भारतीय लोकतंत्र में परिसीमन की गुत्थी लंबे समय से उलझी हुई है। यह संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों तथा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का जनसंख्या के अनुरूप पुनर्निर्धारण है। 1971 की जनगणना के आधार पर सीटें फ़्रीज़ होने के बाद से उत्तर भारत में तेज़ जनसंख्या वृद्धि और दक्षिण के राज्यों में परिवार नियोजन की सफलता के कारण प्रतिनिधित्व में असंतुलन बढ़ गया। केंद्र सरकार ने 16 अप्रैल को तीन विधेयक—संविधान (131वीं संशोधन) विधेयक, संघ क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक—लोकसभा में पेश किए। इनका मकसद लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करना, 2011 जनगणना के आधार पर परिसीमन और महिला आरक्षण को 2029 चुनाव से पहले लागू करना था। लेकिन 17 अप्रैल को संविधान संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत (352 वोट) हासिल नहीं कर सका। विधायक के पक्ष में 298 और 230 विरोध में पड़े। सरकार ने परिसीमन विधेयक वापस ले लिया। इस प्रकार गुत्थी अभी सुलझी नहीं, बल्कि राजनीतिक विवाद और गहरा गया है।

क्यों ज़रूरी है परिसीमन?

परिसीमन लोकतंत्र की मूल भावना 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' को मजबूत करता है। संविधान के अनुच्छेद 81 में स्पष्ट है कि प्रत्येक राज्य को लोकसभा सीटें उसकी जनसंख्या के अनुपात में मिलनी चाहिए, ताकि हर नागरिक का प्रतिनिधित्व समान हो। 1971 की जनगणना पर आधारित 543 सीटें आज भी वही हैं, जबकि भारत की जनसंख्या 1971 के 54.8 करोड़ से 2011 में 121 करोड़ हो चुकी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि तेज रही, जबकि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक ने परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन किया। परिणामस्वरूप, आज औसत लोकसभा क्षेत्र में 18-20 लाख मतदाता हैं, लेकिन उत्तर में कुछ क्षेत्रों में 25 लाख से ज्यादा, जबकि दक्षिण में कम। परिसीमन न सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाता है, बल्कि क्षेत्रों की सीमाएं भी जनसंख्या के हिसाब से तय करता है। यह संघीय संतुलन के लिए भी ज़रूरी है, क्योंकि लोकसभा में राज्यों की ताकत केंद्रीय नीतियों, वित्त आयोग के फंड बंटवारे और संसदीय बहस को प्रभावित करती है। बिना परिसीमन के लोकतंत्र अधूरा रह जाता है। इसके अलावा, 2023 के महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए भी परिसीमन अनिवार्य है, क्योंकि नए क्षेत्रों में 33% महिला आरक्षण रोटेशन से लागू होगा। सरकार का तर्क है कि इससे लोकतंत्र अधिक समावेशी बनेगा।

कैसे तय होता है राज्यों की लोकसभा सीटों का कोटा?

लोकसभा सीटों का कोटा संविधान के अनुच्छेद 81 पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि प्रत्येक राज्य को सीटें उसकी जनसंख्या के अनुपात में आवंटित होंगी, ताकि पूरे देश में प्रति सीट औसत जनसंख्या समान रहे। 1976 में 42वें संशोधन और 2001 में 84वें संशोधन ने इसे 1971 जनगणना पर फ़्रीज़ कर दिया, जो 2026 तक प्रभावी था।
परिसीमन आयोग कुल जनसंख्या को कुल सीटों से विभाजित कर औसत निर्वाचन क्षेत्र का आकार तय करता है। फिर प्रत्येक राज्य की जनसंख्या को इस औसत से विभाजित कर सीटें तय की जाती हैं। 1971 में औसत प्रति सीट जनसंख्या करीब 10 लाख थी। 2011 जनगणना पर अगर शुद्ध अनुपात लागू होता, तो उत्तर भारत को भारी फायदा और दक्षिण को नुकसान होता। प्रस्तावित विधेयकों में संसद को किसी भी जनगणना (2011 सहित) को आधार बनाने का अधिकार देने का प्रावधान था, जिससे लचीलापन आता। गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया था कि सभी राज्यों की सीटें क़रीब 50% बढ़ाई जाएंगी, ताकि अनुपात बरकरार रहे। लेकिन विधेयक पास नहीं होने से यह कोटा अभी 1971 फॉर्मूले पर अटका रहा।

पहले कब-कब बढ़ीं लोकसभा की सीटें?

