दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ उभरते जनाक्रोश के पीछे सिर्फ राजनीतिक असंतोष नहीं है, बल्कि फासीवाद के प्रति गुस्सा और आर्थिक असमानता, महँगाई, बेरोजगारी और आम लोगों की बदहाल होती जिंदगी के सवाल हैं। क्या ये समाजवाद की वापसी है?
दुनिया इस समय एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के दौर से गुजर रही है। यूरोप से लेकर लैटिन अमेरिका तक और अमेरिका से लेकर एशिया तक ऐसे संकेत दिखाई दे रहे हैं कि दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ लोगों में असंतोष गहरा रहा है। कहीं छात्र सड़कों पर हैं, कहीं युवा आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं और कहीं चुनावों के जरिये सत्ता का समीकरण बदल रहा है। इन घटनाओं को अलग-अलग देशों की स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों तक सीमित करके देखना शायद ठीक नहीं होगा। इनके पीछे कुछ ऐसी समान वजहें हैं, जो दुनिया की मौजूदा आर्थिक व्यवस्था और लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ी हैं।
ब्राजील में लूला दा सिल्वा की चुनावी जीत, हंगरी में विक्टर ओरबान की सत्ता का अंत, सर्बिया में छात्रों के नेतृत्व में हुआ आंदोलन और यूरोप के कई देशों में सरकारों के खिलाफ बढ़ते प्रदर्शन इसी व्यापक परिघटना के अलग-अलग रूप हैं। अमेरिका में भी जोहरान ममदानी जैसे समाजवादी रुझान वाले नेताओं की चुनावी सफलता बताती है कि पूंजीवादी व्यवस्था के सबसे मजबूत गढ़ में भी अब सार्वजनिक सेवाओं, सस्ते आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम लोगों की आर्थिक सुरक्षा जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में आ रहे हैं।
भारत, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में हुए आंदोलनों को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। इन सभी देशों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं, लेकिन एक बात समान दिखाई देती है। युवा और आम नागरिक ऐसी राजनीति से असंतुष्ट हैं, जो उनकी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रही है।
नवउदारवाद का संकट और बढ़ती आर्थिक असमानता
इस बदलाव को समझने के लिए हमें पिछले तीन-चार दशकों की आर्थिक नीतियों पर नजर डालनी होगी। सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया एकध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ी। अमेरिका का राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व स्थापित हुआ। इसी दौर में नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का विस्तार हुआ। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं के जरिये दुनिया के अनेक देशों में उदारीकरण, निजीकरण और बाजार आधारित आर्थिक व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया।इन नीतियों के समर्थकों का तर्क था कि बाजार को अधिक स्वतंत्रता देने से आर्थिक विकास तेज होगा और उसका लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचेगा। कुछ देशों में आर्थिक विकास हुआ भी, संपत्ति पैदा हुई और लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया। लेकिन इस विकास का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हुआ।
भारत इसका एक उदाहरण है। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद देश में संपत्ति का निर्माण हुआ, उद्योग और कारोबार का विस्तार हुआ और अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा। लेकिन इस विकास का बड़ा हिस्सा उद्योगपतियों, बड़े कारोबारियों और संपन्न वर्गों के पास केंद्रित होता चला गया। दूसरी ओर आर्थिक विषमता बढ़ती गई। अमीर और अधिक अमीर होते गए, जबकि गरीब और निम्न आय वाले तबकों के लिए आर्थिक सुरक्षा लगातार कमजोर होती गई।
नवउदारवादी व्यवस्था के तहत सरकारों की प्राथमिकताएं बदलने लगीं। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा कमजोर हुई और सरकारों पर कॉरपोरेट जगत का प्रभाव बढ़ता गया। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं में निवेश बंद या कम होने लगा। आम लोगों की आमदनी और वेतन की वृद्धि जीवनयापन की बढ़ती लागत के मुकाबले बहुत कम रही। आवास, भोजन, ईंधन और दूसरी बुनियादी जरूरतें महंगी होती गईं।
इसका नतीजा यह हुआ कि आर्थिक विकास के आंकड़ों और आम लोगों के जीवन के अनुभवों के बीच दूरी बढ़ती गई। अर्थव्यवस्था भले ही आगे बढ़ रही थी, लेकिन बड़ी आबादी के लिए जिंदगी पहले से ज्यादा कठिन होती जा रही थी। यही वह असंतोष है, जो अब अलग-अलग देशों में राजनीतिक रूप ले रहा है।
क्या फासीवाद की जड़ें आर्थिक व्यवस्था में भी हैं?
