राहुल गांधी के पुणे कार्यक्रम ने मनु स्मृति पर फिर से एक बहस को जन्म दे दिया है। मनु स्मृति का आज के भारत में कोई संवैधानिक या कानूनी वजूद नहीं है। संविधान लागू होने के साथ ही मनु स्मृति और उससे जुड़े हिंदू कानूनों को विदाई दे दी गई। उसके बाद भी जो कसर बाक़ी रह गया था उन्हें हिंदुओं के विवाह, सम्पत्ति के बँटवारे में बेटियों का हिस्सा और अन्य क़ानूनों में संशोधन के ज़रिए ख़त्म कर दिया गया। लेकिन मनु स्मृति पर बहस, विरोध और समर्थन आज भी जारी है। असल में यह बहस रह रह कर प्रासंगिक इसलिए बन जाता है कि संविधान और क़ानून में प्रतिबंध के बावजूद हिंदू समाज में व्यावहारिक स्तर पर इसका वजूद कायम है। व्यवहार में छुआछूत और औरतों के साथ भेदभाव समाज में अब भी दिखाई देता है।

अंग्रेजी राज में मनु स्मृति

अंग्रेज़ी शासन में मनु स्मृति पर आधारित कई क़ानून लागू होते थे, इसलिए 1927 में जब दक्षिण के द्रविड़ आंदोलन के प्रणेता पेरियार रामास्वामी नायकर के समर्थकों और दलितों के राजनीतिक - सामाजिक आंदोलन के नेता भीमराव आंबेडकर ने मनु स्मृति को जलाया तो उसका मक़सद दलितों के सामाजिक - राजनीतिक चेतना को बढ़ाने के साथ साथ अंग्रेजी शासन का विरोध भी माना जा सकता है। क्योंकि अंग्रेजी शासन में मनु स्मृति के कई प्रावधानों को क़ानूनी मान्यता मिली हुई थी। 1772 में ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने निर्देश दिया था कि हिंदुओं के मामलों, जैसे- विरासत, विवाह, जाति आदि के बारे में फ़ैसला करते समय धर्म शास्त्रों का पालन किया जाए। इसके चलते बहुत सारे फ़ैसले मनु स्मृति के आधार पर लिए जाते थे।
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एंग्लो - हिंदू लॉ

1794 में विलियम जोन्स ने मनु स्मृति का अंग्रेजी अनुवाद ‘इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हिंदू लॉ’ के नाम से और बाद में लुई जैकोलॉयट ने ‘लॉ ऑफ मनु’ या ‘द ऑर्डिनेंसेज़ ऑफ़ मनु’ नाम से मनु स्मृति का अनुवाद, 1867 से 1876 के बीच किया। अंग्रेज़ सरकार ने इसका इस्तेमाल हिन्दू कोड तैयार करने में किया। ब्रिटिश अदालतों ने इसे हिंदू लॉ का आधार माना और एंग्लो -हिंदू लॉ बनाने में इस्तेमाल किया। औपनिवेशिक शासन ने इसे हिंदुओं के लिए कोड के रूप में प्रचारित और लागू किया। यह प्रथा, स्थानीय रिवाजों के साथ मिलाकर इस्तेमाल होती थी। इसलिए मनु स्मृति के विरोध को भी आजादी की लड़ाई का एक हिस्सा कहना ग़लत नहीं है। प्रमुख इतिहासकार प्रोफ़ेसर रोमिला थापर बताती हैं कि ये ग्रंथ आदर्श चित्र पेश करते हैं, न कि वास्तविक सामाजिक प्रथाओं का पूरा प्रतिबिंब। वे जाति, शूद्रों और अस्पृश्यों से जुड़ी बहिष्करण की व्यवस्था को ऐतिहासिक रूप से समझने पर जोर देती हैं।

चार वर्ण और एक अवर्ण

यह सही है कि मनु स्मृति हिंदू समाज को चार वर्ण में बांटता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं। वैसे इसके बाद एक भी समूह है जिसे हिंदू समाज से ही बाहर माना गया है। ये अवर्ण है। उच्च जाति की माता और निम्न जाति के पिता से उत्पन्न संतान को अवर्ण माना गया है। मनु स्मृति ने चार वर्णों में छुआ छूत नहीं माना है। लेकिन अवर्ण को अछूत कहा है। अवर्ण को गांव से बाहर रहने का निर्देश भी है। हालांकि व्यवहार में कई शुद्र जातियों को भी अछूत माना जाता रहा है। 

