक्षम नागरिकता प्राधिकरणों या Foreigners Tribunals को भेजे गए।
यदि घोषित लक्ष्य विदेशी और अपात्र मतदाताओं को निकालना है तो चुनाव आयोग को अंतिम डेटा प्रकाशित करना चाहिए—कितने नाम मृत्यु के कारण हटे, कितने दोहरे पंजीकरण के कारण, कितने स्थानांतरण के कारण और कितने वास्तव में भारतीय नागरिक न होने के कारण। इन श्रेणियों को मिलाकर करोड़ों नाम हटाने का कुल आँकड़ा दिखाना उपलब्धि नहीं है।
केवल कुरैशी और लवासा नहीं। Constitutional Conduct Group से जुड़े अनेक पूर्व सिविल सेवकों ने SIR को सार्वभौमिक मताधिकार के लिए गंभीर खतरा बताया है। बाद में 181 पूर्व नौकरशाहों और 70 से अधिक अकादमिकों, विधिवेत्ताओं, लेखकों तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने इसकी प्रक्रिया में सुधार की मांग की। कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिकारी स्वयं SIR की विसंगतियों से प्रभावित हुए तथा उन्हें अपने नाम के लिए कानूनी रास्ता अपनाना पड़ा। यह भी सच है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और अधिकारियों का एक दूसरा समूह चुनाव आयोग के समर्थन में सामने आया था। इसलिए मुद्दा व्यक्तियों की संख्या गिनना नहीं, उनके प्रश्नों का उत्तर देना है।
राजनीतिक स्तर पर विरोध और भी व्यापक है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, DMK, आम आदमी पार्टी, राजद, शिवसेना-यूबीटी, वाम दलों और दूसरे दलों सहित 23 विपक्षी पार्टियों तथा एक निर्दलीय सांसद ने मुख्य न्यायाधीश को संयुक्त पत्र भेजकर SIR और चुनाव आयोग के आचरण पर चिंता जताई है। ये दल केवल कुछ नेताओं का समूह नहीं हैं। ये संसद, अनेक राज्य सरकारों और देश के मतदाताओं के एक बहुत बड़े हिस्से—व्यापक अर्थ में बहुमत हिस्से—का प्रतिनिधित्व करते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन को भी कुल पड़े मतों का आधा समर्थन प्राप्त नहीं हुआ था।
इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष को चुनाव आयोग के हर निर्णय पर veto मिल जाना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र केवल बहुमत सरकार की इच्छा से नहीं चलता। चुनाव आयोग की शक्ति का नैतिक आधार सभी प्रतिस्पर्धी दलों का भरोसा है। यदि लगभग समूचा विपक्ष कह रहा हो कि चुनावी मैदान समतल नहीं है, तो आयोग का उत्तर संवाद, डेटा और स्वतंत्र जाँच होना चाहिए—अहंकार और आदेश नहीं।
सत्तारूढ़ भाजपा SIR को मतदाता सूची की सफाई, मृत और डुप्लीकेट नाम हटाने तथा विदेशी नागरिकों को रोकने की जरूरी प्रक्रिया बताती है। इन उद्देश्यों से शायद ही कोई असहमत होगा। प्रश्न उद्देश्य का नहीं, साधन का है। मच्छर मारने के लिए घर में आग नहीं लगाई जा सकती। कुछ हजार या लाख गलत प्रविष्टियों को खोजने के नाम पर करोड़ों वैध मतदाताओं को संदिग्ध नहीं बनाया जा सकता।
इस विवाद का एक और असहज पहलू है। जिस चुनाव आयोग से पूर्ण निष्पक्षता की अपेक्षा की जा रही है, उसके गठन की प्रक्रिया स्वयं सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती का सामना कर रही है। 2023 के कानून ने चुनाव आयुक्तों का चयन करने वाली समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को बैठा दिया। अब समिति में प्रधानमंत्री, उनका नामित मंत्री और लोकसभा में विपक्ष का नेता होता है—अर्थात सरकार के पास संरचनात्मक रूप से दो-एक का बहुमत है।