स्वतंत्र भारत में परिसीमन चार बार हुआ है। पहला परिसीमन आयोग 1952 में 1951 जनगणना पर आधारित था, जिसमें सीटें 489 से 494 हो गईं। दूसरा 1963 में 1961 जनगणना पर, सीटें 522 हो गईं। तीसरा 1973 में 1971 जनगणना पर, सीटें 543 (सिक्किम जोड़ने के बाद) हो गईं। चौथा 2002 में हुआ, लेकिन उसने केवल सीमाएं बदलीं, कुल सीटें या राज्यों का कोटा नहीं बदला।

1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने 42वें संशोधन से सीटें फ्रीज कर दीं, ताकि परिवार नियोजन वाले राज्यों को सजा न मिले। 2001 में 84वें संशोधन से फ्रीज 2026 तक बढ़ाया गया। इन 50 वर्षों में जनसंख्या दोगुनी हो गई, लेकिन प्रतिनिधित्व 1971 के पैटर्न पर अटका रहा। इससे उत्तर-दक्षिण असंतुलन गहराया।

अप्रैल 2026 के विधेयकों का मकसद यही गुत्थी खोलना था, लेकिन राजनीतिक विरोध के कारण प्रयास विफल रहा।

2011 की जनसंख्या के आधार पर कितनी सीटें बढ़ेंगी?

2011 जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 121 करोड़ थी। अगर शुद्ध जनसंख्या अनुपात पर सीटें बांटी जाएं (बिना अतिरिक्त वृद्धि के), तो उत्तर भारत को भारी फायदा होता। उदाहरणस्वरूप, उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 130-140 के आसपास, बिहार 40 से 70+, मध्य प्रदेश 29 से 45, राजस्थान 25 से 45-50 हो सकती थीं। दक्षिण के राज्यों (129 सीटें) का हिस्सा कुल में 24% से घटकर 20% के नीचे आ जाता। लेकिन सरकार ने 50% समान वृद्धि का फॉर्मूला सुझाया था, जिसमें सभी राज्यों की सीटें करीब 50% बढ़तीं और अनुपात बरकरार रहता। दक्षिणी राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जातीं (शेयर 23.8% से 23.9%)। तमिलनाडु 39 से 59, केरल 20 से 30, कर्नाटक 28 से 42, आंध्र प्रदेश 25 से 37, महाराष्ट्र 48 से 72, उत्तर प्रदेश 80 से 120 के आसपास। अमित शाह ने लोकसभा में कहा कि कोई राज्य नुक़सान में नहीं जाएगा। PRS इंडिया और अन्य विश्लेषणों के अनुसार, अगर कुल सीटें 850 रखी जातीं, तो यह सर्वमान्य समाधान होता। लेकिन इस पर सरकार विपक्ष को विश्वास में नहीं ले पाई। विधेयक पास न होने से ये आंकड़े अभी सैद्धांतिक ही रह गए। शुद्ध 2011 आधार पर दक्षिण की चिंता जायज़ थी, जबकि सरकार का फॉर्मूला संतुलन बनाता।

2029 के लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन संभव है?