अर्थशास्त्री इजाबेला वेबर की नई किताब एंटी-फासिस्ट इकोनॉमिक्स: इन डिफेंस ऑफ अफोर्डेबिलिटी, डिग्निटी एंड डेमोक्रेसी इस बहस को एक महत्वपूर्ण दिशा देती है। मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर वेबर का तर्क है कि फासीवाद के उभार को केवल राजनीतिक विचारधारा या नेताओं के व्यक्तित्व के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे आर्थिक असुरक्षा, बढ़ती असमानता और कॉरपोरेट शक्ति का केंद्रीकरण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।उनके मुताबिक नवउदारवादी अर्थव्यवस्था और फासीवादी राजनीति के बीच एक वैचारिक समानता भी है। दोनों ही प्रतिस्पर्धा और संघर्ष को समाज के संचालन का प्रमुख आधार मानते हैं। इस सोच में सहयोग, सामाजिक सुरक्षा और सामूहिक कल्याण के लिए जगह लगातार कम होती जाती है। फासीवाद इसी प्रतिस्पर्धात्मक और वर्चस्ववादी सोच को चरम पर ले जाता है।
जब समाज में आर्थिक असुरक्षा बढ़ती है, बड़ी आबादी को लगता है कि उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ नहीं बचा है और भविष्य को लेकर अनिश्चितता गहराती है, तब लोकतांत्रिक संस्थाएं भी कमजोर पड़ने लगती हैं। ऐसे माहौल में दक्षिणपंथी ताकतें लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान देने के बजाय उनके गुस्से को दूसरे समूहों की तरफ मोड़ सकती हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक विभाजन को हवा देकर वे अपना राजनीतिक आधार मजबूत करती हैं।
इसलिए वेबर का मानना है कि फासीवाद से लड़ाई केवल चुनाव जीतने या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बचाने तक सीमित नहीं रह सकती। लोकतंत्र को उसकी आर्थिक बुनियाद पर भी मजबूत करना होगा।
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं
वेबर की किताब का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह लोकतंत्र को केवल मतदान, चुनाव और संवैधानिक संस्थाओं तक सीमित नहीं मानतीं। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है, जब आम लोगों के पास सम्मानजनक जीवन जीने के साधन हों। उनके पास रोजगार हो, पर्याप्त आमदनी हो, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा हो और वे बुनियादी जरूरतों के लिए लगातार संघर्ष करने को मजबूर न हों।
इस नजरिये से देखें तो आवास, भोजन, पानी, ईंधन, परिवहन, स्वास्थ्य और देखभाल जैसी सुविधाएं केवल बाजार में बिकने वाली वस्तुएं नहीं हैं। इन्हें बुनियादी मानवीय अधिकारों की तरह देखा जाना चाहिए। इनकी उपलब्धता केवल लोगों की क्रय शक्ति पर निर्भर नहीं रहनी चाहिए।वेबर इसके लिए कई तरह के आर्थिक उपाय सुझाती हैं। आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए लक्षित मूल्य समझौते और रणनीतिक मूल्य नियंत्रण अपनाए जाएं। किराये पर नियंत्रण हो, ताकि शहरों में रहने वाले आम लोगों को आवास के लिए अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा खर्च न करना पड़े। सस्ती और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था विकसित की जाए।
इसके साथ ही बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति के लिए सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। पानी जैसी आवश्यक सेवाओं को फिर से सार्वजनिक क्षेत्र के नियंत्रण में लाने की जरूरत है। सार्वजनिक किराना स्टोर, सरकारी सुपरमार्केट और किफायती आवास जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं। उनका उद्देश्य निजी बाजार को पूरी तरह समाप्त करना नहीं, बल्कि उसके समानांतर ऐसे सार्वजनिक विकल्प तैयार करना है, जो आम लोगों को राहत दें और बाजार की मनमानी पर अंकुश लगा सकें।
अमीरों पर टैक्स और आम लोगों की गरिमा
आर्थिक असमानता को कम करने के लिए वेबर संपत्ति और विरासत पर कर लगाने की भी वकालत करती हैं। उनका सुझाव है कि अति-संपन्न लोगों पर संपत्ति कर और विरासत टैक्स लगाया जाए और उससे मिलने वाले संसाधनों का इस्तेमाल गरीब तथा निम्न आय वाले तबकों की सुविधाओं पर किया जाए।लेकिन आर्थिक लोकतंत्र का सवाल केवल टैक्स और सरकारी खर्च तक सीमित नहीं है। इसके लिए श्रमिकों की स्थिति में सुधार करना भी जरूरी है। न्यूनतम वेतन बढ़ाया जाए, मजदूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों को मजबूत किया जाए तथा सार्वजनिक निवेश के जरिये रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं। असुरक्षित और ठेके पर आधारित रोजगार की व्यवस्था पर भी सवाल उठाना होगा।
वेबर कॉरपोरेट शक्ति पर नियंत्रण, बाजार में एकाधिकार को रोकने और कंपनियों के संचालन में श्रमिकों की भागीदारी बढ़ाने की बात भी करती हैं। पर्यावरण संरक्षण को भी इस आर्थिक बदलाव का जरूरी हिस्सा मानती हैं।
इन तमाम सुझावों का साझा आधार यह है कि अर्थव्यवस्था का मकसद केवल मुनाफा कमाना नहीं होना चाहिए। उसका पहला सरोकार मनुष्य और उसका जीवन होना चाहिए।
भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल: सत्ता परिवर्तन के बाद क्या?
