नतीजे आते ही कोलकाता के न्यू मार्केट में बुलडोजर से दुकानें ध्वस्त। फाइल फोटो
बीजेपी ने जायज़-नाजायज़ तरीक़ों से बंगाल की सत्ता तो हासिल कर ली है और शुभेंदु अधिकारी ने बतौर मुख्यमंत्री बागडोर भी सँभाल ली है। बंगाल में बहुत सारे लोग इसे परिवर्तन की तरह देख रहे होंगे और उम्मीदें लगाए होंगे कि अब रामराज्य आ जाएगा। लेकिन क्या सचमुच में ऐसा होने जा रहा है या फिर उन्हें जल्दी ही एक बड़े मोहभंग का सामना करना पड़ेगा।
दरअसल, शुभेंदु अधिकारी की सरकार के सामने चुनौतियाँ बहुत विकट हैं। उसके सामने अब बहुत बड़ी चुनौती ये है कि वह अब बंगाल को कैसे चलाएगी? अगर ममता या उसके पहले वाममोर्चा का राज हिंसा, भ्रष्टाचार और आतंक पर आधारित था तो वह उसे कैसे पलटेगी?
अभी तक बीजेपी की जीत पर खुशियाँ मनाने वाले यही दावे कर रहे हैं कि ममता बैनर्जी गुंडों और लफंगों के बल पर राज कर रही थीं। स्थानीय स्तर पर वही तृण मूल को थामे हुए थे, न कि आम जनता। ये भी अकसर कहा जाता है कि वाम मोर्चे के शासनकाल में जो स्थानीय गुंडे काम कर रहे थे, वही तृण मूल में चले गए थे। ममता सरकार उन्हीं की वज़ह से अलोकप्रिय हुई और सत्ता से भी हाथ धो बैठीं।
ये भी दावे किए जाते हैं कि बंगाल की राजनीति में इस आपराधिक गिरोहबंदी की जड़ें बहुत गहरी हैं। ये धन वसूली, हिंसा-प्रति हिंसा राज्य की राजनीतिक संस्कृति बन चुकी है। ये इतनी शक्तिशाली है कि कोई भी राजनीतिक दल इससे बच नहीं सकता, इसके बगैर शासन नहीं कर सकता।
इस धारणा में कितनी सचाई है और कितनी ये प्रचार से बनी है हम नहीं जानते। ऐसे बहुत सारे झूठ हमारी राजनीति में स्थापित किए गए हैं जिनकी बुनियाद सच में नहीं होती या वे फिर वे आंशिक सच पर आधारित होते हैं। लेकिन यदि इसे हम मान भी लें तो क्या बीजेपी की भावी सरकार इससे कैसे निपटेगी।
इस पर विचार करते हुए सबसे पहले हमें ये सवाल पूछना होगा कि क्या बीजेपी एक अहिंसक पार्टी है, क्या वह इसे बुरा मानती है और इससे दूर रहती है?
