जनता इतने आत्मविश्वास के साथ क्यों दावा कर रही है कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में हुए चंदे-चढ़ावे के घोटाले में कुछ भी नहीं होगा या कुछ निकलेगा ? असली दोषियों के न कभी नाम बाहर आएँगे और न उनका बाल कोई बाँका होगा ? घोटाले की जाँच के लिए बनाए गए विशेष जाँच दल द्वारा कोई सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन भी नहीं होगा। दल का कार्यकाल वैसे भी 15 जुलाई तक बढ़ गया है। मुमकिन है जाँच का दायरा बढ़ाकर कार्यकाल फिर से बढ़ा दिया जाए।
उसके भी पहले ग्यारह जुलाई को महासचिव चंपतराय तथा सदस्य अनिल मिश्रा द्वारा तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट से दिये गए त्यागपत्रों पर विचार किया जाएगा ! कौन विचार करेगा ? क्या वे जिन पर आरोप है कि आस्थाओं के साथ हुए विश्वासघात में उनकी भूमिका भी संदेहों से परे नहीं है या कोई अन्य?
चंपतराय के विकल्प की तलाश प्रारंभ हो चुकी है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि अब कह रहे हैं कि वे कोषाध्यक्ष तो थे लेकिन उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी। किसी भी काम में उनका कोई दखल नहीं था।
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श्रद्धालुओं के बीच इस तरह की बातें क्यों हैं कि घोटाले का इस समय बाहर आना किसी बड़ी राजनीतिक कार्ययोजना का हिस्सा भी हो सकता है जिसके कि तार यूपी में अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से जुड़े हों?
नागरिकों के बीच ऐसा डर क्यों है कि लगभग पच्चीस करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य में चुनावों के पहले ख़ौफ़ का साम्राज्य क़ायम हो रहा है ?
नागरिक क्यों सवाल कर रहे हैं कि मंदिर-निर्माण के लिए भूमि-पूजन से लेकर उसके भव्य उद्घाटन-समारोह तक आकर्षण का केंद्र बने रहे दोनों प्रमुख यजमान करोड़ों हिन्दू भक्तों की धार्मिक आस्थाओं के साथ हुए आघात के प्रति बिलकुल भी विचलित नहीं दिखाई पड़ रहे हैं ? प्रधानमंत्री विदेशों के और संघ-प्रमुख देश में भ्रमण कर रहे हैं, प्रेरक उद्बोधन वितरित कर रहे हैं !
नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !
ऐसा इसलिए कि जब कभी व्यवस्थाएँ किसी बड़े राजनीतिक अथवा नैतिक संकट से मुखातिब होती हैं कोई नई आपदा आस्थाओं की भीड़ के बीच किसी साँप के बच्चे की तरह अचानक से प्रकट हो जाती है ! इसके कारण मचने वाली भगदड़ में आस्थाएँ तो श्वासहीन शरीरों में तब्दील होने लगती हैं,साँप का बच्चा सुरक्षित ग़ायब हो जाता है !
स्मरण किया जाए तो यक़ीन करना मुश्किल हो जाएगा कि कोविडकाल के दौरान असीमित कष्ट भुगत रहे नागरिकों के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कभी ऐसा कहा होगा : ‘ जब वे अपने भाई-बहनों की तरफ़ देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि वे (भाई-बहन) सोच रहे होंगे कि ये कैसा प्रधानमंत्री है जिसने हमें इतनी कठिनाइयों में डाल दिया है !’
नागरिक डरे हुए हैं कि कोविडकाल के दौरान उनकी आस्थाओं के साथ किए गए प्रयोगों को कहीं सरकार ने आपदाओं से निपटने के किसी स्थाई रोल मॉडल में तो नहीं परिवर्तित कर दिया गया है ! खाड़ी युद्ध से उत्पन्न संकट पर संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने चार महीने पूर्व ही कहा था कि :’ पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण भारत के सामने अभूतपूर्व चुनौतियाँ हैं और उनसे निपटने के लिए देश को कोविड संकट के समय की तरह एकजुट होकर तैयार रहना होगा।’
सवाल एक और भी है जो सबसे बड़ा है ! वह यह कि मोदी-भागवत के भारत में निर्मित हुए हिंदुत्व की आस्थाओं के सर्वोच्च तीर्थस्थल की पवित्रता ही अगर संदेहों के घेरे में सिमट रही है तो क्या इसे केदारनाथ की गुफा और विवेकानंद स्मारक पर किये गए तपों से अर्जित पुण्य के क्षीण होने की शुरुआत मान लेना चाहिए या फिर किसी नए ईश्वरीय चमत्कार की प्रतीक्षा करना चाहिए?