संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर से शुरू होने जा रहा है। यह सत्र सिर्फ़ 18 दिन चलेगा। यानी समय कम है और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने एसआईआर, चुनाव आयोग की भूमिका लेकर बेरोज़गारी तक के मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी की है। साथ ही अंतरराष्ट्री मोर्चों पर भी भारत को हाल में हुई किरकिरी भी उसके एजेंडे में हैं। लेकिन इन तमाम मुद्दों का जवाब मोदी सरकार अपने उसी अंदाज़ में देने की तैयारी कर रही है जैसे कि बीजेपी नेता चुनाव के दौरान अपनाते हैं। यानी अहम मुद्दों को दरकिनार करके भावनात्मक मुद्दों की आग सुलगाई जाये।

कई अख़बारों में संसदीय कार्यमंत्री किरन रिजिजू के हवाले से कहा गया है कि संसद में एसआईआर पर बहस नहीं हो सकती क्योंकि यह मामला अदालत के विचाराधीन है। चुनाव आयोग पर भी बहस नहीं हो सकती क्योंकि वह स्वायत्त संवैधानिक संस्था है। यानी कई राज्यों में बीएलओ का आत्महत्या करना, एसआईआर के ज़रिये लोगों की नागरिकता तय करके संवैधानिक सीमा का अतिक्रमण कर रहे आयोग पर संसद में चर्चा नहीं हो सकती। लेकिन ख़बरों में सरकारी सूत्रों के हवाले से यह भी बताया गया है कि सरकार वंदे मातरम पर बहस कराएगी।

7 नवंबर को दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में वंदे मातरम के डेढ़ सौ साल होने पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी ने इस मौक़े पर स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी करके साल भर तक चलने वाले स्मरणोत्सव का उद्घाटन किया था। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में आरोप लगाया था कि “1937 में नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने गीत के महत्वपूर्ण पदों को जानबूझकर हटा दिया था, जिससे गीत की 'आत्मा' को अलग कर दिया गया। यह कृत्य विभाजनकारी था और देश के विभाजन के बीज बोने जैसा था।“
लेकिन लगता है कि मोदी जी का मन भरा नहीं। अब इसी बहाने संसद के शीतकालीन सत्र में नेहरू को कोसने का मौक़ा ढूँढा जा रहा है। यह तरीक़ा है विपक्ष के उन तमाम सवालों से बचने का जो सरकार को असहज कर सकते हैं।

वैसे, वंदे मातरम की सच्चाई वह नहीं है जो मोदी जी देश को बता रहे हैं। नेहरू ही नहीं, सुभाषचंद्र बोस से लेकर टैगोर तक वंदे मातरम के पहले दो बंद ही गाये जाने के पक्ष में थे और संविधान सभा ने इसी पर मुहर लगाई थी।

24 जनवरी 1950 यानी संविधान लागू होने के दो दिन पहले संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में डा.राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि भारत का राष्ट्रगान टैगोर रचित जनगणमन होगा और वंदे मातरम के स्वीकृत दो अंतरों को भी राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता दी जाएगी। इस पर कोई बहस नहीं हुई। यह संविधान सभा के अध्यक्ष का आदेश था जिसे सबने स्वीकार किया। मोदी जी के प्रात:स्मरणीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी वहाँ मौजूद थे। उन्होंने भी विरोध नहीं किया। यह अलग बात है कि मुस्लिम लीग के साथ बंगाल में बनी सरकार के मंत्री की हैसियत से वंदे मातरम का नारा लगाने वालों का दमन करने में वे काफ़ी आगे थे। मुखर्जी ही क्यों मोदी जी जिस आरएसएस की शाखा से निकले हैं, उसने भी आज़ादी के पहले कभी वंदे मातरम का नारा लगाकर अंग्रेज़ों से आज़ादी की माँग नहीं उठायी। लेकिन आज आरोप उन नेहरू पर है जिन्होंने लगभग दस साल आज़ादी की लड़ाई में जेल में काटे। क़ुर्बानियों की मिसाल क़ायम की।

वंदे मातरम के रचनाकार थे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय। वे ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा में थे। उन्होंने 1858 में डिप्टी मजिस्ट्रेट और डिप्टी कलेक्टर के पद पर नौकरी शुरू की थी और काफ़ी आगे तक गये थे।

