कुछ महीने पहले ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में भारत में बढ़ती हिंसा और बेकाबू जघन्य अपराधों के उठते ग्राफ के कारण हमारे देश की गिनती दुनिया के सबसे अधिक 50 हिंसक देशों में की गयी है। विश्व शांति सूचकांक के आधार पर जारी की गयी इस रिपोर्ट में कुल 163 देशों को शामिल किया गया है। जिनमें भारत की रैंक 127 वीं है। इस सर्वे के अनुसार भारत पिछले साल के मुकाबले 12 पायदान नीचे खिसक गया है, जबकि आइसलैंड जैसे छोटे देश ने शांतिप्रिय देश की अपनी उपलब्धि बरकरार रखी है। भारत की रैंक में गिरावट के खास कारणों में मणिपुर में लगातार जारी जातीय हिंसा तो है ही, इसके साथ ही देश में बढ़ रही भीड़ हिंसा, दलित आदिवासियों और गरीबों पर भेदभाव के कारण हमले, दुस्साहसी व्यक्तिगत हिंसा, महिलाओं तथा बच्चों के साथ यौन हिंसा व साम्प्रदायिक टकराव और पुलिस पर लगने वाले उत्पीड़न, अत्यधिक बल प्रयोग और फर्जी एनकाउंटर, हाफ एनकाउंटर के बढ़ते आरोप भी शामिल हैं।

हालाँकि पड़ोसी देशों के हिसाब से देखें तो पाकिस्तान 152 तो अफगानिस्तान 157 वें स्थान पर हिंसा में हमसे काफी आगे नज़र आते हैं। लेकिन दूसरी तरफ नेपाल 111वें और बंग्लादेश 117 वें स्थान पर हमसे थोड़ा सा बेहतर हैं तो भूटान 16 वें और श्रीलंका 67वें स्थान पर भारत ही नहीं पूरे एशिया में बहुत अच्छी हालत में हैं। दरअसल, दुनिया के स्तर पर अमनचैन और सुरक्षा से जुड़े इस इंडेक्स को सिडनी स्थित इंस्टीट्यूट फाॅर इकाॅनोमिक्स एंड पीस द्वारा किया जाता है। दुनिया का थिंक टैंक मानी जाने वाली इस संस्था का कहना है कि विश्व शांति सूचकांक को बनाते समय 22 मुद्दों पर ध्यान दिया जाता है जिनमें विशेष रूप से सरकारों की कार्यशैली, अच्छा कारोबारी माहौल, संसाधनों का समान वितरण, दूसरों के अधिकारों की परवाह, पड़ोसियों से बेहतर सम्बन्ध, सूचनाओं का विश्वसनीय आदान प्रदान एवं मानवीय पूंजी के आदर्श रखरखाव, गरिमा व सम्मान को दृष्टिगत रखा जाता है।
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बढ़ती हिंसा की वजहें क्या?

पीस इंडेक्स के अनुसार भारत की सीमाओं पर तनाव, टकराव और छुटपुट हिंसा तो है ही, अंदरूनी हालत पर नज़र डालें तो साफ नज़र आता है कि हमारा देश क्यों शीर्ष हिंसक देशों में शामिल हुआ है। अहिंसा के पुजारी गांधी के देश में बढ़ती हिंसा का एक बड़ा कारण कट्टर सांप्रदायिक और जातीय श्रेष्ठता के दंभ से भरा एक ऐसा समूह भी माना जाता है जिसे अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का संरक्षण प्राप्त होने का आरोप है। विडंबना है कि ऐसे हिंसक लोग अपराध करके भी बच जाते हैं जबकि संविधान, कानून के राज और लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले हाशिए के लोग केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और शांतिपूर्ण विरोध करके भी सुनियोजित साज़िश के तहत कानून के शिकंजे में फंस या फंसा दिए जाते हैं। आज देश में ऐसे तत्वों का एक बड़ा समूह सक्रिय है जो हिंसा को अपना राजनीतिक आर्थिक जातीय या सांप्रदायिक उद्देश्य पूरा करने के लिये सही मानता है।

स्वतंत्र भारद्वाज का मामला

मिसाल के तौर पर हाल ही में पकड़ा गया स्वतंत्र भारद्वाज न केवल जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले युवाओं के वैचारिक तौर पर पूरी तरह खिलाफ था बल्कि वह अपने आक़ाओं के इशारे पर उन पर जानलेवा हमला कर सोशल मीडिया पर प्रसारित एक पाॅडकास्ट में इसे दुस्साहस और अहंकार के साथ स्वीकार भी कर रहा था। जिस सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर लड़की के पिता पर उसने घातक हमला किया वह दलित थी। दलितों को लेकर पक्षपात अन्याय और दमन हमारे समाज की आज भी एक कड़वी सच्चाई है। ऐसे ही कुछ संकीर्ण संगठन एक पार्टी और कुछ कट्टरपंथी लोगों ने दिन रात काम करके अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों के बारे में आम लोगों की यह झूठी राय बना दी है कि ये लोग ही समाज और देश की अनेक समस्याओं के लिये ज़िम्मेदार हैं। यही वजह है कि पुलिस का रूख़ भी इस वर्ग को लेकर अकसर पूर्वाग्रह का नज़र आता है। पिछले दिनों गुजरात के भावनगर में फैज़ल नाम के एक युवक ने अपने साथ कई साल से रहने वाली हिंदू महिला काजलबेन की हत्या कर दी थी।

पुलिस ने फैजल को पकड़कर सार्वजनिक रूप से जमकर पीटा। इसका वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो जनता का एक बड़ा वर्ग पुलिस के पक्ष में खड़ा नज़र आया। जो लोग पुलिस को नहीं कोर्ट को सज़ा देने का कानूनी अधिकार होने की बात कह रहे थे उनको अंधभक्तों ने ट्रोल करना शुरू कर दिया।

एनकाउंटर का चलन क्यों?

