ईरान में भीषण हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। ईरान में 1979 के बाद अमेरिका और इसराइल सत्ता परिवर्तन के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं। चार दशकों में 8 अमेरिकी राष्ट्रपति बदल चुके हैं। लेकिन ईरान की कहानी भी तेल से जुड़ी हुई है। पढ़िएः
ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई को हटाने के लिए यूएस-इसराइल एकजुट। फाइल फोटो
ईरान में 1979 के बाद शासन परिवर्तन के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन नहीं देखे गए हैं। क्या इन प्रदर्शनों का संबंध तेल के खेल से भी है। इस विश्लेषण को अंत तक पढ़िए। पिछले 15 दिनों से ईरान के लगभग हर शहर में लोग बढ़ती महंगाई, गिरती ईरानी मुद्रा और बेरोजगारी के खिलाफ सड़कों पर उतरे हुए हैं। लेकिन अब उन मूल समस्याओं को छोड़कर लोग शासन परिवर्तन की मांग कर रहे हैं। गुरुवार 8 जनवरी की रात को पूरे ईरान में इंटरनेट बंद कर दिया गया। लेकिन प्रदर्शन रुके नहीं। कई स्थानों से सरकारी भवनों को आग लगाने और वाहनों को जलाने के वीडियो, फोटो सामने आए। 9 जनवरी को ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई ने ईरानी जनता को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि यूएस राष्ट्रपति ट्रंप को खुश करने के लिए ये प्रदर्शन हो रहे हैं।
ईरानी सरकार इन प्रदर्शनों को नियंत्रित करने की कोशिशों में लगी है। हालांकि, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ बयान जारी कर दबाव बना रहे हैं। ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि यदि प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई तो अमेरिका सीधा हमला करेगा। ट्रंप ने अब यह भी दावा किया है कि सुप्रीम लीडर अली खामनेई मास्को भागने की योजना बना रहे हैं। अली खामनेई 1979 की इस्लामिक क्रांति और इसके अगुआ आयतुल्लाह खुमैनी के निधन के बाद 1989 में ईरान के सुप्रीम लीडर बने थे।
ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति होने से पहले शाह रज़ा पहलवी का शासन था और यह पूरी तरह अमेरिका के प्रभाव में था। ईरान उस समय हर क्षेत्र में अत्याधुनिक माना जाता था। ईरान में शराबखाने से लेकर कैसीनो तक खुले हुए थे। महिलाओं को पर्दा न करने की पूरी आज़ादी थी। लेकिन इस्लामिक क्रांति ने सबकुछ बदल दिया। शाह रज़ा पहलवी को देश छोड़कर अमेरिका भागना पड़ा। जहां अब उनके बेटे रज़ा पहलवी प्रिंस है। अमेरिका उनका खर्च उठाता है। ईरान में मौजूदा प्रदर्शनों को रज़ा पहलवी की अपील से प्रेरित माना जा रहा है। रज़ा पहलवी रोजाना एक्स पर ट्वीट कर रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने एक्स पर लिखा है कि ईरान में अब बड़े प्रदर्शन आयोजित किए जाएं। उन्होंने ट्रंप की तारीफ की और यूरोपीय देशों से प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए अपील की। एक्स के मालिक एलोन मस्क ने फौरन अपनी इंटरनेट सर्विस स्टार लिंक को ईरान में खोल दिया और उसका एक्सेस फ्री कर दिया। इसकी वजह ईरान में सरकार की ओर से इंटरनेट शटडाउन करना है।
अमेरिकी राष्ट्रपति और ईरानी पहेली
1979 की क्रांति के बाद से, अमेरिका में आठ राष्ट्रपति कुर्सी परआए। जिनमें से सभी ने, अलग-अलग डिग्री तक, ईरानी शासन को अलग-थलग करने, दबाव डालने या बदलने के उद्देश्य से नीतियां अपनाईं। वे हैं:
- जिमी कार्टर (1977-1981) – क्रांति और बंधक संकट से निपटे।
- रोनाल्ड रीगन (1981-1989) – ईरान-इराक युद्ध में इराक का समर्थन किया।
- जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश (1989-1993)- ईरान के खिलाफ इराक की सैन्य मदद।
- बिल क्लिंटन (1993-2001) – व्यापक प्रतिबंध लगाए।
- जॉर्ज डब्ल्यू. बुश (2001-2009) – ईरान को "एक्सिस ऑफ एविल" में शामिल किया।
- बराक ओबामा (2009-2017) – ईरान से समझौता लेकिन दबाव बनाए रखा।
- डोनाल्ड ट्रंप (2017-2021) – ओबामा के समझौते को रद्द किया और "अधिकतम दबाव" लागू किया।
- जो बाइडन (2021) – ईरान पर कड़े प्रतिबंध लागू किए गए।
- डोनाल्ड ट्रंप (2025) - इसराइल ने ईरान पर हमला किया, यूएस ने मदद की। पाबंदियां और कड़ी कीं।
चार दशकों में इस निरंतर दबाव और अरबों डॉलर खर्च होने के बावजूद, ईरान में शासन परिवर्तन का लक्ष्य दूर की कौड़ी बना हुआ है।
ईरान में विशेष रूप से "शासन परिवर्तन" के लिए अमेरिका और इसराइल द्वारा खर्च की गई सटीक फंड का आकलन करना कठिन है, क्योंकि धन व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों के प्रवर्तन, खुफिया अभियानों और विपक्षी समूहों के समर्थन के लिए आवंटित किया जाता है।
