रांची में देवेंद्र नाथ महतो छात्रों के मार्च को लीड करते हुए। फाइल फोटो
सत्ता पक्ष सड़क पर उतरकर विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन करे, यह लोकतंत्र में एक दुर्लभ घटना है। लेकिन इस बार संसद में ऐसा ही हुआ। बीजेपी और एनडीए के सांसदों ने संसद भवन परिसर में प्रदर्शन करके विपक्ष के नेता राहुल गांधी से रांची जाकर छात्रों के आंदोलन का समर्थन करने की मांग की। ये प्रदर्शन वे लोग कर रहे थे, जिनकी हमदर्दी जंतर मंतर छात्र आंदोलन से रत्तीभर भी नहीं दिखी।
राहुल गांधी, जो जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठीचार्ज को लेकर गृह मंत्री अमित शाह को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, वे झारखंड के छात्रों के रांची आंदोलन का उस तरह समर्थन नहीं कर रहे हैं, जिस तरह उन्होंने जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज को मुद्दा बना रखा है। इसका बड़ा कारण यह है कि झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार में कांग्रेस भी भागीदार है। हालांकि राहुल गांधी ने कम से कम चार बार झारखंड के आंदोलनकारी छात्रों के साथ पूरी एकजुटता दिखाई। कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में 10 अगस्त को राहुल गांधी के शब्द थे- हम झारखंड के आंदोलनकारी छात्रों के साथ है। इसे लेकर हमें कोई कन्फ्यूज़न नहीं है।
झारखंड में जेन-जी का आक्रोश उफान पर है। दिल्ली के जंतर-मंतर आंदोलन से प्रेरित छात्रों के संघर्ष का मुद्दा भी लगभग समान है। जंतर-मंतर पर मुख्य मांग नीट-यूजी परीक्षा में पेपर लीक से संबंधित थी। रांची में राज्य सरकार की नौकरियों के लिए आयोजित परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली मुद्दा है। दिल्ली में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सरकार ने आंदोलन खत्म करा दिया। झारखंड में छात्र शिक्षा मंत्री या मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग भी नहीं कर रहे हैं। छात्र चाहते हैं कि पेपर लीक और परीक्षा में धांधली की जांच सीआईडी की जगह सीबीआई से कराई जाए। इसके साथ ही कुछ और परीक्षाओं को रद्द करने की मांग भी है।
सोरेन को सीबीआई से डर
करीब तीन सप्ताह तक राज्य की राजधानी रांची में छात्रों का धरना, आमरण अनशन, विधानसभा के घेराव, प्रदर्शन और सीमित बल प्रयोग तक गैर-राजनीतिक रहने के बाद इस आंदोलन में राजनीति की पैठ भी हो चुकी है। बीजेपी का छात्र संगठन एबीवीपी भी आंदोलन में कूद पड़ा है।
जैसे-जैसे आंदोलन तेज हुआ, वैसे-वैसे राज्य सरकार की सीआईडी जांच की गतिविधियां भी तेज होती गईं। नौकरी परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली के आरोपी कई बड़े अफसर गिरफ्तार हुए। तीन बड़ी परीक्षाएं रद्द कर दी गईं। लेकिन छात्र मानने के लिए तैयार दिखाई नहीं दे रहे हैं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन प्रेस के सामने आकर कहते हैं कि छात्रों की 98 प्रतिशत मांगें पूरी हो चुकी हैं। लेकिन दो मुद्दों पर मामला फंस गया है। इनमें एक सीबीआई जांच का मुद्दा है, जिस पर सरकार किसी भी हाल में सहमत होने के लिए तैयार नहीं दिखाई देती।
रांची के वरिष्ठ पत्रकार जय शंकर कहते हैं कि जांच सीबीआई को सौंपकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने गले में फंदा नहीं डालना चाहते हैं। 2020 में सीबीआई ने उनके खिलाफ एक मामले की जांच शुरू की थी। सबूत नहीं जुटा पाने के कारण उस मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।
जय शंकर यह भी बताते हैं कि 2024 में ईडी ने जमीन से जुड़े एक मामले में धन की हेराफेरी का आरोप लगाकर हेमंत सोरेन को गिरफ्तार कर लिया था। उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। बाद में हाई कोर्ट ने पर्याप्त सबूत नहीं होने के कारण उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया। दोबारा चुनाव के बाद वे फिर मुख्यमंत्री बने।
जय शंकर का मानना है कि सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा और इंडिया गठबंधन के सदस्यों को डर है कि परीक्षा में धांधली की जांच में सीबीआई हेमंत सोरेन या उनके अन्य नेताओं को फंसाकर सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकती है। यह केंद्र की बीजेपी और राज्य की इंडिया गठबंधन सरकार के बीच स्वार्थ का सीधा टकराव है। राहुल गांधी की खामोशी का राज भी इसी में छिपा है।
परीक्षा धांधली का इतिहास
सन 2000 में झारखंड राज्य की स्थापना के कुछ समय बाद ही नौकरियों की परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य धांधलियों के आरोप शुरू हो गए। पूर्व विधायक और आरजेडी के नेता गौतम सागर राणा कहते हैं कि करीब 26 साल पुराने झारखंड में 13 साल तक बीजेपी के चार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उस दौर में भी पेपर लीक की घटनाएं हुईं। कुछ मामलों में जांच सीबीआई को दी गई। लेकिन उनमें से भी ज्यादातर मामलों में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी है।कुछ मामलों में छात्र सीबीआई जांच के लिए कोर्ट भी गए, लेकिन कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपने से मना कर दिया। राणा मानते हैं कि सीआईडी जांच की प्रगति अच्छी है। छात्रों को तीन महीने का समय देना चाहिए। सरकार अगर वादा पूरा नहीं करती है, तो वे आगे की रणनीति पर विचार कर सकते हैं।
एबीवीपी के आंदोलन में शामिल होने के बाद सवाल सिर्फ सीबीआई जांच का नहीं है। विवाद राज्य और केंद्र सरकार के बीच विश्वास का भी बन गया है। सवाल सीबीआई की विश्वसनीयता को लेकर भी उठाए जा रहे हैं। सीबीआई की विश्वसनीयता का सवाल सुप्रीम कोर्ट भी उठा चुका है।
बहरहाल, हेमंत सोरेन सावधानी से कदम उठा रहे हैं। सीआईडी, जिस पर सरकार के इशारे पर काम करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं, वह इस बार तत्परता दिखा रही है।
झारखंड छात्र आंदोलन में एक चौंकाने वाली बात यह हुई कि आंदोलनकारी झारखंड के लोकप्रिय नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की तस्वीर लेकर मार्च कर रहे थे। शिबू सोरेन, हेमंत सोरेन के पिता और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक हैं। इसके चलते सोरेन उम्मीद कर रहे थे कि वे आंदोलन संभाल लेंगे, लेकिन विधानसभा के पास छात्र प्रदर्शन पर हल्के लाठीचार्ज और पानी की बौछार ने हालात बिगाड़ दिए।
अब स्थानीय स्तर पर विद्यार्थी परिषद और संसद में बीजेपी ने मोर्चा संभाल लिया है। जाहिर है कि बीजेपी ने अघोषित रूप से ऐलान कर दिया है कि छात्र आंदोलन पर वह खामोश नहीं रहेगी।