मोदीजी ने लालक़िले से ऐसा कुछ नहीं कहा जो वे पहले कई बार अलग-अलग जगहों और अवसरों पर नहीं कह चुके हैं। मानकर चलना चाहिए कि वे आगे भी यही सब बोलने वाले हैं। सत्ता का रिपोर्ट कार्ड उन्हें रट गया है। वे 75 मिनट तक बोले। पिछली बार से 28 मिनट कम जबकि 28 मिनट ज़्यादा भी बोल सकते थे। बोलने को बहुत सारा बारूद था पर नहीं बोले। कोई कारण रहा होगा।

पिछली बार के मुक़ाबले पानी भी अधिक मर्तबा पीया। रूमाल से चेहरा भी ज़्यादा बार पोंछा। बोलने में एक-दो बार हड़बड़ाए भी। आँकड़ों में भी कुछ चूक हुई। पर कहीं से लगने नहीं दिया कि अब थक गए हैं। परेशान हैं। या कोई डर मन में बैठता जा रहा है।
ताज़ा ख़बरें
विशिष्टजनों के बीच बैठे राजनाथ सिंह, अमित शाह, गडकरी, आदि के चेहरे लगभग वैसे ही निस्तेज थे जैसे संसद सत्र के आख़िरी दिन राष्ट्रीय गान के समय थे। माना जा सकता है कि पार्टी और घटक दलों के उन नेताओं, जिन्हें फिर से मतदाताओं का सामना करना है, ने राहत की साँस ली होगी कि पीएम ने जंतर मंतर के घटनाक्रम को लेकर कुछ नहीं कहा। नड्डा और जितेन्द्र सिंह सहित उन मंत्रियों के बचाव में भी कुछ नहीं कहा जो बोल चुके थे कि न तो कोई गोली चली है और न चलाने के कोई ऑर्डर दिये गए।

विशिष्टजनों के बीच और सभी मंत्री थे पर नड्डा नहीं दिखे। वे शायद अस्वस्थ हैं। राहुल और खड़गे जी नहीं पहुँचेंगे, पहले से आशंका थी। दोनों नेता यह सुनने से बच गए कि ‘माओवादी सोच के लोग वर्षों तक सत्ता में रहे’। या विपक्ष सहयोग करता तो (परिसीमन विधेयक के ज़रिए) देश की महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण प्राप्त हो जाता!

जंतर-मंतर के प्रदर्शन में भाग लेने वाले बच्चे और उनके नेता अगर हिम्मत जुटाकर मोदीजी का भाषण सुन रहे होंगे तो उन्होंने सोचा होगा कि पीएम का ‘मौक़े की तलाश में दिमाग़ी नक्सली’ वाला इशारा क्या उन्हीं की ओर था?

क्या मोदीजी की नज़रों में वे ही लोग समाज को ग़लत दिशा में ले जा रहे हैं? बच्चों ने शायद यह भी सोचा हो कि मोहन भागवत ने अपने मुंबई संवाद में ऐसा कुछ क्यों नहीं कहा जैसा मोदीजी कह रहे हैं? क्या दोनों नेता अलग-अलग हैं?

पीएम ने खुद ही दिया रिपोर्ट कार्ड

मोदीजी के उद्बोधन का जो सबसे उल्लेखनीय पक्ष है उस पर शायद उनका भाषण लिखने वालों ने भी गौर नहीं किया होगा! प्रधानमंत्री सरकार की उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड भी पढ़ रहे थे और साथ-साथ अपनी विफलताओं का बखान भी करते जा रहे थे।

मोदीजी ही देश को जानकारी दे रहे थे कि (बारह सालों में हुई इतनी तरक़्क़ी के बावजूद?) ‘फार्च्यून ग्लोबल 500’ कंपनियों की लिस्ट की टॉप पाँच में भारत की एक भी कंपनी नहीं है।

मोदीजी ही बता रहे थे कि बैंकिंग सेक्टर में दुनिया के पाँच टॉप बैंकों में भारत का एक भी नहीं है।

ऐसी ही स्थिति फार्मेसी के क्षेत्र में, लॉ फ़र्म्स में, अकाउंटिंग में और टेक कंपनियों के क्षेत्र में है। यह शिकायत मोदी स्वयं कर रहे थे। (यूनिवर्सिटीज़ सहित और भी कई क्षेत्र उनसे छूट गए होंगे)
इतना ही नहीं! सत्ता में बारह साल गुज़ार लेने, अटलजी सहित अपने पूर्ववर्ती सभी शासकों के किए को कचरे के ढेर में डाल देने के बाद भी मोदीजी ने ही देश को बताया कि:

मैन्यूफ़ैक्चरिंग के क्षेत्र में अभी क्या-क्या करना पड़ेगा? कृषि के क्षेत्र में क्या करने की ज़रूरत है? टेक्नोलॉजी में क्या होना चाहिये? ‘गति शक्ति’ बनने के लिए क्या करना पड़ेगा? ‘रक्षा शक्ति’ बनने के लिए क्या करना चाहिये? ग्रीन इकोनॉमी और सॉफ्ट पॉवर बनने के लिये क्या-क्या किया जाना चाहिए?

प्रधानमंत्री से कौन सवाल करेगा कि इतने सारे काम करना अगर अभी भी बाक़ी हैं तो आपकी हुकूमत ने पिछले बारह सालों में आख़िर किया क्या है? देश के 84 करोड़ लोगों को मुफ़्त का अनाज बाँटने के अलावा क्या और कोई काम है जो किया गया है?