इसी तरह मनु स्मृति को आधार मान कर महिलाओं को पुरुषों से कम अधिकार प्राप्त थे। या फिर महिलाओं को हर उम्र में पुरुषों के अधीन माना गया था जैसा कि राहुल गांधी ने पुणे के भाषण में बताया। अंग्रेजी राज में हिंदुओं को मनु स्मृति के नजरिये से देखा जाता था।

संविधान और मनु स्मृति

एक तरफ़ पेरियार और आंबेडकर जैसे नेताओं के विरोध और दूसरी तरफ़ गांधी के अछूत उद्धार आंदोलन ने आजादी के पहले ही छुआछूत के ख़िलाफ़ माहौल बना दिया था। संविधान पर इसका असर साफ़ दिखाई देता है। भारत का संविधान एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष दस्तावेज़ है जो समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें मनु स्मृति या किसी भी प्राचीन धर्मशास्त्र को कानून का स्रोत नहीं माना गया है। संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 15, 17 ) और अन्य प्रावधान मनु स्मृति के कई मूल विचारों जैसे जन्मजात जाति-आधारित पदानुक्रम, महिलाओं की अधीनता, के विपरीत हैं। हिंदू पर्सनल लॉ (विवाह, उत्तराधिकार, दत्तक आदि) अब संहिताबद्ध है। हिन्दू मैरिज एक्ट 1955, हिन्दू सक्सेशन एक्ट 1956 (2005 में संशोधित), हिन्दू माइनोरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट आदि के ज़रिए सभी हिंदू धार्मिक कानूनों और परंपराओं को ख़त्म किया जा चुका है। ये अधिनियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जहाँ प्रावधान किया गया है, वहाँ पुराने ग्रंथ, प्रथा या रिवाज प्रभावी नहीं रहेंगे।

महिलाओं की अधीनता

हाल में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हिंदू लॉ मुख्यतः मिताक्षरा स्कूल और याज्ञवल्क्य स्मृति पर आधारित है, न कि मनु स्मृति पर। इतिहासकार राम चंद्र गुहा, 1949 के ऑर्गेनाइजर पत्रिका (आरएसएस का मुखपत्र) के संपादकीय का हवाला देते हैं, जिसमें संविधान की आलोचना करते हुए मनु स्मृति की प्रशंसा की गई थी। गुहा इसे संविधान और प्राचीन स्मृतियों के बीच के अंतर को रेखांकित करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। वे हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना करते हुए कहते हैं कि जाति भेदभाव और महिलाओं की अधीनता का विरोध करते हुए भी हिंदू होना संभव है। मनु स्मृति जैसे ग्रंथों को आधुनिक समानता के आदर्शों के विपरीत माना जाता है। गुहा इसे संविधान और प्राचीन स्मृतियों के बीच के अंतर को रेखांकित करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। वे हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना करते हुए कहते हैं कि जाति भेदभाव और महिलाओं की अधीनता का विरोध करते हुए भी हिंदू होना संभव है।

मिताक्षरा और दयाभाग

हिंदू व्यक्तिगत कानून (विशेषकर उत्तराधिकार, संयुक्त परिवार की संपत्ति और बंटवारा) में मुख्य रूप से दो प्राचीन स्कूल महत्वपूर्ण हैं: मिताक्षरा और दयाभाग। मिताक्षरा, याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर द्वारा लगभग 11वीं-12वीं शताब्दी में लिखी गई टीका पर आधारित है। यह बंगाल और असम को छोड़कर भारत के अधिकांश हिस्सों में लागू होती थी। इसमें जन्म से ही पुत्र को पैतृक संपत्ति में अधिकार का प्रावधान था। बाद में संशोधन करके बेटियों को भी यह अधिकार दे दिया गया।

मिताक्षरा की उप-शाखाएँ भी हैं। बनारस स्कूल – उत्तरी भारत में, मिथिला स्कूल – बिहार के कुछ हिस्से में, बॉम्बे/महाराष्ट्र स्कूल – महाराष्ट्र, गुजरात में और मद्रास/द्रविड़ स्कूल – दक्षिण भारत में लागू होता था।