सरकार कहती है कि संसद को ऐसी व्यवस्था बनाने का अधिकार है। याचिकाकर्ता कहते हैं कि चुनाव का referee चुनने में कार्यपालिका का निर्णायक नियंत्रण स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक गारंटी को कमजोर करता है। सुप्रीम कोर्ट में इस कानून की वैधता पर सुनवाई हुई है और इस प्रश्न पर आदेश सुरक्षित है कि मामला बड़ी पीठ को भेजा जाए या नहीं।
जब चयन-प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर स्वयं न्यायिक परीक्षण जारी हो, तब चुनाव आयोग को अपने आचरण में अतिरिक्त विनम्रता, पारदर्शिता और सर्वसम्मति दिखानी चाहिए थी। इसके उलट वह ऐसे विशाल अभ्यास को लागू करने पर अड़ा दिखाई देता है जिस पर पूर्व चुनाव आयुक्त, विशेषज्ञ, पूर्व अधिकारी और लगभग पूरा विपक्ष गंभीर प्रश्न उठा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में SIR कराने की चुनाव आयोग की कानूनी शक्ति को स्वीकार किया है। इस तथ्य को छिपाया नहीं जाना चाहिए। लेकिन उसी निर्णय के रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट है कि मतदाता-सुरक्षा के कई उपाय—हटाए गए नाम और कारण सार्वजनिक करना, आधार को पहचान के रूप में स्वीकार करना, मतदाताओं की सहायता तथा अपील की व्यवस्था—न्यायालय के अंतरिम हस्तक्षेप के बाद लागू हुए। कानून की वैधता प्रशासन की हर कार्रवाई को स्वतः निष्पक्ष नहीं बना देती।
आज सुप्रीम कोर्ट के सामने केवल दिल्ली के 33 लाख नोटिसों का सवाल नहीं है। अदालत के सामने असली प्रश्न यह है कि लोकतंत्र में संदेह का प्रारंभिक बोझ किस पर होगा—राज्य पर या नागरिक पर? क्या पहले से सूची में मौजूद मतदाता को पात्र माना जाएगा, जब तक कि राज्य उसके विरुद्ध ठोस सामग्री न दे? या हर नागरिक को बार-बार सरकार के सामने उपस्थित होकर सिद्ध करना होगा कि वह जीवित है, भारतीय है और वोट देने योग्य है?
एक अपात्र नाम का मतदाता सूची में रह जाना प्रशासनिक गलती है। लेकिन एक पात्र नागरिक को चुनाव में वोट न डालने देना लोकतांत्रिक अन्याय है। पहली गलती अगले revision में सुधारी जा सकती है; दूसरी का कोई उपचार नहीं, क्योंकि बीता हुआ चुनाव दोबारा उस नागरिक के लिए नहीं कराया जा सकता।
चुनाव आयोग को यह समझना होगा कि उसकी प्रतिष्ठा संवैधानिक विशेषणों से नहीं, अपने व्यवहार से बनती है। विपक्ष पर नाराज होने, आलोचकों को संस्था-विरोधी बताने और हर प्रश्न को राजनीतिक षड्यंत्र मानने से भरोसा वापस नहीं आएगा। उसके लिए पूरा डेटा, algorithm के मापदंड, प्रत्येक deletion का कारण, स्वतंत्र audit, समयबद्ध अपील और गलत नाम हटाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है।
लोकतंत्र में नागरिक सरकार को चुनता है; सरकार, सत्तारूढ़ दल या चुनाव आयोग नागरिक को नहीं चुनते। जिस दिन यह क्रम उलट गया, मतदाता सूची केवल नामों की सूची नहीं रहेगी—वह सत्ता द्वारा स्वीकार और अस्वीकार किए गए नागरिकों का रजिस्टर बन जाएगी। SIR पर आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है।