दो अंतरे राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता प्राप्त

शायद लोगों को यह जानकर हैरानी हो कि इस गीत के जो दो अंतरे राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता प्राप्त हैं, वही मूल गीत था। बंकिम ने इसकी रचना 1872 से 1875 के बीच एक स्वतंत्र गीत के रूप में की थी। बाद में उन्होंने एक उपन्यास लिखा - आनंद-मठ। यह उपन्यास बंकिम द्वारा प्रकाशित बंग-दर्शन पत्रिका में दिसंबर 1882 से जुलाई 1883 के बीच प्रकाशित हुआ। इसके तीसरे अध्याय में इस गीत को शामिल किया गया चार और अंतरों के साथ। उपन्यास में यह गीत देवी दुर्गा की आराधना का गीत बन चुका था। यह उपन्यास अठारहवीं सदी के मध्य बंगाल के संन्यासी विद्रोह पर आधारित था जिसमें निशाने पर बंगाल का नवाबी शासन था। उपन्यास पर मुस्लिम विरोधी भावनाएँ भड़काने के आरोप लगे और अंग्रेज़ों को भला इसमें क्या परेशानी हो सकती थी।

बहरहाल वंदे मातरम- ये दो शब्द राष्ट्रीय भावना प्रकट करने का माध्यम बने गये और इसे कांग्रेस ने तुरंत स्वीकार कर लिया। पहली बार 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान यह गीत गाया गया। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे रहमतुल्लाह सयानी। इसे खुद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। उन्होंने ही राग देश में इसका संगीत तैयार किया था। इस गीत को और लोकप्रियता मिली 1905 के आसपास जब बंगाल के विभाजन के ख़िलाफ़ स्वदेशी आंदोलन फूट पड़ा।

तो 1937 में हुआ क्या था जिसका ज़िक्र मोदी जी कर रहे हैं? दरअसल, इस साल अंतरिम सरकार बनी थी और मुस्लिम लीग ने विधानमंडलों में वंदेमातरम के गाने का विरोध यह कहकर किया था कि यह देवी काली की आराधना है और मुसलमानों के लिए मूर्तिपूजा वर्जित है। ज़ाहिर है, मुस्लिम लीग का मक़सद इस मुद्दे पर एक सांप्रदायिक विवाद पैदा करना था। कांग्रेस पर आरोप लगाना था कि वह मुसलमानों को मूर्तिपूजा के लिए मजबूर कर रही है। ऐसे में कांग्रेस की 'सांग कमेटी’ ने गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर से सलाह माँगी। इस कमेटी में सुभाषचंद्र बोस, आचार्य नरेंद्र देव और मौलाना आज़ाद भी थे।
जवाब में टैगोर ने पं. नेहरू को लिखा था-

“ मैं इस बात को मुक्तभाव से स्वीकार करता हूँ कि बंकिम की पूरी वंदे मातरम कविता अगर अपने संदर्भ के साथ पढ़ी जाए तो इसकी व्याख्या इस तरह से हो सकती है कि मुसलमानों की भावना को चोट पहुँचे।"

कांग्रेस ने लंबे विचार-विमर्श के बाद इस गीत के पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय गीत के रूप में 1937 के फ़ैजपुर अधिवेशन में मान्यता दी और बाद में उसके हर अधिवेशन की शुरुआत इसी गीत से होती रही। यह परंपरा आज भी जारी है।

यानी जिस विवाद को 88 साल पहले हल कर लिया गया था और जिस पर संविधान सभा ने भी मुहर लगा दी थी, पीएम मोदी फिर से उसी पर बहस कराना चाहते हैं। क्यों चाहते हैं, ऐसा। इसलिए कि मीडिया की बनायी धारणा के उलट भारत इस समय ऐसी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं से घिरा हुआ है जो बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नाकामी का खुला बयान है। सबसे पहले हाल की कुछ घटनाएँ जानिए जिन पर संसद के शीतकालीन सत्र पर बहस हुई तो सरकार फँसेगी।

विदेश नीति का हाल

चीन ने दक्षिणी तिब्बत बताते हुए अरुणाचल प्रदेश पर फिर से अपना दावा किया है। नेपाल ने सौ का नया नोट जारी किया है जिसमें भारतीय क़ब्ज़े वाले कालापानी, लिपुलेख, लिंपीयाधुरा को नेपाल का दिखाया गया है। यानी चीन के साथ सीमा पर तनाव का नया दौर शुरू हो रहा है और नेपाल जैसा छोटा देश, जो सांस्कृतिक रूप से हमेशा भारत के साथ जुड़ा रहा, वह भी तेवर दिखा रहा है। यह भारत सरकार की बड़ी कूटनीतिक असफलता है।