अमेरिका ने 44 वर्षों में सैकड़ों अरबों डॉलर खर्च किए हैं। इसमें फारस की खाड़ी में सैन्य तैनाती की लागत, व्यापक प्रतिबंध शासन को लागू करना, रेडियो फर्दा और वॉयस ऑफ अमेरिका पर्शिया जैसे प्रसारकों को धन देना, और ईरान के भीतर "लोकतंत्र को बढ़ावा देने" और सिविल सोसाइटी के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का समर्थन करना शामिल है। ट्रंप के तहत "अधिकतम दबाव" अभियान ने अकेले ईरान पर गंभीर आर्थिक लागत डाली। लेकिन इसमें अमेरिकी टैक्स पेयर्स का पैसा शामिल है, जिसके विरोध में अमेरिका में प्रदर्शन हुए। एक घटना से अमेरिकी खर्च का अंदाजा लगाया जा सकता है। वॉल स्ट्रीट जनरल के मुताबिक अमेरिकी बंधकों को छुड़ाने के लिए अमेरिका ने 2016 में ईरान को 1.7 अरब डॉलर की रकम दी थी।
ईरान से युद्ध और इसराइल का खर्चा
इसराइल का ईरान पर हमले और शासन परिवर्तन पर अमेरिका से ज्यादा खर्च हुआ। टाइम्स ऑफ इंडिया ने जून 2025 में वॉल स्ट्रीट जनरल के हवाले से खबर दी थी इसराइल को युद्ध में हर दिन 200 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। लेकिन ईरान के मिसाइल हमले में इसराइल को 400 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था। इसराइल का खर्च, हालांकि पैमाने में छोटा है, लेकिन अत्यधिक केंद्रित है। अनुमान बताते हैं कि इसराइल ने टारगेट खुफिया अभियानों (जैसे परमाणु सुविधाओं को तोड़फोड़ करना और वैज्ञानिकों की हत्या करना), साइबर युद्ध और क्षेत्र में ईरान के सहयोगियों (जैसे सीरिया में) का विरोध करने वाले उग्रवादी समूहों का समर्थन करने पर कई अरब डॉलर खर्च किए हैं। मोसाद का पूरा फोकस ईरान और उसके प्रॉक्सी संगठनों पर रहता है। अकेले खुफिया एजेंसी मोसाद का वार्षिक बजट लगभग 10 अरब यूरो (2.73 अरब अमेरिकी डॉलर) होने का अनुमान है। मोसाद में लगभग 7,000 लोग काम करते हैं जो दिल्ली सहित पूरी दुनिया में फैले हुए हैं।
सूचना युद्ध भीषण है। जबकि पश्चिमी मीडिया सरकार विरोधी प्रदर्शनों को खासा महत्व दे रहा है। अमेरिका और कुछ अन्य देशों के चंद स्वतंत्र पत्रकार ईरान सरकार समर्थक रैलियों को दिखा रहे हैं, लेकिन यह एक ऐसी कहानी है जो अक्सर सुर्खियों से गायब रहती है। ईरान की कहानी एकतरफा नहीं है। उसके शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान को ईरानी जनता का अभी भी पर्याप्त समर्थन मिल रहा है। लेकिन न्यूजवीक और टाइम्स यही बता रहे हैं कि खामनेई और उनके खास आजकल में ही ईरान से भागने वाले हैं।
सारे खेल में असली कहानी क्या है, पत्रकार सीमोर हर्श ने बताई
प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार सीमोर हर्श ने 8 जनवरी 2026 को अपने सबस्टैक पर प्रकाशित लेख "WHAT IS TRUMP’S GAMBIT IN VENEZUELA?" में दावा किया है कि डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला पर हालिया सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उनकी पत्नी को पकड़ने का असली उद्देश्य सिर्फ मादुरो की भ्रष्ट सरकार को हटाना नहीं है, बल्कि चीन को वेनेजुएला के सस्ते भारी कच्चे तेल की आपूर्ति रोकना है। ईरान के पास भी तेल का भंडार है। चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। इसीलिए वेनेजुएला के बाद ट्रंप का अगला निशाना ईरान है। वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं और चीन इसका बड़ा खरीदार है। लेख के अनुसार, ट्रंप प्रशासन इसे अमेरिका के "पड़ोस" में विरोधियों को फायदा पहुंचाने के रूप में देखता है। स्टेफन मिलर और यूएन में अमेरिकी राजदूत माइकल वाल्ट्ज ने खुले तौर पर कहा कि सुपरपावर होने के नाते अमेरिका शर्तें तय करेगा और तेल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाएगा।
हर्श बताते हैं कि यह नीति जॉर्ज बुश के समय से चली आ रही है, जब डिक चेनी ने तेल आपूर्ति में अमेरिकी स्वतंत्रता पर जोर दिया था। यह वेनेजुएला पर कार्रवाई चीन के खिलाफ ऊर्जा युद्ध की शुरुआत है। अगला निशाना ईरान हो सकता है, जो चीन को तेल बेचता है और दुनिया के चौथे सबसे बड़े तेल भंडार वाला देश है। संक्षेप में: ट्रंप का दांव तेल पर नियंत्रण और चीन को कमजोर करने का है, न कि केवल वेनेजुएला में लोकतंत्र लाने का। ईरान में अमेरिका पहले सत्ता परिवर्तन चाहता है, उसके बाद वो वहां भी तेल का खेल शुरू करेगा।