गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एआईयूडीएफ़ विधायक अमीनुल इस्लाम के ख़िलाफ़ लगाए गए नेशनल सिक्योरिटी एक्ट यानी एनएसए को पूरी तरह रद्द कर दिया और उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है। धिंग विधानसभा क्षेत्र से विधायक अमीनुल इस्लाम को इस साल 24 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप था कि 22 अप्रैल को जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले को उन्होंने एक राजनीतिक रैली में 'केंद्र की भाजपा सरकार की साजिश' बताया था। उन पर देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाली बीएनएस की धारा के तहत मामला दर्ज हुआ था। यह धारा पुरानी आईपीसी की देशद्रोह की धारा से मिलती-जुलती है।

इस मामले में 14 मई को उन्हें जमानत मिल गई थी, लेकिन उसी दिन नगांव जिला आयुक्त ने एनएसए के तहत हिरासत आदेश जारी कर दिया। पहलगाम हमले के बाद असम सरकार ने 'पाकिस्तान समर्थकों' के ख़िलाफ़ अभियान चलाया था, जिसमें अमीनुल इस्लाम भी शामिल थे। कुल 58 लोगों को इस अभियान में गिरफ्तार किया गया था।
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हिरासत आदेश पूरी तरह अवैध: हाईकोर्ट

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी एआईयूडीएफ़ विधायक अमीनुल इस्लाम का मामला हाईकोर्ट पहुँचा। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस राजेश मझूमदार की खंडपीठ ने गुरुवार को सुनाए गए और शुक्रवार को जारी विस्तृत फैसले में कहा गया कि अमीनुल इस्लाम ने 23 मई 2025 को एनएसए हिरासत के खिलाफ अपना प्रतिवेदन दाखिल किया था, लेकिन उसे संबंधित अधिकारियों तक पहुँचाने में 12 दिन की अकथनीय देरी की गई। फ़ैसले में कहा गया है कि जेल अधीक्षक ने प्रतिवेदन उसी दिन आगे भेज दिया था, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट और राज्य सरकार ने कोई सफ़ाई नहीं दी कि 12 दिन क्यों लगे।

अदालत ने फ़ैसले में कहा कि सबसे बड़ी खामी यह थी कि हिरासत के 23 दिन बाद तक विधायक को यह भी नहीं बताया गया कि उनके पास केंद्र सरकार को प्रतिवेदन करने का अधिकार है। केंद्र सरकार ने जब राज्य सरकार को इसकी याद दिलाई, तब जाकर यह अधिकार बताया गया।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले केएम अब्दुल्ला कुनही बनाम भारत सरकार का हवाला देते हुए कहा, 'प्रतिवेदन पर विचार में कोई देरी या लापरवाही संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है और हिरासत को अवैध बना देती है।' कोर्ट ने साफ़ कहा, 'इन दोनों कारणों से ही एनएसए हिरासत आदेश पूरी तरह गड़बड़ हो जाता है। अन्य बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत नहीं।'
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सरकार के रवैये पर सवाल

फ़ैसले में कोनसम ब्रोजेन सिंह बनाम मणिपुर राज्य और अन्य में कोर्ट के पिछले फैसले का हवाला दिया गया कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को हिरासत के आदेश के खिलाफ रिप्रेजेंटेशन देने का जल्द से जल्द मौका पाने का अधिकार है। हिरासत में लेने वाली अथॉरिटी की यह संवैधानिक ज़िम्मेदारी है कि वह हिरासत में लिए गए व्यक्ति को इस अधिकार के बारे में बताए। ऐसा न करने पर 'नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 के नियमों के तहत भी जारी हिरासत आदेश रद्द हो जाता है'।

फैसले में कहा गया, 'मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता द्वारा फाइल किए गए रिप्रेजेंटेशन से निपटने में किसी भी अथॉरिटी द्वारा लगाए गए समय का कोई कारण नहीं बताया गया है। इसके साथ ही, याचिकाकर्ता को हिरासत में लेने वाली अथॉरिटी के सामने रिप्रेजेंटेशन देने के उसके अधिकार के बारे में कभी नहीं बताया गया और इसके अलावा, केंद्र सरकार के सामने रिप्रेजेंटेशन देने के उसके अधिकार के बारे में उसे तब पता चला जब केंद्र सरकार ने असम सरकार के एडिशनल सेक्रेटरी को याद दिलाया, जिसकी एक कॉपी नागांव के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को भी दी गई थी।'
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'जेल से ही लड़ेंगे चुनाव'

इस महीने की शुरुआत में एआईयूडीएफ़ चीफ बदरुद्दीन अजमल ने कहा था, 'अमीनुल इस्लाम पिछले आठ महीने से जेल में हैं। पहले मामले में उन्हें कुछ ही हफ्तों में जमानत मिल गई थी, लेकिन एनएसए लगाकर उन्हें साजिशन जेल में रखा जा रहा है। अगर रिहा नहीं हुए तो 2026 का विधानसभा चुनाव वे जेल से ही लड़ेंगे।'

अब तक असम में पहलगाम हमले से जुड़े भाषणों के लिए दर्ज मामलों में अमीनुल इस्लाम अकेले ऐसे विधायक थे जिन पर एनएसए लगाया गया था। हाईकोर्ट के इस फ़ैसले से बाकी मामलों में भी एनएसए की वैधता पर सवाल उठने की संभावना बढ़ गई है।