पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव केवल यह नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार चुनाव जीत रही है। उससे भी बड़ा बदलाव यह है कि भाजपा और उसके वैचारिक आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने देश की राजनीतिक बहस की दिशा तय करने की क्षमता हासिल कर ली है। आज राजनीति में कौन से मुद्दे प्रमुख होंगे, किस भाषा में बहस होगी और जनता किन सवालों को महत्वपूर्ण मानेगी, इस पर उनका गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
इसके मुकाबले विपक्ष की राजनीति बिखरी हुई, रक्षात्मक और कई बार विरोधाभासों से भरी नजर आती है। इसी कमजोरी को दूर करने के लिए INDIA गठबंधन बनाया गया था। उद्देश्य था कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी दल मिलकर लड़ें। लेकिन शुरू से ही इस गठबंधन के भीतर एक बड़ी समस्या मौजूद रही है—कई क्षेत्रीय दल भाजपा से जितना सावधान रहते हैं, उतना ही कांग्रेस से भी। आज यह विरोधाभास और स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

बड़े गठबंधन की सीमाएँ 

INDIA गठबंधन में अनेक प्रकार के दल शामिल हैं। कुछ सामाजिक न्याय की राजनीति करते हैं, कुछ क्षेत्रीय पहचान की, कुछ धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं और कुछ केवल भाजपा विरोध के आधार पर साथ आए हैं। यह व्यवस्था चुनावी दृष्टि से उपयोगी हो सकती है, लेकिन वैचारिक दृष्टि से बहुत मजबूत नहीं है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी हैं। कई राज्यों में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे के खिलाफ लड़ती हैं। वामपंथी दलों और कांग्रेस का भी संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। अनेक क्षेत्रीय दलों को यह डर भी रहता है कि यदि कांग्रेस मजबूत हुई तो भविष्य में वही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगी। इसलिए INDIA गठबंधन कई बार एक साझा राजनीतिक आंदोलन की बजाय अस्थायी समझौते जैसा दिखाई देता है। 
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सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी का विरोध करने के अलावा यह गठबंधन किस विचार के लिए खड़ा है? जनता केवल विरोध के आधार पर लंबे समय तक किसी गठबंधन का समर्थन नहीं करती। जनता को यह भी जानना होता है कि विकल्प क्या है।

नेतृत्व का प्रश्न 

विपक्ष के सामने नेतृत्व का प्रश्न लंबे समय से बना हुआ है। नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन बाद में अलग रास्ता चुन लिया। ममता बनर्जी अपने राज्य में बेहद प्रभावशाली नेता हैं। अरविंद केजरीवाल ने एक आंदोलन को राजनीतिक दल में बदला। अखिलेश यादव, एम.के. स्टालिन और अन्य क्षेत्रीय नेताओं का भी अपने-अपने राज्यों में मजबूत आधार है। लेकिन इन सभी नेताओं में एक समान सीमा है—इनमें से कोई भी पूरे देश में फैला हुआ राजनीतिक संगठन नहीं चलाता। 
आज भी कांग्रेस ही एकमात्र विपक्षी दल है जिसकी मौजूदगी देश के लगभग हर हिस्से में है। उसकी ताकत कम हुई है, संगठन कमजोर हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसकी उपस्थिति बनी हुई है। इसी कारण राहुल गांधी किसी भी राष्ट्रीय विपक्षी विकल्प की चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं। एक समय था जब उन्हें गंभीर राजनीतिक चुनौती नहीं माना जाता था। लेकिन भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बाद उनकी राजनीतिक छवि में बदलाव आया है। उन्होंने बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, जातिगत जनगणना, सामाजिक न्याय और संवैधानिक संस्थाओं जैसे मुद्दों को लगातार उठाया है। कम से कम वैचारिक स्तर पर उनके पास एक स्पष्ट दिशा दिखाई देती है।
छोटा गठबंधन, लेकिन स्पष्ट विचार संभव है कि विपक्ष का भविष्य सभी दलों को एक छत के नीचे लाने में नहीं, बल्कि समान विचार वाले दलों को एक मंच पर लाने में हो। कल्पना कीजिए कि कांग्रेस के नेतृत्व में एक ऐसा गठबंधन बने जिसमें झारखंड मुक्ति मोर्चा, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वामपंथी दल और कुछ अन्य सामाजिक न्याय तथा धर्मनिरपेक्ष राजनीति में विश्वास रखने वाले दल शामिल हों। इस गठबंधन का उद्देश्य केवल सीटें जोड़ना नहीं होगा, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि प्रस्तुत करना होगा। 
इसका साझा कार्यक्रम निम्नलिखित मुद्दों पर आधारित हो सकता है— 
• संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा 
• सामाजिक न्याय का विस्तार 
• जातिगत जनगणना 
• ओबीसी, दलित और आदिवासी प्रतिनिधित्व बढ़ाना 
• रोजगार आधारित आर्थिक नीतियाँ 
• अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और समान नागरिक अधिकार 
• संघीय ढांचे को मजबूत करना 
• सामाजिक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को कम करना 
ऐसा गठबंधन शायद वर्तमान INDIA गठबंधन से छोटा हो, लेकिन उसका संदेश अधिक स्पष्ट होगा। वैचारिक स्पष्टता का मतलब राजनीतिक अकेलापन नहीं यह मान लेना गलत होगा कि यदि कोई गठबंधन स्पष्ट विचारधारा के आधार पर बने तो उसे हर चुनाव अकेले लड़ना चाहिए। भारतीय राजनीति का अनुभव इसके विपरीत है। भाजपा स्वयं कई राज्यों में ऐसी पार्टियों के साथ गठबंधन करती रही है जो उसकी पूरी विचारधारा से सहमत नहीं होतीं। चुनावी राजनीति में स्थानीय परिस्थितियाँ, सामाजिक समीकरण और व्यावहारिकता भी महत्वपूर्ण होती है। 

