किसी मुल्क को नई तकनीक में सीधी, चमकदार शुरुआत कम ही मिलती है। शुरुआत अक्सर उलझी होती है- कहीं रोशनी, कहीं धुंध, और हमेशा कोई सबक छोड़ जाती है।
दिल्ली का एआई इम्पैक्ट सम्मेलन भारत की ताजपोशी का मंच बनाया गया था। लाखों लोग दर्ज हुए, दर्जनों हुक़ूमतों के सरदार आए, सैकड़ों आलमी माहिर जमा हुए। पैग़ाम साफ़ था- भारत सिर्फ़ एआई अपनाना नहीं चाहता, उसे गढ़ना चाहता है, अपने लिए और पूरे दक्षिणी दुनिया के लिए।
मगर सबसे पहले जो तस्वीरें बाहर निकलीं, वो कामयाबी की नहीं थीं। वो कतारों की थीं।
भारत मंडपम में लोग घंटों खड़े रहे। इंटरनेट बार‑बार अटकता रहा। हॉलों के बीच भटकते हुए कई मेहमान अपने सत्र चूक गए। खाने के काउंटर पर, उस मुल्क में जिसने सबसे आसान भुगतान व्यवस्था बनाई है, नक़द ही बादशाह था।
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कहानियाँ फैलती रहीं- उपकरण जमा कराने पड़े, वापस पाने में मुश्किल हुई। सच हों या अफ़वाह, वो भाषणों से तेज़ दौड़ीं। सम्मेलन एक पल को आईना बन गया- दिखाने वाला कि ख़्वाब और अमल के बीच कितनी दूरी है।
यह दूरी मामूली नहीं। एआई सिर्फ़ किताबों और नीतियों से नहीं आँका जाता। वो इस बात से आँका जाता है कि कोई मुल्क पेचीदगी को कितनी आसानी में बदल पाता है। तजुर्बा बिगड़ता है तो दास्तान भी बिखर जाती है।
भारत ने पहले भी अनुशासन दिखाया है। आधार ने करोड़ों लोगों को जोड़ा। यूपीआई ने गली के ठेले वाले से लेकर बड़ी कंपनियों तक को एक ही रेल पर ला दिया। चंद्रयान ने मामूली बजट में चाँद छू लिया। ये तमाशे नहीं थे, ये निज़ाम थे- नागरिक‑मुखी, दोहराए जा सकने वाले, अनुशासित निज़ाम। फिर एआई सम्मेलन में बुनियादी बातें क्यों लड़खड़ा गईं?
जवाब है- दिखावे का मोह। बड़े आयोजन अक्सर सजावट को प्रवाह से ऊपर रख देते हैं। बैनर छप जाते हैं, मेहमान आ जाते हैं, सुरक्षा कड़ी हो जाती है। मगर असली कसौटी है- भीड़ का बहाव, नेटवर्क की मज़बूती, रास्तों की साफ़गोई। यही तय करता है कि ख़्वाब ज़िंदा लगेगा या सिर्फ़ नुमाइश।
पहले दो दिन ने साफ़ कर दिया कि भारत का एआई लम्हा मंच पर दिए गए भाषणों से नहीं, गलियारों की व्यवस्था से तय होगा। छोटे शहरों से आए छात्र, अपने बूथ सँभालते उद्यमी, छुट्टी लेकर पहुँचे इंजीनियर- उनकी याद कतारों की रही, न कि सत्रों की। एआई में वक़्त ही असली पूँजी है। मॉडल उसे बचाते हैं, स्टार्ट‑अप उसे जलाते हैं, निवेशक उसी का भाव लगाते हैं। घंटों कतार में खड़ा होना सिर्फ़ असुविधा नहीं, मौक़े की हानि है।

