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मोदी से ‘ममता’ मजबूरी है कि जरूरी?

केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग लगातार हो रहा है लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विश्वास है कि इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच यह विश्वास औपचारिक रूप से बना रहना चाहिए। इस लिहाज से ममता बनर्जी ने बहुत संतुलित और सारगर्भित टिप्पणी की है। लेकिन, सच यह भी है कि यह प्रतिक्रिया ममता के तेवर से मेल नहीं खाती।

एक और बात जो चौंकाती है- केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग पर निन्दा प्रस्ताव। यह निन्दा प्रस्ताव किसके विरुद्ध है? केंद्रीय एजेंसियों के विरुद्ध! अभी-अभी इंडियन एक्सप्रेस ने पूरी रिपोर्ट दी है कि एनडीए की सरकार में 95 प्रतिशत विपक्ष के नेता ही निशाने पर रहे। क्या इसके लिए केंद्रीय एजेंसियां जिम्मेदार हैं?

क्यों बदला ममता का रुख?

अगर वास्तव में यूपीए और एनडीए सरकार में विपक्ष के नेताओं पर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाईयों में जो बड़ा फर्क दिखा है उसके पीछे कोई राजनीतिक मंशा नहीं है तो सत्ताधारी नेताओं का यह दावा बिल्कुल सही माना जाना चाहिए कि “केंद्रीय एजेंसियां अपना काम कर रही हैं।“ फिर भेदभाव कैसे? इसी मायने में कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी की भाषा केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी के लिए नरम और उस जैसी हो गयी है। 

Mamata Banerjee on Central agencies misuse   - Satya Hindi

लेकिन, ऐसा क्यों हुआ? यह बदलाव आया क्यों?

साफ तौर पर ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी ने आम चुनाव में बीजेपी से सीधे टकराने की मंशा छोड़ दी है। गुजरात या हिमाचल प्रदेश या फिर अन्य आगामी विधानसभा चुनावों में भी तृणमूल कांग्रेस की कहीं सीधी टक्कर बीजेपी से नहीं होने जा रही है। मतलब ये कि नरेंद्र मोदी को सामने रखकर रणनीति बनाने की तत्काल कोई आवश्यकता ममता को नहीं दिखती। 

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मोदी-शाह को शिकस्त दे चुकी हैं ममता

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी के आक्रामक तेवर और नरेंद्र मोदी की ओर से आगे बढ़कर ममता बनर्जी को ‘छेड़ने’ के कारण असामान्य स्थिति जरूर पैदा हुई थी। मगर, तब ममता ने एक टांग से पश्चिम बंगाल में बीजेपी के इरादों को नेस्तनाबूत कर दिखाया था। कह सकते हैं कि ममता ने न सिर्फ पश्चिम बंगाल का चुनाव जीता था बल्कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी को भी धूल चटायी थी। इस तरह वर्तमान सियासत में ऐसी कोई आवश्यकता ममता बनर्जी के पास नहीं है कि उन्हें साबित करना पड़े कि वे मोदी-शाह को हरा सकती हैं।

आने वाले समय में पश्चिम बंगाल में पंचायत के चुनाव होने हैं। उसके बाद लोकसभा का चुनाव सामने होगा। पंचायत चुनाव में मुद्दे स्थानीय होंगे। नरेंद्र मोदी को टारगेट करके तृणमूल कांग्रेस को कोई राजनीतिक फायदा नहीं होगा, उल्टे बीजेपी को इसका फायदा मिलेगा। यही जरूरत वास्तव में ममता बनर्जी को उनकी रणनीति बदलने को विवश कर रही है।

केजरीवाल से दो कदम आगे चली गयीं ममता?

तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी ने जो रणनीति अपनायी है वह आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की उस रणनीति से मिलती-जुलती जरूर दिखती है लेकिन वास्तव में यह उससे थोड़ा अलग है। आम आदमी पार्टी की रणनीति थी कि नरेंद्र मोदी को बख्श दिया जाए, उनका जिक्र ही नहीं किया जाए ताकि स्थानीय मुद्दों पर फोकस किया जा सके। इससे स्थानीय सियासत में केजरीवाल की अपनी पकड़ का रणनीतिक लाभ सुनिश्चित हुआ। साथ ही नरेंद्र मोदी के नाम पर राष्ट्रीय मुद्दों से स्थानीय चुनाव को अलग रखा जा सका।

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ममता एक अलग किस्म की रणनीति के साथ सामने आयी हैं। वह नरेंद्र मोदी को लेकर तटस्थ या दूरस्थ नहीं है वह समीपस्थ है। वह नरेंद्र मोदी को लेकर उदासीन, वक्तव्यहीन न होकर उनकी प्रशंसक दिख रही हैं। वह नरेंद्र मोदीको क्लीन चिट दे रही हैं। नकारात्मक सियासत में नरेंद्र मोदी का हाथ नहीं हो सकता- इस विश्वास को जताने के पीछे दरअसल कारण रणनीति है। यह केजरीवाल से भी दो कदम आगे चलने की रणनीति है। यह अनायास दिया गया बयान नहीं है।

बंगाल में सत्ता विरोधी हिन्दू हैं ममता के लिए बेचैनी

पश्चिम बंगाल की सियासत में धार्मिक ध्रुवीकरण का महत्व बढ़ा है। इसका मुकाबला ममता बनर्जी ने बंगाली अस्मिता की आवाज़ बुलन्द कर किया था। नरेंद्र मोदी से टकराने की कोई आवश्यकता बंगाली अस्मिता के लिए जरूरी नहीं है। लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस विरोधी हिन्दू वोट बीजेपी को ना मिले, इसके लिए ममता बनर्जी ने इसे आवश्यक समझा है कि नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले न किए जाएं। ऐसा करके ही उन वोटरों को कम से कम घर बैठाया जा सकता है अन्यथा वे ममता के खिलाफ खटिया लेकर मैदान में खड़े उतर सकते हैं।

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ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के दोबारा उठ खड़े होने का डर भी सता रहा है। बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 18 सीटें मिलने की वजह यही थी कि वामपंथियों ने भी ममता के खिलाफ बीजेपी को वोट कर दिया था। नरेंद्र मोदी की तारीफ करने से वामपंथी वोटर भ्रमित होंगे। सीपीएम को अपना कोर वोटर वापस मिले, तो इससे टीएमसी को फायदा होगा।

राष्ट्रीय सियासत में ममता बनर्जी के रुख से नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी को फायदा होगा। मगर, इसकी चिंता ममता बनर्जी क्यों करें? वह देश में प्रतिपक्ष खड़ा करने की कोशिशों पर विराम लगा चुकी हैं। देश का विपक्ष भी ममता बनर्जी के लिए पलक पांवड़े बिछाए बैठा हो, ऐसा नहीं है। ऐसे में स्थानीय सियासत को अहमियत देना उनकी जरूरत और मजबूरी दोनों बन गयी है।

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प्रेम कुमार
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