पूरी दुनिया में बदलाव के लिए प्रदर्शन हो रहे हैं।
शासक वर्ग की दिक्कत यह है कि वे बेचैन और असंतुष्ट नागरिकों से उनके असंतोष का कारण जानने, उनसे संवाद करने और उनकी समस्या का समाधान करने के बजाय उन्हें अपना, राष्ट्र का और फिर दुनिया का शत्रु साबित करने में जुट जाते हैं। ऐसे में या तो वे अपने पक्ष को परमसत्य मानकर अपने पतन तक डटे रहते हैं या फिर अपने चारों ओर झूठ की नींव पर खड़ी कभी बालू या कंकरीट की एक भीत बनाते हैं जिसे एक दिन ढहना ही होता है या जिसमें दरार आनी ही होती है। ऐसी ही विडंबना अपने प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय एकता दिवस के मौके पर प्रकट की। यह अच्छी बात है कि वे अब अपने अहंकार के रथ से थोड़ा सा उतर कर यह तो स्वीकार करने लगे हैं कि विपक्ष की कोई भूमिका होती है और दुनिया असंतोष की आग में जल रही है लेकिन यह सुनने और समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि विपक्ष इतना विरोध क्यों कर रहा है और दुनिया इस तरह से बेचैन क्यों है? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वे सोच विचार और विमर्श में यकीन करने के बजाय कुछ नारों और जुमलों में यकीन करते हैं और मानते हैं कि देश और दुनिया इसी से संचालित होती है।
प्रधानमंत्री कहते हैं कि विपक्ष का काम सरकार की नीतियों की आलोचना करना होता है इसलिए उसे विरोध पक्ष कहते हैं, लेकिन विपक्ष तो अवरोध पक्ष हो गया है। उनका कहना है कि हमने देश के भीतर नक्सलवाद को खत्म कर दिया है और अब बाहरी चुनौतियों से निपटना है। जैसे पिछले 12 सालों में उनके हाथ इतने बंधे हुए थे कि वे बाहरी चुनौतियों से निपट ही नहीं सकते थे। वे एक भारत और श्रेष्ठ भारत का नारा देते हुए अब 2047 में विकसित भारत का जुमला फेंक रहे हैं और कह रहे हैं कि विपक्ष देश की एकता और अखंडता को कमजोर कर रहा है। जैसे देश के 13 करोड़ नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करने और उन्हें सम्मान देने का सवाल देश की अखंडता को तोड़ने का सवाल है और उन्हें मताधिकार से वंचित करना देश को मजबूत करना है। उनका यह कहना है कि दुनिया युद्ध और संसाधनों की कमी से ग्रसित है और वह जल रही है लेकिन भारत की एकता उसकी ताकत है और इससे हम चीजों को संभाल सकते हैं।
जिस नेता का आजीवन एजेंडा अपनी सत्ता को बढ़ाना और मजबूत करना और प्रतिपक्ष का दमन करना ही रहा हो ऐसी जुमलेबाजी वाली बात वही कर सकता है। जिसे देश और दुनिया का कल्याण करना हो वह थोड़ा बहुत ठहर कर सोचता है और रात दिन दौड़ भाग ही नहीं करता कुछ पढ़ता लिखता और सोचता भी है।
वास्तव में दुनिया की बेचैनी का एक कारण युद्ध और संसाधनों के संकट तक ले जानी वाली पूंजीवाद की आर्थिक नीतियां हैं और दूसरा कारण पूंजीवाद की फैक्ट्री में निर्मित किए गए वे नेता हैं जो एआई के युग में भी अपनी स्वतंत्र बुद्धि हासिल नहीं कर सके हैं। वे उतना ही सोचते हैं जितनी कि उनके दिमाग में लगाई गई चिप सोचने को कहती है। अगर उन नेताओं के पास अपनी सोचने की स्वायत्तता होती और दोहन और शोषण करने वाली आर्थिक नीतियों में न्याय और संवेदना की गुंजाइश होती तो फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, जर्मनी, ट्यूनीसिया, अल्बानिया, इंडोनेशिया, बेल्जियम, सर्बिया जैसे तमाम देशों में हाई स्कूल के बच्चों से लेकर मजदूर और मध्यवर्ग सब सड़क पर न होते।
फ्रांस में शनिवार को पूरे देश में तीन लाख लोगों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया। हालांकि यह भीड़ 17 अक्तूबर की पांच लाख और 27 अक्तूबर की चार लाख की भीड़ से कम थी, लेकिन बड़ी बात यह है कि लोगों का आंदोलन जारी है। इस आंदोलन में हाई स्कूल के छात्र हैं, जलवायु परिवर्तन के कार्यकर्ता हैं, मध्यवर्ग हैं। सरकारी हॉस्टल का एक छात्र कहता है कि मेरे हॉस्टल की दीवार में सीलन है, प्लास्टर गिर रहा है, कमरों में जगह जगह काकरोच दिख रहे हैं। फ्रांस में आंदोलित लोग बढ़ती महंगाई से त्रस्त हैं। उन्हें शिक्षा के बदतर हालात परेशान कर रहे हैं।
इसी तरह जर्मनी में भी जेन-जी सड़क पर है। शनिवार को 34 शहरों में प्रदर्शन हुए। उसमें दो लाख लोगों ने हिस्सा लिया। वे अनिवार्य सैन्य सेवा के विरोध में हैं, वे शिक्षा में बड़े निवेश की मांग कर रहे हैं, वे महंगाई का विरोध कर रहे हैं। इस आंदोलन में जर्मनी के अति वामपंथी समूह हिस्सा ले रहे हैं और सरकार का आरोप है कि कुछ विदेशी अतिवादी समूह भी इसमें भागीदारी कर रहे हैं। इन आंदोलनों के अभी तत्काल परिणाम नहीं निकले हैं। इस नाते हिंसा की घटनाएं भी हुई हैं। लेकिन गनीमत है कि इक्का दुक्का जान के नुकसान के अलावा कहीं बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं हुई है और आंदोलन नियंत्रित स्थिति में ही चल रहे हैं।