16 अप्रैल 2026 के विधेयकों के अनुसार हां, संभव था। वर्तमान कानून में 2026 के बाद पहली जनगणना (2027) के आधार पर परिसीमन होता, जो 2029 चुनाव से पहले मुश्किल था। लेकिन संविधान संशोधन से 2011 जनगणना को आधार बनाने का रास्ता खुलता। परिसीमन आयोग (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में) 1-2 साल में काम पूरा कर सकता था। सरकार का उद्देश्य महिला आरक्षण को 2029 से लागू करना था।
लेकिन विधेयक के हारने और वापस लेने के बाद यह संभावना फिलहाल टल गई। अब 2026 के बाद की जनगणना (संभवतः 2027) पर परिसीमन होगा, जो 2034 चुनाव तक खिंच सकता है। दक्षिणी राज्यों ने विरोध किया कि 2011 आधार से उनका प्रतिनिधित्व कम होगा। विपक्ष ने इसे 'उत्तर को पुरस्कार' बताया। इसलिए 2029 चुनाव अभी पुराने मानचित्र पर ही होने की संभावना है।

क्या संविधान संशोधन के बिना परिसीमन संभव है?

संविधान में संशोधन के बिना परिसीमन संभव नहीं है। 84वें संशोधन ने सीटों के आवंटन को 1971 जनगणना पर फ़्रीज़ कर दिया था, जो अनुच्छेद 81 और 82 में संवैधानिक प्रावधान है। 2026 के बाद परिसीमन तो हो सकता है, लेकिन वह 2027 जनगणना पर आधारित होगा और लोकसभा की कुल सीटें 550 की संवैधानिक सीमा में रहेंगी। 2011 जनगणना का उपयोग, सीटों की संख्या 850 तक बढ़ाना और महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने के लिए संविधान संशोधन ज़रूरी था।
परिसीमन विधेयक अकेला संविधान को ओवरराइड नहीं कर सकता। बिना संशोधन के आयोग केवल मौजूदा फ्रीज के अनुसार काम कर सकता था। दक्षिणी दलों (DMK, कांग्रेस आदि) ने यही तर्क दिया कि बिना संशोधन के परिसीमन से उनका नुकसान होगा। सरकार ने संशोधन से लचीलापन लाने की कोशिश की, लेकिन बहुमत न मिलने से प्रयास विफल रहा। भविष्य में नया संशोधन या सहमति से ही गुत्थी सुलझ सकती है।

राजनीतिक चुनौतियां, दक्षिण की चिंताएं और समाधान का रास्ता

परिसीमन की सबसे बड़ी चुनौती उत्तर-दक्षिण विभाजन है। दक्षिणी नेता चिंतित हैं कि GDP में 30% योगदान और बेहतर परिवार नियोजन के बावजूद उनकी संसदीय ताकत कम न हो। वे कहते हैं कि केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि विकास, कर योगदान और नियोजन को भी आधार बनाया जाए। विपक्ष ने इसे 'राजनीतिक डीमोनेटाइजेशन' बताया। अमित शाह ने 'झूठी कहानी' करार देते हुए आश्वासन दिया कि दक्षिण को 66 अतिरिक्त सीटें मिलेंगी। लेकिन विधेयक की हार से स्पष्ट है कि बिना व्यापक संवाद के समाधान मुश्किल है। समाधान का रास्ता है—संघीय भावना, पारदर्शी फॉर्मूला (50% समान वृद्धि) और दक्षिण को अतिरिक्त आर्थिक पैकेज या राज्य परिषद में मजबूती। 2031 जनगणना के बाद फिर समीक्षा हो सकती है। महिला आरक्षण अलग से लागू करने पर भी विचार हो सकता है।
केंद्र सरकार को इस गुत्थी को सुलझने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। परिसीमन की गुत्थी सुलझने की राह पर थी, लेकिन राजनीतिक मतभेद के कारण विधेयक गिर गए और वापस ले लिए गए। इससे लोकतंत्र की एकता पर सवाल उठा है। अगर 50% वृद्धि वाला संतुलित फॉर्मूला अपनाया जाता, तो सभी राज्य फायदे में होते। अब केंद्र और विपक्ष को संवाद से नया रास्ता निकालना होगा, ताकि 2029 या उसके बाद चुनाव नए, समान और समावेशी मानचित्र पर हो। भारत की विविधता में एकता का यही सार है। परिसीमन न सिर्फ सीटें बढ़ाएगा, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करेगा।