इसी प्रकार सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित कोई विपक्षी गठबंधन अपनी वैचारिक पहचान बनाए रखते हुए राज्यवार चुनावी समझौते कर सकता है। उत्तर प्रदेश में सीटों का बँटवारा समाजवादी पार्टी जैसे दलों के साथ किया जा सकता है। तमिलनाडु में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सहयोग हो सकता है। बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में भी चुनावी समझौते संभव हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक विचारधारा और चुनावी रणनीति को अलग-अलग समझा जाए। विचारधारा दिशा देती है। चुनावी गठबंधन संख्या जुटाते हैं। दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है। सामाजिक न्याय का अवसर हाल के वर्षों में सामाजिक न्याय का प्रश्न फिर से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया है। जातिगत जनगणना की मांग ने इस बहस को और तेज किया है। भारत जैसे विविध और असमान समाज में केवल सांस्कृतिक पहचान या राष्ट्रवाद के आधार पर राजनीति नहीं चल सकती। प्रतिनिधित्व, अवसरों की समानता और सामाजिक गतिशीलता के प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
विपक्ष के पास इन मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का अवसर है। लेकिन इसके लिए उसे स्पष्ट और साहसपूर्ण रुख अपनाना होगा। विपक्ष के सामने असली चुनौती भाजपा की सबसे बड़ी ताकत केवल उसका संगठन नहीं है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी वैचारिक स्पष्टता है। उसके समर्थकों को पता है कि भाजपा किन मुद्दों के लिए खड़ी है।
विपक्ष के सामने चुनौती है कि वह भी एक वैकल्पिक राष्ट्रीय कथा प्रस्तुत करे—ऐसी कथा जिसमें विकास और सामाजिक न्याय साथ-साथ चल सकें, राष्ट्रवाद और संवैधानिक मूल्यों में टकराव न हो, और लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने तक सीमित न रहे। 

तीसरे मोर्चे का आकर्षण 

समय-समय पर तीसरे मोर्चे की चर्चा होती रहती है और आगे भी होती रहेगी। ममता बनर्जी, केजरीवाल, बीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस जैसे दलों को साथ लेकर कोई नया संघीय मोर्चा बन सकता है। लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि ऐसे मोर्चे अक्सर किसी साझा विचारधारा से नहीं, बल्कि साझा विरोध से बनते हैं। नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय हित और वैचारिक मतभेद उन्हें लंबे समय तक टिकने नहीं देते। आगे का रास्ता विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या संख्या नहीं, बल्कि कल्पना की कमी है। क्या वह केवल भाजपा विरोध से आगे बढ़कर एक सकारात्मक राष्ट्रीय दृष्टि प्रस्तुत कर सकता है? 
क्या वह युवाओं को यह विश्वास दिला सकता है कि सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं? क्या वह सिद्धांतों पर आधारित राजनीति और व्यावहारिक चुनावी रणनीति के बीच संतुलन बना सकता है? यही प्रश्न आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति का भविष्य तय करेंगे। भारत को केवल एक विपक्ष की आवश्यकता नहीं है। भारत को ऐसे विपक्ष की आवश्यकता है जिसे स्वयं पता हो कि वह किन मूल्यों, किन विचारों और किन उद्देश्यों के लिए खड़ा है।