assam adani power project- असम में बेदखली अभियान के दौरान इस ज़मीन को भी खाली कराया गया था। Scroll के अनुसार, बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से राज्य में कई बेदखली अभियान चलाए गए, जिनमें बड़ी संख्या में बंगाली भाषी मुस्लिम परिवार प्रभावित हुए हैं।
असम में अडानी पावर प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी गई
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार, 20 सितंबर 2026 को धुबरी जिले के छापर इलाके में अडानी पावर लिमिटेड के 3,200 मेगावाट के अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी। यह परियोजना उसी जमीन पर प्रस्तावित है, जहां जुलाई 2025 में करीब 1,400 बंगाली मूल के मुस्लिम परिवारों के घरों को प्रशासन ने ढहा दिया था।
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े दस्तावेजों में अडानी पावर ने पर्यावरण मंत्रालय को बताया था कि प्रस्तावित स्थल पर कोई आबादी नहीं है और इसलिए पुनर्वास या पुनर्स्थापन से जुड़ा कोई दावा नहीं है। दूसरी ओर, विस्थापित परिवारों का कहना है कि उनके घरों को परियोजना के लिए जमीन खाली कराने के अभियान में हटाया गया था।
1,400 परिवारों के घरों पर चला था बुलडोजर
जुलाई 2025 में असम सरकार ने धुबरी जिले के चारुआबाखरा, चिराकुटा पार्ट-I और पार्ट-II तथा संतोषपुर गांवों में करीब 1,157 एकड़ सरकारी जमीन पर बने घरों को हटाने की कार्रवाई की थी। जिला प्रशासन के अनुसार, यह जमीन बिजली परियोजना के लिए असम पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड को आवंटित की गई थी, जिसने बाद में इसे अडानी पावर को परियोजना के लिए दिया।Scroll के अनुसार, इस कार्रवाई में करीब 1,400 परिवार विस्थापित हुए, जबकि इलाके में रहने वाले करीब 10,000 बंगाली मूल के मुस्लिम लोगों पर इसका असर पड़ा। इनमें से कई परिवार तीन से चार दशकों से इस क्षेत्र में रह रहे थे। कुछ प्रभावित लोगों ने बताया था कि वे पहले ही ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव के कारण अपनी पुश्तैनी जमीन और घर गंवा चुके थे।
परियोजना की जमीन को लेकर क्या हुआ?
30 मार्च 2025 को जिला प्रशासन ने बिजली परियोजना के लिए गांव की चराई की सरकारी जमीन को दूसरी श्रेणी में बदलने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में बेदखली के नोटिस जारी किए और जुलाई में घरों को ढहा दिया।इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कार्रवाई करीब 3,500 बीघा सरकारी जमीन पर हुई थी और प्रशासन के अनुमान के अनुसार वहां लगभग 1,700 ढांचे थे, जिनमें करीब 1,400 परिवार रहते थे। कार्रवाई के दौरान पथराव और लाठीचार्ज की घटनाएं भी हुई थीं।
मुआवजा और पुनर्वास अधूराः प्रभावित निवासी अब भी पुनर्वास और मुआवजे को लेकर सवाल उठा रहे हैं। धुबरी के निवासी अब्दुर राशिद शेख ने Scroll को बताया कि सरकार ने परियोजना स्थल को “जबरन बेदखली अभियान” के जरिए खाली कराया और करीब 1,400 परिवारों को घर और पर्याप्त पुनर्वास के बिना छोड़ दिया। उनके मुताबिक, करीब 3,500 बीघा सरकारी जमीन के अलावा लगभग 1,700 बीघा ऐसी जमीन भी थी, जिस पर लोगों के पास भूमि के दस्तावेज थे। उनका दावा है कि जमीन के कागजात पूरे होने के बावजूद करीब आधे भू-मालिकों को अब तक मुआवजा नहीं मिला है।
प्रशासन ने प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए बैजर अलगा गांव में 300 बीघा जमीन निर्धारित की थी। साथ ही सामान दूसरी जगह ले जाने के लिए प्रत्येक प्रभावित परिवार को 50,000 रुपये की एकमुश्त सहायता देने की बात कही गई थी। लेकिन कुछ प्रभावित परिवारों ने वहां जाने से इनकार किया। उनका कहना है कि प्रस्तावित पुनर्वास स्थल ब्रह्मपुत्र के बीच स्थित निचला नदी क्षेत्र है और वे पहले ही नदी के कटाव के कारण अपना घर गंवा चुके हैं। इसलिए वे दोबारा उसी तरह के जोखिम वाले इलाके में नहीं जाना चाहते।
