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यूएई, बहरीन से हुई इज़रायल की दोस्ती, भारत की पाक से क्यों नहीं?

यहूदी राज्य इज़रायल के अस्तित्व को सिरे से खारिज करने वाले संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने न सिर्फ़ उसके वजूद को स्वीकार करने वाला क़रार किया है, बल्कि आर्थिक सहयोग बढ़ाने के कई समझौतों पर दस्तख़त कर सबको हैरत में डाल दिया है। इसके साथ ही यह सवाल उठता है कि हज़ारों साल की विरासत को साझा करने वाले और आज़ादी के बाद भी कई बार काफी बेहतर रिश्ते कायम करने वाले भारत-पाकिस्तान के बीच दोस्ती क्यों नहीं हो सकती है।

नया पाकिस्तान!

यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि पाकिस्तान की कमान ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़ कर निकले इमरान ख़ान के हाथ में है जो 'नया पाकिस्तान' गढ़ने की बात करते हैं। दूसरी ओर भारत में उस बीजेपी की सरकार है, जो भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के महासंघ बनाने की बात कई बार कह चुकी है।
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यह सवाल इसलिए भी पूछा जाना चाहिए क्योंकि क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान ख़ान किसी जमाने में करोड़ों भारतीयों के दिल की धड़कन हुआ करते थे तो नरेंद्र मोदी बग़ैर निमंत्रण के बेहद अनौपचारिक और घरेलू रूप से तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के यहां जा चुके हैं।
इसके बावजूद भारत-पाकिस्तान रिश्ते जितने बुरे हैं, युद्ध को छोड़ कभी नहीं रहे हैं।

यूएई-इज़रायल के बीच 99 क़रार

ये दोनों देश इज़रायल-संयुक्त अरब अमीरात जैसे बुरे हाल में तो नहीं ही रहे हैं। यूएई और इज़रायल ने निवेश बढ़ाने और उसकी हिफ़ाजत के लिए 99 क़रारों पर दस्तख़त किए हैं। यूएई के वित्त मंत्रालय के अवर सचिव यूनिस हाजी अल खूरी ने मंगलवार को एक बयान जारी कर कहा कि आर्थिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में और कदम उठाए जाएंगे।
इज़रायल के मुख्य अर्थशास्त्री शीरा ग्रीनबर्ग ने कहा है कि इससे व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी और निजी क्षेत्र को फ़ायदा मिलेगा।
ताज़ा घटनाक्रम में तेल अबीब के बेन गुरियन हवाई अड्डे को दुबई और अबूधाबी से जोड़ने के लिए नया समझौता होने वाला है। इसके अलावा इज़रायल के दूसरे और छोटे शहरों को भी संयुक्त अरब अमीरात से जोड़ा जाएगा।

इज़रायल-बहरीन समझौता

इज़रायल ने इसी तरह बहरीन से भी समझौता किया है। तेल अबीब से एक विशेष उड़ान से इज़रायल के आला अफ़सर मनामा गए, जहां उन्होंने क़रार पर दस्तख़त किए। उस विमान में अमेरिका के वित्त मंत्री स्टीव म्यूचिन भी थे।
बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लतीफ अल-ज़यानी और इज़रायल के विदेश मंत्रालय के महानिदेशक अलन उसपिज़ ने समझौते पर दस्तख़त किए। उस समय वहां इज़रायल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मेर बिन-शब्बत भी मौजूद थे।

'शांति का युग'

इसके पहले सितंबर महीने में दोनों देशों के बीच एक शांति समझौता हुआ था, जिसके तहत दोनों एक दूसरे के यहां दूतावास खोलेंगे और सामान्य रिश्तों की शुरुआत करेंगे।
इस मौके पर इज़रायली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा था, 'यह शांति का युग है, शांति के लिए शांति और अर्थव्यवस्था के लिए अर्थव्यवस्था का समय है। हमने शांति स्थापित करने के लिये बहुत दिनों से काफी कोशिश की है और अब उसका नतीजा मिलने लगा है।'
अब तक खाड़ी के तमाम देश कहते थे कि जब तक फ़िलीस्तीन समस्या का समाधान नहीं हो जाता, वे किसी कीमत पर इज़रायल को स्वीकार नहीं कर सकते। अब संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और जोर्डन के बाद इज़रायल को स्वीकार करने वाला चौथा देश बहरीन हो गया।

इज़रायल-लेबनान सीमा क़रार?

