गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के आम चुनाव से पहले बीजेपी व एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में यूसीसी यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर दिया जायेगा। उत्तराखंड और गोवा में यूसीसी पहले से ही लागू है। दूसरी तरफ गुजरात में इसी साल मार्च में, असम में मई में और मध्य प्रदेश में जुलाई 2026 में यूनिफार्म सिविल कोड का बिल पास हो चुका है लेकिन अभी लागू नहीं हुआ है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में भी यूसीसी लागू करने के लिए प्रक्रिया चल रही है लेकिन इसके लिए अभी केवल ड्राफ्टिंग कमेटी ही बनी है, जो इसकी रूप रेखा पर विचार कर रही है।

जहां तक मुस्लिम समाज पर यूसीसी के असर का सवाल है, बेशक उसको धार्मिक रूप से कड़ा ऐतराज होगा और वह अपने संवैधानिक शरीयत कानून का हक़ छिनने पर आहत भी ज़रूर होगा, लेकिन सीएए के खिलाफ़ किए गए अपने असफल आंदोलन से वह इस बार शायद ही आंदोलन को सड़क पर उतरे। अलबत्ता इस्लामी आलिमों की तरफ से यूसीसी का अभी से विरोध शुरू हो गया है जो आगे बयान मांगपत्र और आस्तीनों पर काले बैज लगाने तक सीमित रह सकता है। 

यूसीसी का मुस्लिमों पर असर

यूसीसी के लागू होने पर मुस्लिम पुरुष एक से अधिक शादी, एकतरफा तलाक़, तलाक़ के बाद भरण पोषण से बचाव, निकाह हलाला, तलाक़ या पति की मौत पर मुस्लिम महिला इद्दत (4 माह 10 दिन), लड़कियों का बाल विवाह, उत्तराधिकार में लड़कों को लड़कियों से संपत्ति में हिस्सा आधा और गोद लेने व लिव इन रिलेशन में रहने की मनाही जारी नहीं रख पाएंगे। उनको शादी का रजिस्ट्रेशन कराना भी कानूनन अनिवार्य होगा। हालांकि यूसीसी अनुसूचित जनजाति को छोड़कर हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन सभी धर्मों के मानने वालों पर भी लागू होगा, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे इस्लामी संगठन इसको शरीयत और मुस्लिम समाज की संस्कृति को प्रभावित करने वाला बताकर विरोध करते आ रहे हैं। आगे भी करेंगे लेकिन आम मुस्लिम उनका खुलकर सक्रिय समर्थन शायद ही करे।
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सेक्युलर दल और उनकी सरकारें इसीलिये मुसलमानों की नाराज़गी से बचने को यूसीसी लागू नहीं करती थीं और उनमें से अधिकांश अब भी जबरन यूसीसी थोपने के खिलाफ़ हैं। एनडीए के जेडीयू और टीडीपी जैसे कुछ घटक भी इसके सपोर्ट में नहीं हैं लेकिन अंत में वे बीजेपी के सामने घुटने टेक देते हैं तो इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना प्रबल है। कांग्रेस जैसे बड़े सेक्युलर दलों का कहना है कि जब तक मुस्लिम समाज के भीतर से ही यूसीसी लागू करने की मांग नहीं आए तब तक किसी भी सरकार को यूसीसी लागू नहीं करना चाहिए। हालाँकि बीजेपी का सियासी मक़सद मुस्लिम समाज की भलाई से ज्यादा यूसीसी लागू करके अपने हिंदू वोट बैंक को खुश करना है, लेकिन बदले हुए माहौल में राम मंदिर निर्माण और कश्मीर से धारा 370 हटाने की तरह इस क़दम से उसको राजनीतिक लाभ मिलना काफी मुश्किल लग रहा है।

