तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस द्वारा डीएमके का साथ छोड़कर TVK के साथ जाने का फैसला केवल एक साधारण चुनावी पुनर्गठन नहीं है। यह भारतीय विपक्षी राजनीति के भीतर बढ़ते वैचारिक संकट, अवसरवादी गठबंधनों और क्षेत्रीय दलों के बदलते शक्ति-संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने केवल तमिलनाडु की राजनीति को ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की विश्वसनीयता को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। खासकर इसलिए क्योंकि कांग्रेस जिस DMK के साथ लगभग एक दशक से लगातार खड़ी थी, उसी गठबंधन को उसने चुनावी परिणाम आते ही छोड़ दिया, जबकि CPI और CPM जैसे सहयोगी दल अभी भी DMK के साथ बने हुए हैं।

तमिलनाडु में कांग्रेस और DMK का रिश्ता केवल सीटों के बंटवारे का गठबंधन नहीं था। यह गठबंधन भाजपा-विरोध, धर्मनिरपेक्ष राजनीति और द्रविड़ सामाजिक न्याय की साझा भाषा पर टिका हुआ बताया जाता रहा। 2004 से लेकर 2021 तक के लगभग हर बड़े चुनाव में कांग्रेस को तमिलनाडु में राजनीतिक जीवनदान DMK के सहारे ही मिला।

तमिलनाडु में कांग्रेस की हालत

वास्तविकता यह है कि राज्य में कांग्रेस का स्वतंत्र जनाधार बहुत सीमित रह गया था। उसके सांसद और विधायक मुख्यतः DMK के वोट ट्रांसफर के कारण जीतते रहे। यही कारण है कि कांग्रेस का अचानक TVK की ओर चले जाना DMK समर्थकों को केवल राजनीतिक निर्णय नहीं बल्कि विश्वासघात जैसा लग रहा है। TVK का उदय स्वयं तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा बदलाव है। अभिनेता Vijay की लोकप्रियता, युवाओं में उनकी पकड़, और “नई राजनीति” की छवि ने उन्हें तेजी से राज्य की राजनीति के केंद्र में ला दिया। इसके साथ-साथ DMK सरकार के खिलाफ बढ़ती एंटी-इन्कम्बेंसी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक असंतोष ने भी TVK को मजबूत जमीन दी। कांग्रेस ने शायद यह महसूस किया कि यदि वह DMK के साथ बनी रहती है तो हमेशा एक जूनियर पार्टनर बनकर रह जाएगी, जबकि TVK के साथ जाने पर वह भविष्य की सत्ता संरचना में अधिक प्रभावशाली भूमिका हासिल कर सकती है। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस पर अवसरवाद का आरोप सबसे अधिक मजबूत दिखाई देता है।
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कांग्रेस ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि उसका उद्देश्य भाजपा को सत्ता-समीकरण से दूर रखना है। उसके समर्थकों का तर्क है कि यदि कांग्रेस ने TVK का समर्थन नहीं किया होता तो तमिलनाडु में किसी न किसी रूप में BJP को राजनीतिक लाभ मिल सकता था। पहली नजर में यह तर्क आकर्षक लगता है, लेकिन जब तमिलनाडु की सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को देखा जाता है तो यह पूरी तरह निर्णायक नहीं लगता। तमिलनाडु लंबे समय से द्रविड़ राजनीति का केंद्र रहा है। यहां की राजनीति सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय पहचान, हिंदी-विरोध, संघीय अधिकारों और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के प्रतिरोध के आधार पर विकसित हुई। यही कारण है कि भाजपा को राज्य में अब तक वह व्यापक सामाजिक स्वीकृति नहीं मिल सकी जो उत्तर और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में मिली।

बीजेपी का राज्य में असर

भाजपा ने हाल के वर्षों में शहरी मध्यवर्ग, कुछ उच्च जातियों और हिंदुत्व समर्थक समूहों में अपना प्रभाव जरूर बढ़ाया है, लेकिन वह अभी भी तमिलनाडु की केंद्रीय राजनीतिक धुरी नहीं बन सकी है। इसलिए यह कहना कि राज्य में तुरंत भाजपा-नीत सरकार बनने वाली थी, कुछ अतिरंजित लगता है। हाँ, यह जरूर सही है कि भाजपा की रणनीति तमिलनाडु में प्रत्यक्ष बहुमत हासिल करने की नहीं बल्कि गठबंधन आधारित विस्तार की रही है। वह AIADMK, छोटे क्षेत्रीय दलों या लोकप्रिय चेहरों के सहारे धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में जगह बनाने की कोशिश करती रही है। इसी संदर्भ में TVK को लेकर राजनीतिक चर्चाओं में यह आशंका मौजूद थी कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में भाजपा और TVK के बीच किसी प्रकार की समझ बन सकती है। कांग्रेस समर्थक इसी संभावना को अपने फैसले के नैतिक आधार के रूप में पेश कर रहे हैं। लेकिन इस संभावना की भी सीमाएँ थीं। 