दायभाग, जीमूतवाहन द्वारा 12वीं-13वीं शताब्दी में लिखित ग्रंथ पर आधारित है। यह विभिन्न स्मृतियों का संग्रह है। यह मुख्य रूप से बंगाल और असम में लागू होता था। इसके मुताबिक़ संतान को संपत्ति का अधिकार जन्म से नहीं, बल्कि पिता की मृत्यु के बाद मिलने का प्रावधान था। उत्तराधिकार का आधार धार्मिक/आध्यात्मिक लाभ को माना गया था। कानूनों में बदलाव के बाद यह प्रावधान लगभग खत्म हो गया है।
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ब्राह्मणवाद की 'बाइबिल'

मनु स्मृति के अध्याय 10 में चार वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अलावा कुछ मिश्रित जातियों या वर्णसंकर का विस्तार से वर्णन है। इन्हें उच्च जाति की माता और निम्न जाति के पिता से उत्पन्न बताया गया है। इनमें से कुछ को अत्यंत निम्न, बहिष्कृत और अस्पृश्य (बाद में अछूत) माना गया है। मनु स्मृति में “अछूत” शब्द का प्रयोग नहीं है, लेकिन जिन जातियों/समूहों को समाज से बाहर, गाँव के बाहर रहने वाला, अत्यंत अशुद्ध और संपर्क से दूषित करने वाला बताया गया है, वे मुख्य रूप से अछूत माने गए हैं।

मनु स्मृति के सबसे प्रभावशाली आलोचक डॉ. बी.आर. आंबेडकर मनु स्मृति को ब्राह्मणवाद की “बाइबिल” या जाति व्यवस्था का दार्शनिक आधार मानते थे। उन्होंने इसे निम्न जातियों और महिलाओं के अधिकार छीनने वाला बताया।

मंदिर और शुद्र

मनु स्मृति मुख्य रूप से वैदिक युग के बाद के सामाजिक-धार्मिक नियमों का वर्णन करती है। उस समय मंदिर या मूर्ति पूजा आधुनिक रूप में विकसित नहीं हुई थी। मनु स्मृति का फोकस यज्ञ, वैदिक अध्ययन और संस्कारों पर था। शूद्रों को वेद पढ़ने, सुनाने, वैदिक मंत्र उच्चारण करने और बड़े यज्ञ करने से मना किया गया है (उदाहरण: मनु 2.172, 4.80-81, 10.126-127 आदि)। इसमें बताया गया था कि उनका स्पर्श कुछ अनुष्ठानों को अशुद्ध कर सकता है (जैसे 3.241)। लेकिन मंदिर प्रवेश का सीधा निषेध नहीं मिलता। बाद के काल में (मध्यकाल में) कुछ मंदिरों में निचली जातियों/अस्पृश्यों के प्रवेश पर प्रतिबंध की प्रथाएँ विकसित हुईं, जो मुख्य रूप से चांडाल जैसी मिश्रित/बहिष्कृत जातियों पर लागू होती थीं, न कि सामान्य शूद्रों पर। कुछ धर्मशास्त्रों और प्रथाओं में शूद्रों को बाहर से या सीमित रूप में मंदिर में पूजा की अनुमति दी गई।

मनु स्मृति पर सवाल

पत्रकार हेमंत जोशी सोशल मीडिया पर एक विस्तृत लेख में मनु स्मृति के प्रचलित लिखित संस्करण पर ही सवाल खड़ा करते हैं। उनका कहना है कि इस संस्करण में महिलाओं को हर उम्र में पुरुष के अधीन भी बताया गया है और “ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” यानी जहाँ स्त्रियों का सम्मान ( या पूजा ) होता है वहीं देवताओं का वास होता है। दोनों बातें विरोधाभासी लगती हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती ने मनु स्मृति के क़रीब आधे हिस्से को मूल ग्रंथ का हिस्सा नहीं माना था। भारत का कानून, संविधान की सर्वोच्चता पर टिका है। मनु स्मृति एक ऐतिहासिक/धार्मिक ग्रंथ है, कानून नहीं। कोई भी क़ानून इसे मान्यता नहीं देता; बल्कि संवैधानिक मूल्य और संहिताबद्ध अधिनियम इसके कई असमान प्रावधानों को निरस्त करते हैं। सवाल ये है कि संविधान और क़ानून में जो व्यवस्था है वो आजादी के 80 वर्षों के बाद भी लागू क्यों नहीं हो पा रहा है। उसका सबसे बड़ा कारण शिक्षा की कमी है। महिला, दलित और पिछड़ा तीनों ही शिक्षा में सवर्ण पुरुष के मुक़ाबले बहुत पीछे है।