इसी तरह लेबनान और इज़रायल लंबे समय से विवादित समुद्री सीमा को लेकर चल रहे विवाद को ख़त्म करने पर अमेरिका की मध्यस्थता में बातचीत शुरू करने पर राजी हो गए हैं। यह बातचीत दक्षिणी लेबनान के सीमावर्ती शहर नकौरा में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के मुख्यालय में होगी।
इज़राइल और लेबनान के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं है। तकनीकी रूप से दोनों युद्ध की स्थिति में हैं क्योंकि 1967 के युद्ध के बाद दोनों में लड़ाई भले ही थम गई, लेकिन किसी औपचारिक युद्धविराम पर दस्तख़त नहीं हुआ था। दोनों ही देश आर्थिक क्षेत्रों के रूप में भूमध्य सागर के 860 वर्ग किलोमीटर पर दावा करते हैं।

सऊदी अरब भी?

संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बाद अब सऊदी अरब भी इज़राइल के साथ शांति समझौता कर सकता है। अमेरिका इसमें मध्यस्थता कर रहा है। सऊदी अरब के विदेश मंत्री शहज़ादा फ़ैसल ने पिछले हफ़्ते अमेरिका जाकर विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो से बातचीत की थी।
माइक पॉम्पिओ ने पत्रकारों से बात करते हुए साफ़ कहा था कि अमेरिका और सऊदी के बीच इजराइल को लेकर बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा था, 

'हम चाहते हैं कि संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन की तरह सऊदी अरब भी इज़राइल के साथ कूटनीतिक रिश्ते कायम करे। हमें पूरी उम्मीद है कि सऊदी सरकार इस बारे में गंभीरता से विचार कर रही है।'


माइक पॉम्पिओ, विदेश मंत्री, अमेरिका

भारत-पाक गतिरोध

लेकिन भारत-पाकिस्तान में गतिरोध लंबे समय से बना हुआ है। नरेंद्र मोदी सरकार की स्पष्ट नीति है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद पहले की तरह ही चल रहा है, बल्कि उसमें इज़ाफा हुआ है।
भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने पहले कार्यकाल में विदेश से लौटते हुए यकायक इसलामाबाद उतरने का कार्यक्रम बना कर सबको चौंका दिया था। वह तत्कालन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के घर एक कार्यक्रम में भाग लेने बग़ैर निमंत्रण के ही पहुँच गए थे। इसकी काफी तारीफ हुई थी और ऐसा लगा था कि वह पाकिस्तान के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू करेंगे। 
इस उम्मीद की वजह यह थी कि बीजेपी की ही अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की थी। वह सरकार अल्पमत की सरकार थी, ऐसे में वाजपेयी के फ़ैसले को बहुत साहसिक कदम माना गया था।
मोदी ने बाद के दिनों में अपना रवैया बेहद कड़ा कर लिया। उन्होंने राजनीतिक कारणों से राष्ट्रवाद का एक नया नैरेटिव गढ़ा जिसके निशाने पर पाकिस्तान रखा गया। फ़िलहाल दोनों देशों के बीच इतनी कटुता है कि किसी तरह की बातचीत की कोई उम्मीद किसी को नहीं है।
बीते दिनों मशहूर पत्रकार करण थापर ने 'द वायर' में पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद युसुफ़ से बातचीत पर ख़बर लिखी थी। इसमें मोईद युसुफ़ ने कहा था कि भारत सरकार कश्मीर पर पाकिस्तान से बातचीत चाहती है। भारत सरकार ने इसका खंडन नहीं किया है।
सवाल उठता है कि भारत और पाकिस्तान बातचीत क्यों नहीं कर सकते? वे इज़रायल और मध्य पूर्व के दूसरे देशो से क्यों नहीं सीख सकते?

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