इस घटना से यह भी पता चलता है कि एक वर्ग कानून से इतर हिंसा के पक्ष में पूरी बेशर्मी से खड़ा है। ऐसे ही कुछ मामलों में आरोप लगते हैं कि यूपी सहित कुछ अन्य बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों में किसी पर गोकशी या हत्या, बलात्कार का गंभीर अपराध का आरोप लगता है और पुलिस प्रशासन उसे हथियार बरामद करने या हत्या का सीन रिक्रियेट करने, मौक ए वारदात पर देर रात ले जाकर कथित मुठभेड़ में मार देता है। कुछ लोगों के पांव में गोली मारकर हाफ एनकाउंटर भी खूब हो रहे हैं। थाने में हिरासत के दौरन असहनीय यातना और थर्ड डिग्री देने के मामले तो अनगिनत हैं लेकिन पुलिस के बड़े अफसरों से लेकर जांच करने वाले मजिस्ट्रेट निचली अदालतें और मानव अधिकार आयोग तक शिकायत के बावजूद इसका संज्ञान नहीं लेते हैं।

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कई साल पहले रात के अंधेरे में कुछ लोगों ने छात्रावास पर हिंसक हमला किया था। पुलिस वहां तमाशा देखती रही। इसके बाद जब एक पार्टी के छात्र प्रकोष्ठ की कोमल शर्मा पर हमले में शामिल होने का आरोप लगा तो पुलिस जांच के नाम पर उस मामले को ठंडे बस्ते में डालकर आज तक सो रही है।

जादवपुर यूनिवर्सिटी का मामला

पिछले महीने बंगाल में जादवपुर यूनिवर्सिटी में ठीक ऐसा ही मामला फिर से देखने में आया। पुलिस वहां भी चुपचाप सब कुछ देखती रही लेकिन सरकार ने भी इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की। आरोप है कि कई साल पहले दिल्ली में सीएए के खिलाफ चले शाहीन बाग आंदोलन, महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलित सम्मेलन और शम्भू बोर्डर पर चले किसान आंदोलन को रोकने के लिए भी कुछ तत्वों ने हिंसा का सहारा लिया।

कुछ साल पहले दिल्ली के गार्गी काॅलेज में चल रहे समारोह में भी कुछ बाहरी तत्वों ने अपनी नापसंद एक प्रोग्राम के बाद जमकर वहां के छात्र-छात्राओं से मारपीट की थी लेकिन जाँच के नाम पर उस मामले को भी दबा दिया गया था। रोड पर किसी की गाड़ी टकरा जाने पर थोड़ा सा नुक़सान होने पर आरोपी को पीट-पीटकर मार देने की घटनाएँ भी हाल ही में बहुत बढ़ चुकी हैं। मामूली ग़लती करने पर स्कूलों में बच्चों को पीटने और कॉलेज यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में छात्रों की आपसी हिंसा भी रुकने का नाम नहीं ले रही है।

गंभीर मामलों में भी पुलिस का रवैया कैसा?

अब नया ट्रेंड देखने में आ रहा है। जिन मामलों में सरकार अपने विरोधी अहसमत या आलोचकों को पुलिस या कोर्ट से सबक सिखाने में असमर्थ पाती है उनमें विपक्ष का आरोप है कि नाॅन स्टेट एक्टर हिंसा करने चले आते हैं। अगर ये मौके पर रंगे हाथ या किसी गवाह और सबूत के आधार पर पकड़कर पुलिस को सौंप भी दिये जाते हैं तो भी अव्वल तो स्वतंत्र भारद्वाज के अनुसार इनके आकाओं के इशारे पर इनके खिलाफ मुकदमा ही कायम नहीं हो पाता और अगर कभी कभी कहीं कहीं राजनीतिक नुकसान या कानून व्यवस्था की मजबूरी में केस दर्ज भी किया जाता है तो हल्की यानी ज़मानतीय धाराओं में लिखा जाता है। इसके बाद इनके खिलाफ गंभीरता से निष्पक्ष जांच गवाह और सबूत नहीं जुटाये जाते और कभी कभी जनता की नज़र हटते ही फाइनल रिपोर्ट लगाकर या मुकदमा वापस लेकर केस खत्म कर दिये जाते हैं। 

इस तरह से जब लोगों को लगता है कि उनको वर्तमान सरकार पुलिस और उसकी पक्षपात करने वाली जांच एजेंसियों के रहते न्याय नहीं मिलेगा वे कभी कभी खुद कानून हाथ में लेने पर उतर आते हैं जोकि ठीक नहीं माना जा सकता, लेकिन यह समाज में हिंसा के दुष्चक्र को और बढ़ावा देता है। हालत इतनी बदतर है कि हिंसा के कई मामले में माॅब लिंचिंग होने पर जिसकी सामूहिक हिंसा में भीड़ ने हत्या की उसी पर चोरी लूट या हमले का झूठा केस दर्ज कर दिया जाता है। हमारा मानना है जब तक सबको न्याय, रोज़गार, सम्पत्ति में समान अधिकार, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा और मानवीय गरिमा के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तब तक हिंसा का दुष्चक्र रोकना कठिन है।