भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची के बीच लगातार बातचीत क्यों हो रही है? क्या ईरान संकट और बदलती वैश्विक राजनीति के बीच मोदी सरकार बेचैन है और कूटनीतिक रास्ता तलाश रही है?
युद्ध के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की फोन पर बातचीत हुई। यह दोनों नेताओं के बीच फरवरी के अंत से अब तक चौथी बार बातचीत है। एक दिन पहले ही पीएम मोदी ने भी ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान से बात की थी। सवाल है कि लड़ अमेरिका-इसराइल और ईरान रहे हैं तो फिर ईरानी नेताओं की एक के बाद एक बातचीत भारतीय नेताओं से क्यों हो रही है? लड़ाई में है तो ईरान की परेशानी समझ आती है। बातचीत के लिए मोदी सरकार की इतनी बेचैनी क्यों? इन सवालों के जवाब ढूंढने से पहले यह जान लें कि दोनों विदेश मंत्रियों के बीच ताज़ा बातचीत के बाद क्या कहा गया है।
क्या हुआ है बातचीत में?
फ़रवरी 2026 के अंत से लेकर अब तक जयशंकर और अरागची के बीच चार बार फ़ोन पर चर्चा हो चुकी है। ईरान की ओर से जारी बयान के मुताबिक़, अरागची ने जयशंकर को अमेरिका और इसराइल के हमलों के बाद की ताज़ा स्थिति बताई। ईरान इन हमलों को अपनी आज़ादी पर हमला मानता है और कहता है कि उसकी सरकार, जनता और सेना आत्मरक्षा के लिए तैयार है। अरागची ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों से इन हमलों की निंदा करने की अपील की और ब्रिक्स देशों- ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और अब ईरान से ज्यादा सहयोग मांगा, ताकि क्षेत्रीय और वैश्विक शांति बनी रहे।जयशंकर ने बातचीत की पुष्टि करते हुए एक्स पर लिखा, 'कल रात ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची से फिर बात हुई। द्विपक्षीय मुद्दों के साथ ब्रिक्स से जुड़े विषयों पर चर्चा की।' भारत ने कहा कि वह क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग बढ़ाने को तैयार है। इसके साथ ही क्षेत्र में लंबे समय तक स्थिरता और सुरक्षा मज़बूत करने की ज़रूरत पर जोर दिया।
पिछली बातचीतों में भी यही मुद्दे उठे थे। 28 फ़रवरी को अमेरिका-इसराइल के हमलों के तुरंत बाद बातचीत हुई थी। इसके बाद 5 मार्च को तनाव बढ़ने पर और 10 मार्च को विस्तार से चर्चा हुई थी जिसमें ईरान के एक लड़कियों के स्कूल पर मिसाइल हमले और नागरिक इलाकों पर अटैक का जिक्र था। दोनों ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा पर भी बात की।
ईरान ने इन हमलों को संयुक्त राष्ट्र के नियमों और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। भारत ने हमेशा शांति की अपील की है और दोनों देश संपर्क में बने रहने पर सहमत हुए।
पश्चिम एशिया का संकट
28 फरवरी को अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर बड़े हमले किए, जिसमें खामेनेई समेत कई बड़े नेता मारे गए। ईरान ने जवाब में इसराइल और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। इससे मध्य पूर्व में युद्ध जैसी स्थिति बन गई। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया। यहां से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल और गैस गुजरता है। अब जहाजों की आवाजाही रुक गई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मच गई। तेल की क़ीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं और दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल महंगा हो रहा है।
मोदी सरकार की बेचैनी के पीछे क्या कारण हैं?
मोदी सरकार की ओर से ईरान के साथ लगातार बातचीत को कुछ लोग 'बेचैनी' कह रहे हैं, लेकिन कुछ इसे सक्रिय कूटनीति मानते हैं। यह सक्रियता इसलिए भी अहम है क्योंकि इस युद्ध के शुरू होने से ऐन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसराइल की यात्रा की थी। इसको लेकर उनको अपने देश में काफ़ी आलोचना भी झेलनी पड़ी। कुछ जानकार कहते हैं कि यह भारत के लंबे समय से दोस्त रहे ईरान को भी नागवार गुजरा। इसके अलावा भी कई कारण हैं-
ऊर्जा सुरक्षा का ख़तरा
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। देश में मध्य पूर्व से 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल मंगाते हैं, जिसमें ईरान का हिस्सा भी है। होर्मुज बंद होने से 20 से ज्यादा भारतीय तेल और गैस टैंकर फंस गए हैं। विदेश मंत्रालय इनके सुरक्षित गुजरने के लिए ईरान से बात कर रहा है। अगर तेल की सप्लाई रुकी तो भारत में महंगाई बढ़ेगी, फैक्टरियां बंद हो सकती हैं और अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा।
आर्थिक असर
तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ रहा है। 2025-26 में भारत का तेल आयात खर्च पहले से 20-30 प्रतिशत ज्यादा हो सकता है। मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को स्थिर रखना चाहती है, इसलिए ईरान से बात करके संकट जल्दी सुलझाने की कोशिश कर रही है।
कूटनीतिक संतुलन
भारत के अमेरिका और इसराइल के साथ अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन ईरान से भी पुराने संबंध हैं। चाबहार पोर्ट जैसी परियोजनाएँ ईरान के साथ हैं, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देती हैं। मोदी सरकार नहीं चाहती कि यह संकट भारत के हितों को नुकसान पहुंचाए, इसलिए बीच का रास्ता निकाल रही है।ब्रिक्स की भूमिका
भारत और ईरान दोनों ब्रिक्स के सदस्य हैं। ब्रिक्स अमेरिका-केंद्रित दुनिया के खिलाफ एक विकल्प है। ईरान ब्रिक्स से मदद मांग रहा है, और भारत इसमें अहम भूमिका निभा सकता है। जयशंकर की बातचीत में ब्रिक्स पर जोर इसी वजह से है।
क्षेत्रीय स्थिरता
भारत नहीं चाहता कि यह युद्ध फैले, क्योंकि इससे पाकिस्तान या अन्य पड़ोसी देशों में अस्थिरता आ सकती है। साथ ही, लाखों भारतीय मध्य पूर्व में काम करते हैं, उनकी सुरक्षा भी दांव पर है। हालाँकि, कुछ लोग इसे कह सकते हैं कि यह बेचैनी नहीं, बल्कि स्मार्ट डिप्लोमेसी है। यह भी तथ्य है कि संकट के समय बातचीत ही समाधान है। हालाँकि, कुछ विपक्षी नेता इसे मोदी सरकार की कमजोरी बता रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि पीएम मोदी अमेरिका और इसराइल के दबाव में 'कंप्रोमाइज्ड' हैं।
आगे क्या हो सकता है?
तो यदि इन आरोपों को सही मानें तो मोदी सरकार अब ईरान से लगातार बातचीत क्यों कर रही है? कहीं वार्ता कराने के लिए प्रयास तो नहीं करवाया जा रहा है जिससे बातचीत से युद्ध ख़त्म करने का रास्ता निकाला जाए? आखिरकार इस युद्ध की वजह से भारत का भी काफ़ी कुछ दाँव पर है। इस संकट के अभी थमने के आसार नहीं हैं। दुनिया की नज़रें होर्मुज पर टिकी हैं कि कब जहाज गुजरने लगेंगे। भारत ब्रिक्स समिट या अन्य मंचों पर इस मुद्दे को उठा सकता है। अगर स्थिति बिगड़ी तो तेल की क़ीमतें और ऊपर जा सकती हैं, जिसका असर हर भारतीय की जेब पर पड़ेगा।