48,000 करोड़ रुपये की परियोजना
अडानी पावर की परियोजना में करीब 48,000 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। कंपनी के अनुसार, इसमें 800-800 मेगावाट की चार इकाइयां होंगी और परियोजना को चरणबद्ध तरीके से शुरू किया जाएगा। कंपनी ने कहा है कि निर्माण के दौरान करीब 20,000 रोजगार पैदा हो सकते हैं, जबकि संचालन शुरू होने के बाद करीब 5,000 रोजगार उपलब्ध होंगे। अडानी पावर के मुताबिक परियोजना की पहली इकाइयों का संचालन दिसंबर 2030 से चरणबद्ध तरीके से शुरू होने की योजना है।मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इसे असम की अब तक की सबसे बड़ी बिजली परियोजना बताया है। उनका कहना है कि 3,200 मेगावाट की यह परियोजना राज्य की पूरी बिजली जरूरत को पूरा करने में सक्षम होगी। सरमा ने इसे राज्य में निवेश आकर्षित करने के लिए आयोजित Advantage Assam 2.0 सम्मेलन का परिणाम भी बताया।
पर्यावरणीय मंजूरी पर भी सवाल
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की Expert Appraisal Committee ने 14 जुलाई 2026 को अडानी पावर के प्रस्तावित कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट को पर्यावरणीय मंजूरी दिए जाने की सिफारिश की थी। लेकिन इसी प्रक्रिया के दौरान कंपनी ने मंत्रालय को बताया कि परियोजना स्थल पर कोई आबादी नहीं है और इसलिए पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) से जुड़े दावे मौजूद नहीं हैं। प्रभावित परिवार इस दावे से असहमत हैं और उनका कहना है कि परियोजना स्थल को पहले ही बेदखली अभियान के जरिए खाली कराया जा चुका था।असम में बेदखली अभियान का व्यापक संदर्भ
यह घटना असम में सरकारी जमीन से बेदखली के पिछले अभियानों की पृष्ठभूमि में भी देखी जा रही है। Scroll के अनुसार, 2016 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से राज्य के विभिन्न हिस्सों में कई बेदखली अभियान चलाए गए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में बंगाली भाषी मुस्लिम परिवार प्रभावित हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2016 के बाद हुई बेदखली कार्रवाइयों में कम से कम आठ मुस्लिम लोगों की गोली लगने से मौत हुई है।2025 में भी असम में बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान हुए थे। Scroll की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2025 में केवल 45 दिनों के भीतर सात अभियानों में 5,333 परिवारों के घर गिराए गए, जिनमें बड़ी संख्या बंगाली मूल के मुस्लिम परिवारों की थी। हालांकि सरकार इन कार्रवाइयों को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हटाने और जमीन को निर्धारित उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की कार्रवाई के रूप में देखती है, वहीं प्रभावित परिवार और आलोचक पुनर्वास, मुआवजे और बेदखली की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
अब विवाद का केंद्र क्या है?
अडानी पावर का 3,200 मेगावाट का प्लांट असम की ऊर्जा जरूरतों और निवेश के लिहाज से एक बड़ी परियोजना है। लेकिन इसके साथ जुड़ा भूमि विवाद भी महत्वपूर्ण है- जिस जमीन पर अब हजारों करोड़ रुपये की परियोजना खड़ी होने जा रही है, वहां कुछ समय पहले तक करीब 1,400 परिवारों के घर मौजूद थे।एक तरफ सरकार और कंपनी परियोजना से बिजली उत्पादन, निवेश और रोजगार की संभावनाओं पर जोर दे रहे हैं। दूसरी तरफ विस्थापित परिवार यह सवाल उठा रहे हैं कि परियोजना के लिए जमीन खाली कराने के बाद उनके मुआवजे और स्थायी पुनर्वास का क्या हुआ। यही विरोधाभास इस परियोजना को आर्थिक विकास के साथ-साथ भूमि अधिकार और विस्थापन के मुद्दे से भी जोड़ता है।