दुनिया पूरे निज़ाम को देखती है। चीन के मेले अनुशासन का पैग़ाम बने। अमेरिका के सम्मेलन सहजता का प्रतीक बने। यूरोप के आयोजन स्थिरता का। किसी मुल्क के मेले उसके हुक़ूमत की क़ाबिलियत का आईना बन जाते हैं। भारत ने कहा है कि उसका एआई इंसान‑केंद्रित होगा, समावेशी होगा। यह संकल्प सही है। मगर समावेश की शुरुआत तजुर्बे से होती है।
भारत मेहमाननवाज़ी जानता है। शादी‑ब्याह में हर बारीकी का ध्यान रखा जाता है। मेहमानों को दिशा, खाना, स्वागत सब मिलता है। वहाँ अराजकता में भी लय होती है। सम्मेलन में, इसके उलट, प्रतिभागी मेहमान कम और भीड़ ज़्यादा लगे।
जोखिम यहीं है। भारत के एआई भविष्य के असली दूत वे छात्र हैं जो रात में कोड लिखते हैं, वे शिक्षक हैं जो छोटे कस्बों में मशीन लर्निंग समझाते हैं। अगर वो हाशिये पर महसूस करेंगे, तो निज़ाम सिकुड़ जाएगा। फिर भी सम्मेलन की गंभीरता नकारा नहीं जा सकती। विषय गहरे थे — रोज़गार, शासन, असमानता। पंजीकरण संख्या बताती है कि एआई अब भारत में सिर्फ़ अभिजात वर्ग का विषय नहीं रहा। भूख असली है।

भारत का फ़ायदा उसका जोश है। सवाल है — क्या संस्थाएँ उस ऊर्जा को अनुशासन से मिला पाएँगी।

एआई का सार है- सीमाओं में रहते हुए अनुकूलन। अगर भारत नेतृत्व चाहता है, तो उसकी संस्थाओं को वही उसूल अपनाने होंगे — साफ़ प्रक्रिया, नाकामी के ख़िलाफ़ तैयारी, नागरिक‑केंद्रित सोच। सम्मेलन कोई हाशिये की घटना नहीं, यह इम्तिहान है।
निवेशक सिर्फ़ नीतियों से नहीं, प्रशासनिक क़ाबिलियत के संकेतों से प्रभावित होते हैं। हुनरमंद इंजीनियर वही निज़ाम चुनते हैं जो उनके वक़्त का सम्मान करे। अंतरराष्ट्रीय साझेदार वही भरोसा करते हैं जो तजुर्बे से साबित हो। भारत ने दिखाया है कि वो कुछ कर सकता है। आधार, यूपीआई, अंतरिक्ष कार्यक्रम — सबने यही बताया कि जब अमल को रणनीति माना गया, कामयाबी मिली।
एआई सम्मेलन की शुरुआती ठोकरें शर्म नहीं, तश्ख़ीस हैं। ख़्वाब अमल से आगे निकल गया। पैमाना बुला लिया गया, प्रवाह तैयार नहीं था। सुरक्षा कड़ी थी, दिशा और संवाद कमज़ोर। ये सब सुधारे जा सकते हैं — अगर मान लिए जाएँ। भारत लंबी दौड़ चाहता है। लेकिन नेतृत्व घोषणाओं से नहीं, बार‑बार साबित की गई क़ाबिलियत से आता है।
कतारें लंबी थीं। सबक उससे भी लंबा है। अगर भारत उन कतारों को उतनी ही गंभीरता से पढ़े जितनी कोड को पढ़ता है, तो यह सम्मेलन ठोकर नहीं, मोड़ साबित होगा। एआई में नेतृत्व सीट पाने से नहीं, मेज़ को मज़बूत बनाने से आता है। कुर्सियाँ स्थिर हों, हर प्रतिभागी को जगह साफ़ दिखे — यही असली कसौटी है।

अंततः एआई इंसान की क़ाबिलियत को बढ़ाने का ज़रिया है। भारत की कामयाबी इस पर आँकी जाएगी कि अगला छात्र, जो ट्रेन पकड़कर सम्मेलन आए, लौटते वक़्त महसूस करे कि उसका वक़्त इज़्ज़त पाया, उसकी सोच की क़दर हुई, और उसका मुल्क क़ाबिल है।
(सतीश झा इंडियन एक्सप्रेस, जनसत्ता और दिनमान के संपादक रह चुके हैं। अब विदेश में रहते हैं और सत्य हिन्दी के लिए लिखते हैं। )