किस धर्म में कितना % बहुविवाह

पहले यूसीसी के मुस्लिम समाज पर पड़ने वाले वास्तविक असर पर बात करते हैं। यह ठीक है कि इससे मुसलमान पुरुषों के 'अधिकार' घटेंगे और कानूनी जिम्मेदारी काफ़ी बढ़ जायेगी लेकिन सीएए और वक़्फ़ बोर्ड संशोधन कानून की तरह पूरे समाज का सीधा नुकसान और भेदभाव का सामना उनको नहीं करना होगा। जहां तक एक से अधिक शादी पर रोक का सवाल है तो एनएफएसएच 5 के आंकड़े बताते हैं कि मुसलमान 1.9 प्रतिशत यानी ईसाई समाज के 2.1 प्रतिशत से कम ही बहुविवाह करते हैं। अलबत्ता यह हिंदुओं के 1.3 प्रतिशत से कुछ अधिक है, जबकि बहुविवाह में पूरे देश का औसत प्रतिशत 1.4 है। जाहिर है जैसे कानूनन रोक के बावजूद कुछ हिंदू एक से अधिक पत्नी रख रहे हैं वैसे ही यूसीसी के बावजूद कुछ मुस्लिम भी चोरी छिपे ऐसा करेंगे लेकिन खुलेआम मज़हब की आड़ में बहुविवाह को अधिकार समझने वाले मुस्लिम इससे बचेंगे भी। इस मामले में यह याद दिलाना भी उचित होगा कि इस्लाम में बहुविवाह का चलन उस समय शुरू हुआ था जब जंगों में बड़ी संख्या में मर्द मारे जाते थे और औरतें विधवा हो जाती थीं। अब कम से कम भारत में तो ऐसा कुछ नहीं है। दूसरी बात शरीयत में एक से ज्यादा निकाह की छूट इस शर्त पर दी गई है कि जब कोई मर्द सब पत्नियों के साथ सौ फीसदी समान बर्ताव करे जो कि नामुमकिन होता है। 

एकतरफा एक समय में तीन तलाक ए बिद्दत पर पहले ही कानूनन रोक लग चुकी है जो कि इसका दुरुपयोग होने से समय की ज़रूरत भी थी, जबकि यूसीसी से तीन माह में दी जाने वाली तलाक ए एहसन पर भी रोक लगेगी तो पति पत्नी की आपसी सहमति से कोर्ट से तलाक़ लेने का रास्ता भी खुलेगा। तलाकशुदा पत्नी को उसकी दूसरी शादी होने तक भरण पोषण का खर्च देना ज़रूरी होगा, जो न्यायसंगत ही है।

चर्चित शाहबानो के केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही फ़ैसला धारा 125 के तहत दिया था जिसको कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार ने संसद में पलट दिया था, लेकिन इससे बीजेपी को अपना हिंदुत्व एजेंडा राम जन्मभूमि आंदोलन तेज़ कर आगे बढ़ाने को उर्वर ज़मीन मिली थी। निकाह हलाला को लेकर खुद इस्लामी आलिमों में भारी मतभेद हैं। सुन्नी मुफ्तियों का बड़ा हिस्सा इसको ग़ैर शरई बताता है जबकि कुछ मुस्लिम विद्वान इसको मान्यता देते हैं जिससे मुस्लिम समाज में यह कुप्रथा कम ही सही लेकिन मौजूद है, इसका ख़ात्मा होना स्वागत योग्य होगा। जहां तक तलाक़ या पति की मौत पर महिला की इद्दत का मुद्दा है तो यह व्यवस्था इस्लाम में ऐसी महिला की दूसरी शादी होने पर होने वाले बच्चे के वास्तविक पिता को लेकर उठने वाले विवाद से बचने को की गई थी लेकिन अब इसके लिए मेडिकल साइंस में ऐसे आधुनिक गर्भावस्था परीक्षण होने लगे हैं जिसको जानने के लिए 130 दिन वेट करने की कोई जरूरत नहीं है। 