TVK यदि अपनी पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा में भाजपा के साथ खुलकर चली जाती तो उसे तमिलनाडु के मुस्लिम, ईसाई, द्रविड़ पहचान समर्थक और सामाजिक न्याय आधारित मतदाताओं का बड़ा हिस्सा खोना पड़ सकता था। विजय ने कई मौकों पर केंद्र सरकार की नीतियों, NEET, शिक्षा और भाषा संबंधी मुद्दों पर अप्रत्यक्ष आलोचनात्मक रुख अपनाया था। इसलिए उनका तुरंत भाजपा के साथ जाना राजनीतिक रूप से सहज नहीं माना जा रहा था।

भाजपा भी शायद इतनी जल्दी TVK को अपने साथ जोड़कर उसकी “नई वैकल्पिक राजनीति” वाली छवि को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती। यही कारण है कि कांग्रेस का “हमने भाजपा को रोकने के लिए TVK का समर्थन किया” वाला तर्क पूरी तरह झूठा तो नहीं लगता, लेकिन पूरी तरह निस्वार्थ भी नहीं दिखाई देता।

कांग्रेस ने चुनाव से पहले टीवीके साथ गठबंधन क्यों नहीं किया?

आलोचकों का सवाल यही है कि यदि भाजपा का खतरा इतना गंभीर था तो कांग्रेस ने चुनाव से पहले ही TVK के साथ गठबंधन क्यों नहीं किया? चुनाव तक DMK को धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील सहयोगी बताने वाली कांग्रेस परिणाम आते ही अचानक TVK के साथ चली गई। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि “भाजपा रोकने” का तर्क वास्तव में सत्ता-समीकरण में हिस्सेदारी हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया गया नैतिक आवरण था। यहीं CPI और CPM का रुख महत्वपूर्ण हो जाता है। इन दोनों दलों ने भी भाजपा के खतरे को समझा होगा, लेकिन उन्होंने तुरंत DMK का साथ नहीं छोड़ा। इसके पीछे वैचारिक कारण भी हैं और व्यावहारिक मजबूरियाँ भी। वाम दल लंबे समय से द्रविड़-धर्मनिरपेक्ष राजनीति के साथ खड़े रहे हैं। उनके लिए गठबंधन केवल चुनावी गणित नहीं बल्कि सामाजिक और वैचारिक दिशा का प्रश्न भी है। दूसरी ओर TVK अभी तक वैचारिक रूप से स्पष्ट पार्टी नहीं मानी जाती। उसका मुख्य आधार करिश्माई नेतृत्व और एंटी-इन्कम्बेंसी है। ऐसे में वाम दलों ने शायद यह महसूस किया कि तुरंत TVK की ओर जाना उनके लिए राजनीतिक रूप से अस्थिर कदम होगा।
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अवसरवादी गठबंधन

हालाँकि, यह भी सच है कि भारतीय राजनीति में लगभग सभी दल समय-समय पर अवसरवादी गठबंधनों का हिस्सा रहे हैं। DMK स्वयं कभी NDA और कभी UPA के साथ रही है। AIADMK ने भी अलग-अलग समय पर विभिन्न राष्ट्रीय दलों से समझौते किए हैं। इसलिए केवल कांग्रेस को ही अवसरवादी कहना पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होगा। लेकिन कांग्रेस के मामले में आलोचना इसलिए अधिक तीखी है क्योंकि वह राष्ट्रीय स्तर पर लगातार वैचारिक राजनीति, संविधान की रक्षा और धर्मनिरपेक्षता की सबसे मुखर भाषा बोलती रही है। जब वही पार्टी परिणाम आते ही अपने लंबे सहयोगी को छोड़ देती है तो उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इस पूरे घटनाक्रम ने INDIA ब्लॉक जैसी विपक्षी एकता की अवधारणा को भी कमजोर किया है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा-विरोध की बात करने वाले दल राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई दे रहे हैं। इससे यह संदेश जाता है कि विपक्षी एकता मुख्यतः चुनावी मंच है, कोई स्थायी वैचारिक परियोजना नहीं। क्षेत्रीय राजनीति और सत्ता-समीकरण राष्ट्रीय वैचारिक दावों पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

तमिलनाडु में कांग्रेस का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसके अपने संकट को उजागर करता है। पार्टी अब कई राज्यों में स्वतंत्र राजनीतिक आधार खो चुकी है और उसे लगातार क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। ऐसे में वह हर उभरती शक्ति के साथ अपने लिए जगह तलाशने की कोशिश करती दिखाई देती है। TVK के साथ जाना उसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। लेकिन यह रणनीति अल्पकालिक लाभ तो दे सकती है, दीर्घकालिक वैचारिक विश्वसनीयता नहीं। अंततः यह कहना अधिक उचित होगा कि कांग्रेस का फैसला केवल भाजपा-विरोध से प्रेरित नहीं था और न ही केवल सत्ता-लालसा से। दोनों तत्व इसमें साथ-साथ मौजूद थे। भाजपा का संभावित प्रभाव एक वास्तविक राजनीतिक कारक था, लेकिन उससे भी बड़ा कारक बदलते सत्ता-संतुलन में अपनी जगह सुरक्षित करना था। यही कारण है कि इस फैसले को लेकर तमिलनाडु और राष्ट्रीय राजनीति में इतनी तीखी बहस हो रही है। यह केवल एक गठबंधन टूटने की कहानी नहीं, बल्कि उस भारतीय राजनीति की कहानी है जिसमें विचारधारा और अवसरवाद लगातार एक-दूसरे से टकरा रहे हैं।