भारतीय संविधान के निर्माण को अक्सर एक तकनीकी प्रक्रिया की तरह प्रस्तुत किया जाता है—मसौदे बने, बहसें हुईं, संशोधन आए और अंततः एक दस्तावेज़ अस्तित्व में आया। लेकिन यह दृष्टि अधूरी है। भारतीय संविधान केवल एक कानूनी ग्रंथ नहीं, बल्कि एक गहरे असमान समाज को लोकतांत्रिक बनाने का नैतिक हस्तक्षेप है। और इसी हस्तक्षेप के केंद्र में डॉ. भीमराव आम्बेडकर खड़े दिखाई देते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में बी. एन. राव जैसे विद्वानों के योगदान पर पुनर्विचार हुआ है, जो स्वागतयोग्य है। राव ने प्रारंभिक मसौदा, तुलनात्मक अध्ययन और संस्थागत ढांचा उपलब्ध कराया। यह योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। पर एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है—राव का विकल्प संभव था, आम्बेडकर का नहीं।
तकनीकी विशेषज्ञ बनाम ऐतिहासिक अपरिहार्यता
बी. एन. राव जैसी भूमिका औपनिवेशिक प्रशासन की संरचना के भीतर पैदा हुई थी। यदि वे न होते, तो कोई अन्य—शायद कम प्रतिभाशाली—संवैधानिक सलाहकार यह काम कर सकता था। लेकिन आम्बेडकर की भूमिका संस्थागत नहीं, ऐतिहासिक थी। वे केवल संविधान लिखने वाले नहीं थे, बल्कि उस समाज के विरुद्ध खड़े थे जो बराबरी को सहजता से स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
संविधान सभा की सामाजिक संरचना इस तथ्य की गवाह है। वह सभा उच्च जातियों, शिक्षित अभिजात वर्ग और प्रभुत्वशाली सामाजिक समूहों से भरी हुई थी। स्त्रियाँ, दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियाँ वहाँ या तो नगण्य थीं या प्रतीकात्मक। ऐसे में यह मान लेना कि समानता, गरिमा और प्रतिनिधित्व के प्रश्न स्वतः संविधान के केंद्र में आ जाते—इतिहास को रोमांटिक बनाना होगा।
आम्बेडकर की दृष्टि : सहानुभूति नहीं, हस्तक्षेप
आम्बेडकर की विशिष्टता उनकी सहानुभूति में नहीं, बल्कि उनकी दृष्टि में थी। वे जानते थे कि- “सामाजिक समानता के बिना राजनीतिक लोकतंत्र एक छल है।” इसी कारण उन्होंने:
- अस्पृश्यता को केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि संवैधानिक अपराध बनाया (अनुच्छेद 17)
- समानता को नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि न्यायिक रूप से लागू होने वाला अधिकार बनाया
- राज्य को तटस्थ नहीं, बल्कि सकारात्मक रूप से हस्तक्षेप करने वाला पक्ष बनाया
यह सोच उस समय क्रांतिकारी थी। संविधान सभा के अनेक सदस्य सुधार चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे। आम्बेडकर ने इस “धीरे-धीरे” को खारिज किया, क्योंकि वे जानते थे कि जिनके पास शक्ति नहीं होती, उनके लिए समय भी शासक वर्ग के पक्ष में काम करता है।
स्त्रियाँ, दलित, आदिवासी, पिछड़े : जिन्हें इतिहास ने छोड़ा था
स्त्रियों के अधिकारों पर हिंदू कोड बिल के समय जो तीखा विरोध हुआ, वह बताता है कि लैंगिक समानता उस समाज की सहज चेतना का हिस्सा नहीं थी। दलितों और आदिवासियों के प्रश्न तो और भी हाशिये पर थे। आम्बेडकर ने इन समूहों को “कल्याण के पात्र” नहीं, बल्कि नागरिकता के पूर्ण अधिकारी के रूप में देखा।
यह कोई संयोग नहीं है कि आज, संविधान लागू हुए सात दशकों बाद भी, हमारे समाज को दलितों, पिछड़ों और स्त्रियों की बराबरी से समस्या है। यदि आज की राजनीतिक व्यवस्था—इतने अनुभव, आंदोलनों और संवैधानिक भाषा के बावजूद—इन प्रश्नों पर स्पष्ट और दृढ़ नहीं दिखती, तो यह कल्पना करना कठिन नहीं कि 1946–49 के भारत में, आम्बेडकर के बिना क्या होता।
अगर आम्बेडकर न होते
संभावना यही थी कि:
- समानता को निर्देशक सिद्धांतों तक सीमित कर दिया जाता
- आरक्षण जैसे प्रावधान अस्थायी और कमजोर होते
- अस्पृश्यता नैतिक बुराई रहती, दंडनीय अपराध नहीं बनती
- स्त्रियों के अधिकार “सामाजिक सुधार” के नाम पर टाल दिए जाते
- भारत लोकतंत्र तो बनता, लेकिन सामाजिक रूप से परिवर्तनकारी लोकतंत्र नहीं बन पाता।
आज का प्रश्न
आज भी हमारा समाज बराबरी और सम्मान के प्रश्न से जूझ रहा है। यह संघर्ष स्वयं इस बात का प्रमाण है कि आम्बेडकर ने संविधान में जो किया, वह पर्याप्त नहीं था—लेकिन अनिवार्य था। यदि वह न्यूनतम संवैधानिक सुरक्षा भी न होती, तो यह समाज किस दिशा में होता, इसकी कल्पना ही सिहरन पैदा करती है।
निष्कर्ष
भारतीय संविधान किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं है, लेकिन यह भी सत्य है कि: बी. एन. राव के बिना संविधान से कुछ छूट गया होता
और आम्बेडकर के बिना संविधान “बेजान”होता। आम्बेडकर ने संविधान को केवल शासन का उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का वचन बनाया। आज, जब बराबरी की यह लड़ाई अभी भी जारी है, तब यह समझना ज़रूरी है कि आम्बेडकर कोई ऐतिहासिक संयोग नहीं थे—वे ऐतिहासिक आवश्यकता थे।