अयोध्या जैसे सांप्रदायिक, दंगाई और राष्ट्र को विभाजित करने वाले आंदोलन करके सत्ता में आए शासक दल के समर्थकों ने यह कहानी फैलानी शुरू कर दी है कि इससे क्या होगा। देखो युवाओं का आंदोलन ठंडा पड़ गया है और विपक्ष का आंदोलन लोक महाभियोग जैसी ड्रामेबाजी और रामलीला मैदान की रैली के बाद ठंडा ही पड़ जाना है। सत्तापक्ष के सासंद ‘मोदी कहीं नहीं जाएगा, यहीं रहेगा मोदी’ जैसे गीत गा रहे हैं। ऐसे लोगों को याद दिलाना चाहिए कि आंदोलनों से न सिर्फ अपने पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश में सत्ताएं बदली हैं बल्कि हाल में सर्बिया जैसे देश में भी सत्ता परिवर्तन हुआ है। उससे पहले हंगरी में पंद्रह साल बाद विक्टर आर्बन भी सत्ता से हटे थे।
सर्बिया में हाल में हुए चुनावों स्टूडेंट लिस्ट नामक पार्टी ने 52.71 प्रतिशत वोटों के साथ 140 सीटें जीतकर देश की सबसे पढ़ी लिखी सरकार बनाने की तैयारी कर ली है। रोचक तथ्य यह है कि स्टूडेंट लिस्ट ने जो 250 उम्मीदवार खड़े किए थे उनमें 160 पीएचडी धारक थे। इन छात्रों ने 15 सालों से सत्ता पर कायम अलेक्जेंडर बुसी की पार्टी सर्बिया प्रोग्रेसिव पार्टी को मात्र 34 प्रतिशत वोटों तक सीमित करके सत्ता से हटा दिया है। इस तरह सर्बिया ने एक अधिनायकवादी सत्ता को पलट कर दिखा दिया है कि अगर राजसत्ता की ताकत से दमन संभव है तो जनता की शक्ति से उससे मुक्ति भी संभव है। अब छात्र उन पुलिस अधिकारियों को सत्ता से हटाने की मांग कर रहे हैं जिन्होंने दमन किया था। उस प्रेस से माफी मंगवा रहे हैं जिसने झूठी खबरें फैलाई थीं।
दुनिया में चल रहे संघर्ष, दमन और शक्तिहीनों की विजय के बाद लोकतंत्र की नई चेतना की लहर बन रही है। उस लहर का क्या होगा कहा नहीं जा सकता। क्या वह लहर भारत में कोई सार्थक बदलाव कर सकेगी, इस बारे में भी कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। क्या वह लहर अरब स्प्रिंग की तरह पहले विजय हासिल करेगी और फिर हार कर दब जाएगी या उसकी विजय स्थायी होगी यह भी कह पाना कठिन है। क्या वह एक तानाशाही को हटाकर दूसरी तानाशाही कायम करेगी, इस बारे में भी भविष्य के ही गर्भ में चीजें हैं।
लेकिन एक बात निश्चित होकर कही जा सकती है कि यह लहर युद्ध और अन्याय पर खड़ी व्यवस्थाओं के विरुद्ध विश्व व्यापी लहर है। यह शक्तिहीनों को शक्ति प्रदान कर रही है और अन्यायी शक्तिवानों को बेचैन और परेशान किए हुए है। वास्तव में यह उदारीकरण की उन नीतियों का परिणाम है जिसने समता, न्याय और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता के बजाय स्वार्थ और लूट पर आधारित एक विश्व व्यवस्था बनानी चाही थी। एक उदारवादी विश्व निर्माण के नारे के साथ आई वह नीति जब लड़खड़ाने लगी तो उसने अधिनायकवादी राष्ट्रवाद की नीति अपनाई गई। अब जब उस राष्ट्रवाद की भी कलई खुल गई तो लुटे पिटे और बेरोजगार युवा, मजदूर और किसान नाराज और उत्तेजित हैं। सरकारें उनके अधिकारों को कभी घुसपैठिया बताकर कभी अल्पसंख्यक और आतंकवादी बताकर छीन रही हैं। कहीं उनको मताधिकार से वंचित किया जा रहा है तो कहीं उनके शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अधिकार छीने जा रहे हैं।
यहां यह बात गौर करने लायक है कि उदारीकरण के पहले चरण में सरकारें बदले जाने की छूट थी और लोग सरकारें बदल कर संतुष्ट हो जाते थे। उस दौरान उदारीकरण तो नहीं रुकता था लेकिन सूचना, शिक्षा, भोजन, रोजगार और स्वास्थ्य संबंधी कुछ अधिकारों के साथ उसका स्वरूप मानवीय हो जाता था। लेकिन उदारीकरण ने अपने दूसरे चरण में एकाधिकार और अधिनायकवादी सरकारों की रणनीति अपनाई। विडंबना देखिए कि जो उदारीकरण सरकारों के अधिकारों को सीमित करने के नारे के साथ आया था अब वह अधिकतम नियंत्रण की रणनीति पर चल रहा है और पूंजीवाद के रहनुमाओं को यही रणनीति पसंद है। लेकिन लोग झूठ और अन्याय सहते सहते ऊब गए हैं इसलिए वे नई दुनिया के सपने के साथ सड़क पर हैं। वह दुनिया बने या ना बने लेकिन उसके लिए युरोप से एशिया तक अमेरिका से अफ्रीका तक लड़ाई जारी है।