दुनिया में दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ जो असंतोष उभर रहा है, उसके भारत के लिए भी महत्वपूर्ण मायने हैं। यहां भी युवाओं, छात्रों और दूसरे सामाजिक समूहों के आंदोलन दिखाई दे रहे हैं। लेकिन एक बुनियादी सवाल है, जिस पर गंभीर बहस अभी पर्याप्त नहीं है।
मान लीजिए कि इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप भारत में सत्ता परिवर्तन हो जाता है। मौजूदा सरकार चली जाती है और नई सरकार बनती है। लेकिन उस नई सरकार का आर्थिक और सामाजिक एजेंडा क्या होगा?क्या केवल चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बना देना पर्याप्त होगा? क्या लोकतंत्र की बहाली का मतलब सिर्फ संवैधानिक संस्थाओं को पहले की तरह काम करने देना है? निश्चित रूप से ये बेहद जरूरी सवाल हैं, लेकिन इनके साथ कुछ दूसरे सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
कॉरपोरेट जगत की बढ़ती आर्थिक शक्ति को कैसे नियंत्रित किया जाएगा? सार्वजनिक क्षेत्र को किस तरह मजबूत किया जाएगा? शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी निवेश कैसे बढ़ेगा? युवाओं के लिए रोजगार कहां से आएगा? मजदूरों और कर्मचारियों की आमदनी में वास्तविक वृद्धि कैसे होगी? महंगाई और आवास की समस्या से आम लोगों को राहत कैसे मिलेगी? और सबसे बढ़कर, समाज के कमजोर तबकों की गरिमा और आर्थिक सुरक्षा कैसे बहाल होगी?
इन सवालों के बिना सत्ता परिवर्तन का कोई व्यापक सामाजिक अर्थ नहीं बन पाएगा। अगर आर्थिक नीतियां पहले जैसी ही रहेंगी, अगर संसाधनों का केंद्रीकरण जारी रहेगा और अगर आम लोगों की बुनियादी जरूरतें बाजार की मर्जी पर निर्भर रहेंगी, तो राजनीतिक बदलाव भी अधूरा साबित हो सकता है।
दरअसल, आर्थिक असमानता और सामाजिक असुरक्षा का बना रहना दक्षिणपंथी राजनीति के लिए जमीन तैयार करता है। गरीबी, बेरोजगारी और असंतोष के बीच विभाजनकारी राजनीति को फलने-फूलने का मौका मिलता है। इसलिए फासीवाद और दक्षिणपंथी राजनीति का मुकाबला करने के लिए उन आर्थिक परिस्थितियों को बदलना भी जरूरी है, जो उन्हें ताकत देती हैं।
राजनीति में सरोकारों की वापसी जरूरी
इजाबेला वेबर के सुझावों को समाजवादी आर्थिक सोच के करीब माना जा सकता है। हालांकि इस पूरी बहस को केवल समाजवाद बनाम पूंजीवाद के पुराने खांचे में रखकर देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसका मूल सवाल यह है कि अर्थव्यवस्था और राजनीति में आम लोगों के सरोकारों की वापसी कैसे हो।आज जरूरत ऐसी राजनीति की है, जो केवल सत्ता हासिल करने या किसी खास विचारधारा का विरोध करने तक सीमित न रहे। उसे लोगों के जीवन की वास्तविक समस्याओं को अपने एजेंडे में शामिल करना होगा। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब लोगों को लगेगा कि यह व्यवस्था उनके लिए भी काम करती है।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे आंदोलन इसी बदलाव की संभावना की ओर इशारा कर रहे हैं। ये आंदोलन केवल सरकारों के खिलाफ गुस्सा नहीं हैं, बल्कि एक बेहतर जीवन, आर्थिक सुरक्षा और सम्मान की मांग भी हैं।
सवाल यह नहीं है कि दक्षिणपंथ के खिलाफ हवा कितनी तेज चल रही है। असली सवाल यह है कि इस हवा को एक सकारात्मक राजनीतिक और आर्थिक विकल्प में कैसे बदला जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो असंतोष के बावजूद व्यवस्था की बुनियादी समस्याएं बनी रहेंगी। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई को लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने की लड़ाई से जोड़ना होगा। आखिरकार, लोकतंत्र केवल सत्ता चुनने का अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान के साथ जीने का अवसर भी है।