इस हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बैठक की, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में वृद्धि तथा महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर चर्चा हुई। यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि सरकार लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव रख रही है। इनमें एक-तिहाई यानी 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसी तरह राज्य विधानसभाओं में भी लगभग 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाई जा सकती हैं। यह क़दम नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) को 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले लागू करने का रणनीतिक प्रयास है। लेकिन सवाल उठता है- क्या इस बढ़ोतरी पर विचार परिसीमन आयोग करेगा या गृह मंत्रालय? पूरी प्रक्रिया में क्या चुनौतियां, पेचीदगियां और भूमिकाएं हैं? और क्या 2027 के सात राज्यों के विधानसभा चुनाव नए परिसीमन के आधार पर होंगे?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81 और 170 के तहत लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें जनसंख्या के अनुपात में तय होती हैं, लेकिन 1971 की जनगणना के आधार पर 2001 तक सीटों की संख्या फ्रीज कर दी गई थी। 84वें संशोधन (2001) ने इसे 2026 तक बढ़ा दिया। अब 2026 के बाद नया परिसीमन अपेक्षित था, जो 2027 की जनगणना पर आधारित होना था। लेकिन सरकार ने 2011 की जनगणना को आधार बनाकर प्रक्रिया तेज करने का फैसला लिया है।
शाह की बैठक में सुझाया गया कि महिला आरक्षण को जनगणना और पूर्ण परिसीमन से अलग कर दिया जाए। लोकसभा की कुल सीटें 543 से 816 (50 प्रतिशत बढ़ोतरी) की जाएंगी, ताकि मौजूदा 543 सीटों में कोई कटौती न हो और नई 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकें। राज्यवार अनुपात वही रहेगा—उत्तर प्रदेश को 80 से 120, महाराष्ट्र को 48 से 72, पश्चिम बंगाल को 42 से 63, बिहार को 40 से 60 और तमिलनाडु को 39 से 59 सीटें मिल सकती हैं। विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में बढ़ोतरी प्रस्तावित है। नई व्यवस्था 2029 के लोकसभा चुनावों से लागू होगी।
यह प्रस्ताव इसलिए लाया जा रहा है क्योंकि मूल अधिनियम में महिला आरक्षण को 2027 जनगणना के बाद के परिसीमन से जोड़ा गया था, जिससे क्रियान्वयन 2034 तक टल सकता था। अब 2011 डेटा से परिसीमन कर 2029 तक आरक्षण लागू करने का लक्ष्य है।
संवैधानिक संशोधन से लेकर अंतिम अधिसूचना तक
सीटों की कुल संख्या बढ़ाने और परिसीमन की प्रक्रिया बहु-चरणीय है। सबसे पहले दो संविधान संशोधन विधेयक लाने होंगे—एक नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बदलाव के लिए, दूसरा परिसीमन आयोग अधिनियम 2002 में। इनके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी है, साथ ही कुछ राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी भी। गृह मंत्रालय इन विधेयकों को तैयार करेगा और कैबिनेट की मंजूरी के बाद संसद में पेश करेगा। इसके बाद राष्ट्रपति की अधिसूचना से नया परिसीमन आयोग गठित होगा। आयोग 2011 की जनगणना के आधार पर राज्यों को सीटें आवंटित करेगा, निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करेगा, अनुसूचित जाति (SC) और जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटें तय करेगा तथा महिला आरक्षण के लिए रोटेशन (तीन चुनावों तक आरक्षित, फिर खुली) लागू करेगा। आयोग का ड्राफ्ट प्रस्ताव सार्वजनिक किया जाएगा, आपत्तियां ली जाएंगी, सुनवाई होगी और अंतिम आदेश राष्ट्रपति द्वारा गजट में प्रकाशित होगा। यह आदेश कानून का दर्जा रखता है और किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
चुनाव आयोग परिसीमन में सीधे शामिल नहीं होता, लेकिन वह आयोग को डेटा उपलब्ध कराता है और नए क्षेत्रों पर चुनाव कराने की जिम्मेदारी निभाएगा। पूरी प्रक्रिया में 3-5 साल लग सकते हैं, लेकिन सरकार 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रख रही है।
विभिन्न संस्थाओं की भूमिका