लेकिन एक ख़बर ऐसी आयी है जो भारत की अंतरराष्ट्रीय साख गिराने वाली है, शर्मिंदा करती है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की आर्थिक आंकड़ों (खासकर GDP डेटा) पर सवाल उठाए हैं और इसे "C" ग्रेड दिया है – जो चार ग्रेडों (A, B, C, D) में से दूसरा सबसे निचला है। यह आंकड़ों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर आधारित आकलन है। 27 नवंबर 2025 को जारी अपनी Article IV Consultation रिपोर्ट में IMF ने भारत के नेशनल अकाउंट्स (GDP डेटा) को बी से घटाकर "C" रेटिंग दी। इसका मतलब है कि IMF को भारत सरकार से मिलने वाले आँकड़े विश्वसनीय नहीं लग रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था की निगरानी में उसे परेशानी हो रही है। भारत का GDP कैलकुलेशन अभी भी 2011-12 को बेस ईयर मानकर किया जा रहा है जबकि IMF की ओर से नया बेस ईयर (जैसे 2022-23) अपनाने की सलाह दी गई। वैसे, IMF ने भारत की ग्रोथ को 6.6% (2025-26) अनुमानित किया, लेकिन अगर आंकड़े कमजोर हों, तो नीतियाँ (जैसे बजट, निवेश) गलत हो सकती हैं। IMF की रेटिंग का असर भारत में होने वाले निवेश पर पड़ सकता है।

शीतकालीन सत्र के मुद्दे

संसद के शीतकालनी सत्र में यह मुद्दा बना तो सरकार के तमाम दूसरे दावे भी संदिग्ध हो उठेंगे इसलिए वंदे मातरम जैसा विवाद संसद के पटल पर लाने की कोशिश हो रही है। वैसे मोदी जी ग्यारह साल से सत्ता में हैं। एक दशक से ज़्यादा। इतने दिन काफ़ी होते हैं किसी देश को बेहतरी की राह पर ले जाने के लिए। लेकिन आँकड़े कुछ और कहानी कहते हैं।
  • गरीबी: ग्लोबल मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स 2024 में भारत में 23.4 करोड़ लोग गरीब। दुनिया में सबसे ज्यादा। HDI 2025 में 132वां स्थान।
  • भुखमरी: ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में 111वां (123 देशों में), स्कोर 27.3 – "गंभीर" स्तर। 13.7% बच्चे कुपोषित।
  • प्रति व्यक्ति आय: वर्ल्ड बैंक के अनुसार, 2025 में करीब $2,900 – निचले-मध्यम आय वर्ग में। चीन ($12,000+) से काफ़ी पीछे।
  • प्रेस की आजादी: वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2025 में 151वां (180 में), स्कोर 31.28। मीडिया पर भारी।
  • लोकतंत्र: डेमोक्रेसी इंडेक्स 2025 में 41वां, "flawed Democracy.”
ये वो मोर्चे हैं जिस पर किसी देश को सबसे ज़्यादा चिंता होनी चाहिए। ये आँकड़े बताते हैं कि भारत मोदी काल में लगातार पीछे गया है। जो मीडिया इन सवालों पर जनता को जागरूक करता था, उसकी तो सबसे बुरी हालत है। मुख्यधारा के इक्का-दुक्का संस्थान जो सच बोलने का साहस दिखाते थे, उनका मालिकाना बदल दिया गया। एनडीटीवी के संचालकों पर दबाव ऐसा दबाव पड़ा कि वे चैनल अडानी को बेचने पर मजबूर हुए। तमाम पत्रकार जो सवाल उठाते थे, सब के सब नौकरी के बाहर कर दिये गये।

संसद में अगर देश के मूल सवालों पर बहस नहीं होगी तो कहाँ होगी? क्या मान लेना चाहिए कि भारत अब इलेक्टोरल आटोक्रेसी से क्लोज़्ड डेमोक्रेसी की ओर बढ़ रहा है जिसकी आशंका V-Dem की 2024 रिपोर्ट में जताई गयी थी। यानी भारतीय लोकतंत्र तेजी से तानाशाही की ओर सरक रहा है।