बालविवाह कुप्रथा

बालविवाह अन्य धर्मों की तरह मुस्लिम समाज में भी करने की कुप्रथा रही है जिसको यूसीसी से रोकना नाबालिग बच्चियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए बेहतर ही होगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक माता पिता से उत्तराधिकार में मुस्लिम बेटियों को बेटों से आधा हिस्सा मिलता है जबकि यूसीसी लागू होने के बाद यह बराबर देना होगा, संविधान की लैंगिक समानता के हिसाब से यह भी ठीक ही होगा। ऐसे ही निसंतान दंपत्ति का बच्चा गोद लेना और मुस्लिम प्रेमी प्रेमिका का लिव इन रिलेशन में रहना अब आम बात है, इसे यूसीसी मान्यता देगा तो अब तक शरीयत में वर्जित इन बातों से मुस्लिम समाज में सुधार ही होगा।
अब बात करते हैं यूसीसी के सियासी और संवैधानिक मकसद पर तो बीजेपी के एजेंडे में यूसीसी राम मंदिर और धारा 370 के साथ शुरू से ही रहा है। इनमें से दो लक्ष्य उसने पहले ही पूरे कर लिए हैं लेकिन यूसीसी अभी भी बाक़ी है। पहले पीएम मोदी ने 2023 में यूसीसी की चर्चा जब ज़ोरदार तरीके से शुरू की थी तो लगा था वे केंद्रीय स्तर पर इसके लिए कोई विधेयक लाने जा रहे हैं लेकिन बाद में यह तय हुआ कि यूसीसी पहले बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों में लाया जाए जिससे इसके प्रभाव और प्रतिक्रिया को आंका जा सके। वैसे भी यह मामला संविधान की समवर्ती सूची में आता है जिससे केंद्र व राज्य दोनों इसको कानून बनाकर लागू कर सकते हैं। 

UCC और संविधान सभा

संविधान सभा भी इस मुद्दे पर बंटी हुई थी इसीलिए इस मुद्दे को भविष्य में विचार के लिए आने वाली सरकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया था लेकिन संविधान के दिशा-निर्देशक सिद्धांत यह ज़रूर कहते हैं कि यूसीसी के लिए नागरिकों के बीच सहमति बनाने का प्रयास जारी रखा जाए। इसी श्रृंखला में 21वें लॉ कमीशन ने 2018 में अपने परामर्श पत्र में कहा था कि यूसीसी बनाना न तो समय की आवश्यकता है न ही इस दौर में लोगों की इच्छा के अनुसार होगा। आयोग ने देश की विविधता को देखते हुए मौजूदा पर्सनल लॉ में ही सुधार का सुझाव दिया था। इसके विपरीत 22वें लॉ कमीशन ने 2023 में जनता और धार्मिक संस्थाओं से व्यापक विचार विमर्श के बाद हायर कोर्ट के दिए गए निर्देशों और समय की मांग के अनुरूप यूसीसी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था।

राहुल गांधी और UCC

पिछले दिनों छात्रों की गूंज अभियान के तहत राहुल गांधी ने विशेष रूप से लड़कियों को संबोधित करते हुए मनुस्मृति को कोट करते हुए लड़कियों को संविधान के अनुसार समान अधिकार देने में धार्मिक मान्यताओं को बाधा बताया था। बाद में उन पर बीजेपी नेताओं ने केवल हिंदू धर्म ग्रंथों को निशाने पर लेने और मनु स्मृति की संदर्भ से हटकर गलत व्याख्या के भी आरोप लगाए। उनको मुस्लिम महिलाओं को भी बराबर अधिकार दिलाने के लिए बोलने की चुनौती मिली। उनके इस बयान के बाद इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में एक लेख लिखकर इंडियन मुस्लिम फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन, मुस्लिम सत्यशोधक मंडल और रोशनी जैसी प्रगतिशील व आधुनिक विचारों वाली महिलाओं के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं की महिला पदाधिकारियों ने भी राहुल गांधी से मुस्लिम सहित सभी समाज की महिलाओं के लिए समान अधिकार के लिए आवाज़ उठाने की माँग की थी लेकिन इस पर अभी तक राहुल गांधी या कांग्रेस का कोई जवाब नहीं आया है।

भविष्य के विवाद और केवल बहुसंख्यकों के धर्म ग्रंथों पर उंगली उठाने को लेकर बीजेपी के सियासी नैरेटिव से कांग्रेस को होने वाले राजनीतिक नुकसान से बचने को राहुल गांधी को सभी वर्गों की महिलाओं को समान अधिकार देने की संवैधानिक मांग पर ही फोकस करना चाहिए।