सचाई ये है कि बीजेपी और पूरा संघ परिवार हिंसा में विश्वास रखते हैं। वे सत्ता के लिए वाणी और कर्म दोनों तरह की हिंसा का भरपूर इस्तेमाल करने वाले संगठन रहे हैं। उनकी वैचारिकी हिंसा पर आधारित है और जब तब राजनीति में इसका प्रदर्शन करते रहते हैं। सावरकर, गोलवलकर सबके विचारों में आप हिटलर और मुसोलिनी के लिए प्रशंसा का भाव देख सकते हैं, जो कि हिंसा के सबसे बड़े प्रतीक बन चुके हैं। इसी वैचारिक हिंसा की परिणति थी नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गाँधी की हत्या।
आज़ादी के बाद हुए अधिकांश दंगों में भी उसकी संलिप्तता रही है। गुजरात नरसंहार हो या मुज़फ्फरनगर के दंगे, उसकी भूमिका क्या थी सब जानते हैं। इसलिए पहली बात ये समझ लेनी ज़रूरी है कि बीजेपी परिवार को हिंसा से कोई समस्या नहीं है, परहेज नहीं है। हाँ, अगर कोई दूसरा करे तो उसे समस्या होती है।
हाँ, एक फ़र्क़ ज़रूर है और वो ये कि ये हिंसा एक समुदाय को लक्ष्य करके की जाती रही है। ये धार्मिक समुदाय भी हैं और राजनीतिक-वैचारिक विरोधी भी। बीजेपी शासित राज्यों में सरे आम और बेहिचक अल्पसंख्यकों और विरोधियों को इस हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है।
जिन राज्यों में बीजेपी का शासन है, उनका चरित्र देख लीजिए। मुख्यमंत्री से लेकर पूरी शासन व्यवस्था हिंसक रूप अख़्तियार कर चुकी है। ओड़िशा में सरकार बने अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ है मगर वहाँ भी हिंसक घटनाएं एकदम से बढ़ गई हैं। यूपी और असम के मुख्यमंत्री तो हिंसा का आह्वान करते ही रहते हैं। हेट स्पीच उनके लिए रोज़मर्रा की बात है।
बीजेपी ने जिन शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाया है, उनका अतीत क्या है वे एक दबंग, आपराधिक गतिविधियों में लिप्त नेता के रूप में जाने जाते हैं। वाममोर्चे के राज में नंदीग्राम की हिंसा की अगुवाई उन्हीं ने की थी। पिछले कुछ सालों में ही उनके चार सहयोगियों की हत्या हो चुकी है किसने करवाई, क्यों करवाई इसकी जानकारी अभी तक नहीं है।
शुभेंदु की हिंसक प्रवृत्तियों को समझना है तो उनके भाषणों और बयानों को सुन लीजिए। उन्होंने जिस तरह से ये सार्वजनिक घोषणा की है कि उन्हें हिंदुओं ने वोट दिया है, इसलिए वे उनका काम करेंगे, मुसलमानों का नहीं करेंगे, वह तो स्पष्ट प्रमाण है कि बंगाल में क्या होने जा रहा है।
अब सवाल ये नहीं है कि शुभेंदु की सरकार हिंसा को रोकेगी या नहीं रोकेगी। अब सवाल ये है कि क्या वह हिंसा को दूसरे तरह की हिंसा से स्थानांतरित कर देगी। यानी वह राजनीतिक दलों के बीच चलने वाली हिंसा को अल्पसंख्यक समाज और अपने राजनीतिक विरोधियों की ओर मोड़ देगी, जैसा कि बीजेपी ने गुजरात, यूपी, असम और दूसरे राज्यों में किया है, कर रही है।
यानी बहुत संभावना है कि तृण मूल कांग्रेस के आपराधिक गिरोहों से शुभेंदु समझौता कर लेंगे और फिर उन्हीं के दम पर राज करेंगे। ये आपराधिक गिरोह हिंदुत्व के दस्ते बन जाएंगे, उन्हें धार्मिक-सामाजिक स्वीकृति मिल जाएगी।
बीजेपी शासन के टेम्पलेट में एक और तरह की हिंसा शामिल है, जिसे बंगाल में इस्तेमाल किया जा सकता है। वह यूपी-गुजरात का फेक एनकाउंटर मॉडल लागू करके नई तरह की हिंसा शुरू करेगी? या फिर इसे सांप्रदायिक रंग दे देगी, यानी मुसलमानों को ये कहकर निशाना बनाया जाएगा कि वे अपराधी हैं और बंगाली हिंदू खुश होकर ताली बजाएंगे।
ये भी नहीं भूलना चाहिए कि बीजेपी या संघ परिवार खुद हिंसा का पुजारी रहा है और राजनीतिक हिंसा उसकी विचारधारा में ही निहित है। वे भ्रष्टाचार के पहाड़ पर भी खड़े हैं। इसलिए उनसे वफ़ा की उम्मीद मत कीजिए जो नहीं जानते कि वफ़ा क्या है।