परिसीमन आयोग की भूमिका: यह अर्ध-न्यायिक, स्वायत्त निकाय है। इसका गठन परिसीमन अधिनियम के तहत होता है। आयोग में एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज (अध्यक्ष), मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त और राज्य सरकारों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। इसका मुख्य कार्य—सीटों की संख्या तय करना, सीमाएं खींचना, SC/ST आरक्षण तय करना और अब महिला आरक्षण लागू करना। यह जनसंख्या समानता (लगभग समान आबादी वाले क्षेत्र) सुनिश्चित करता है। 1952, 1963, 1973 और 2002 में चार आयोग गठित हो चुके हैं। नया आयोग 2011 डेटा पर काम करेगा, लेकिन मौजूदा राज्यों के बीच अनुपात बनाए रखेगा।गृह मंत्रालय की भूमिका: यह नीतिगत और क्रियान्वयन की अगुवाई करता है। अमित शाह की बैठकें इसी मंत्रालय के तहत हुईं। मंत्रालय विधेयक तैयार करता है, विपक्ष से परामर्श करता है, आयोग के गठन की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजता है और प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा कराता है। यह संघीय संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी ले रहा है—दक्षिणी राज्यों को आश्वासन दिया गया है कि उनकी एक भी सीट कम नहीं होगी।
चुनाव आयोग की भूमिका: EC परिसीमन का हिस्सा नहीं है, लेकिन वह सहायक भूमिका निभाता है। यह मतदाता सूचियों को अपडेट करता है, नए क्षेत्रों में मतदान केंद्र स्थापित करता है और चुनाव कराता है। अंतिम रूप से EC ही नए परिसीमन के आधार पर चुनाव घोषित करेगा।
चुनौतियां और पेचीदगियां
यह प्रक्रिया कई चुनौतियों से भरी है। सबसे बड़ी उत्तर-दक्षिण विभाजन की है। दक्षिणी राज्य (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक आदि) ने जनसंख्या नियंत्रण किया, लेकिन उत्तर (यूपी, बिहार) की आबादी ज्यादा बढ़ी। अगर 2011 डेटा से भी परिसीमन होता है तो दक्षिण को अनुपात से कम प्रतिनिधित्व मिलने का डर है। हालांकि सरकार ने प्रो-राटा बढ़ोतरी का आश्वासन दिया है, फिर भी राजनीतिक आक्रोश है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पहले ही इस पर सर्वदलीय बैठक बुला चुके हैं।
विपक्षी सहमति एक बड़ी पेचीदगी है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल ने शाह की बैठक का बहिष्कार किया और पूर्ण सर्वदलीय बैठक की मांग की। OBC आरक्षण और जाति जनगणना की मांग भी उठ रही है। संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी है, इसलिए सहमति अनिवार्य है।
डेटा की पुरानी होने की समस्या: 2011 जनगणना 15 साल पुरानी है। 2027 जनगणना चल रही है, लेकिन उसका इंतजार न करके 2011 डेटा इस्तेमाल करने से वर्तमान प्रवासन और जनसांख्यिकी को नजरअंदाज करने का खतरा है। इससे निर्वाचन क्षेत्रों की समानता प्रभावित हो सकती है।
समयसीमा भी चुनौती है। पिछले आयोगों को 3-5 साल लगे। 2029 तक पूरा करना मुश्किल, लेकिन सरकार कैबिनेट की मंजूरी और जून में आयोग गठन से इसे तेज कर रही है।
अन्य पेचीदगियां: SC/ST आरक्षण में समायोजन, महिला आरक्षण का रोटेशन, छोटे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों (जैसे जम्मू-कश्मीर, दिल्ली) में सीट बढ़ाने का तरीका, नई संसद भवन की क्षमता और चुनाव खर्च में वृद्धि। संघीय ढांचे पर असर—राज्यों की स्वायत्तता और संसाधन बंटवारे में बदलाव।
2027 के सात राज्यों के विधानसभा चुनाव पर क्या असर?
2027 में सात राज्यों (राज्यसभा, राष्ट्रपति चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव) के चुनाव प्रस्तावित हैं। लेकिन नए परिसीमन की प्रक्रिया जून 2026 से शुरू होकर 2029 लोकसभा चुनावों के लिए लक्षित है। राज्य विधानसभाओं के लिए भी समान प्रक्रिया चलेगी, लेकिन इतने कम समय में 2027 तक पूरा होना संभव नहीं लगता। इसलिए 2027 के विधानसभा चुनाव पुरानी सीटों यानी 2008 के परिसीमन पर ही होंगे। नई व्यवस्था 2029 या उसके बाद की विधानसभा चुनावों (2026-27 के बाद वाले) से लागू हो सकती है। अगर आयोग समय से पहले पूरा कर ले तो कुछ राज्यों में लागू हो सकता है, लेकिन वर्तमान प्रस्ताव 2029 लोकसभा पर केंद्रित है।
लोकतंत्र की मजबूती या नई असमानता?
सीटों का विस्तार लोकतंत्र को अधिक समावेशी बना सकता है—महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व बेहतर होगा। लेकिन उत्तर-दक्षिण असंतुलन, विपक्षी अविश्वास और प्रक्रियागत देरी अगर नहीं सुलझी तो यह संघीय ढांचे को कमज़ोर कर सकता है। गृह मंत्रालय की सक्रिय भूमिका और परिसीमन आयोग की निष्पक्षता इसकी सफलता तय करेंगी। चुनाव आयोग का सहयोग सुनिश्चित करेगा कि चुनाव निष्पक्ष रहें। अंततः यह बदलाव भारत की बदलती जनसांख्यिकी को स्वीकार करने का अवसर है, लेकिन इसमें राजनीतिक परिपक्वता और सर्वदलीय सहमति ज़रूरी है। अगर सरकार इसमें कामयाब होती है तो महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण के सपने को पूरा होने में तीन दशकों से ज्यादा का समय लगेगा लेकिन सपना साकार हो जाएगा।