सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता या विदेशी होने का निर्धारण "निष्पक्ष, वैध और न्यायसंगत प्रक्रिया" के जरिए ही किया जाना चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नागरिकता का प्रश्न संविधान और कानून की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए इस संबंध में लिया गया कोई भी निर्णय पूरी तरह निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए।
जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने गोहाटी हाई कोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें 27 अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित करने वाले विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) के आदेशों को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी मामलों को नए सिरे से सुनवाई के लिए संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों के पास वापस भेज दिया।

नागरिकता का सवाल अत्यंत संवैधानिक महत्व काः सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि "नागरिकता और विदेशी होने की स्थिति संविधान तथा कानून के क्षेत्र में अत्यधिक महत्व रखती है।"
अदालत ने माना कि सरकार का यह वैध और महत्वपूर्ण हित है कि जो लोग कानूनी रूप से भारतीय नागरिक नहीं हैं, वे झूठे दावों, प्रक्रिया के दुरुपयोग या अनावश्यक देरी का लाभ उठाकर भारतीय नागरिकता हासिल न कर सकें।
ताज़ा ख़बरें
अदालत ने कहा, "राज्य का यह वैध और महत्वपूर्ण हित है कि जो व्यक्ति भारतीय नागरिकता के पात्र नहीं हैं, वे झूठे दावों, प्रक्रिया के दुरुपयोग या देरी का फायदा उठाकर नागरिकता प्राप्त न कर लें।" हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता की कीमत पर हासिल नहीं किया जा सकता।

निष्पक्ष, वैध और न्यायसंगत प्रक्रिया अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर निर्णय केवल ऐसी प्रक्रिया के बाद ही लिया जा सकता है जो निष्पक्ष (Fair), वैध (Lawful) और न्यायसंगत (Reasonable) हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि विदेशी अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) की धारा 9 के तहत नागरिकता साबित करने का भार (Burden of Proof) अब भी संबंधित व्यक्ति पर ही रहेगा। इस कानूनी प्रावधान में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने अपीलकर्ताओं के भारतीय नागरिक होने के दावों की सत्यता पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अदालत ने कहा, "हमने अपीलकर्ताओं के नागरिकता संबंधी दावों की मेरिट, उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता, स्वीकार्यता, प्रासंगिकता या पर्याप्तता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। इन सभी प्रश्नों का स्वतंत्र रूप से संबंधित न्यायाधिकरण ही निर्णय करेगा।"

दोबारा सुनवाई का मतलब राहत नहीं

बेंच ने यह भी साफ किया कि मामलों को वापस भेजने का अर्थ यह नहीं है कि अपीलकर्ताओं को कोई विशेष राहत या कानूनी लाभ दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "मामलों को वापस भेजने का उद्देश्य किसी ऐसे व्यक्ति को लाभ पहुंचाना नहीं है जो अपनी नागरिकता साबित करने में असफल रहता है। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर परिणाम विदेशी अधिनियम, 1946, विदेशी (न्यायाधिकरण) आदेश, 1964 तथा संविधान द्वारा निर्धारित निष्पक्ष प्रक्रिया के अनुरूप ही हो।"

हाई कोर्ट और ट्रिब्यूनल के सभी आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने गौहाटी हाई कोर्ट के फैसलों के साथ-साथ संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों द्वारा पारित सभी आदेशों को भी रद्द कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया, "संबंधित विदेशी न्यायाधिकरण इन मामलों की नए सिरे से सुनवाई करेंगे और पहले दिए गए हाई कोर्ट या न्यायाधिकरण के किसी भी अवलोकन से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से फैसला करेंगे।" 

क्या था पूरा मामला?

यह मामला उन 27 लोगों से जुड़ा है जिन्हें विदेशी न्यायाधिकरण ने एकतरफा (Ex Parte) आदेश के जरिए विदेशी घोषित कर दिया था।
इन लोगों ने इस आदेश को गोहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं। हाई कोर्ट ने कहा था कि:
  • संबंधित लोगों को विधिवत नोटिस भेजे गए थे।
  • इसके बावजूद वे न्यायाधिकरण के सामने पेश नहीं हुए।
  • विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले को लगभग 23 वर्ष बाद चुनौती दी गई।
  • किसी भी याचिकाकर्ता ने लिखित जवाब, दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।                                                                          इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने माना था कि विदेशी न्यायाधिकरण के पास उन्हें विदेशी घोषित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।                 

हाई कोर्ट ने धारा 9 का दिया था हवाला

गोहाटी हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 का उल्लेख करते हुए कहा था कि भारतीय नागरिक होने का प्रमाण देने की पूरी जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की होती है, क्योंकि उससे जुड़े तथ्य उसी के विशेष ज्ञान में होते हैं। हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि मामला एकतरफा चल रहा हो, तब भी प्रमाण प्रस्तुत करने का दायित्व संबंधित व्यक्ति पर ही रहता है। यदि वह कोई साक्ष्य पेश नहीं करता तो विदेशी न्यायाधिकरण उसके खिलाफ उपलब्ध संदर्भ (Reference) के आधार पर उसे विदेशी घोषित कर सकता है।
साथ ही हाई कोर्ट ने यह भी माना था कि विदेशी अधिनियम के तहत कार्यवाही केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं हो सकती और संबंधित व्यक्ति को भारतीय नागरिकता साबित करने का उचित अवसर मिलना चाहिए। लेकिन अदालत ने कहा था कि यह अवसर अनंतकाल तक नहीं दिया जा सकता, विशेषकर तब जब कई अवसर दिए जाने के बावजूद उनका उपयोग न किया जाए।
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्व

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विशेष रूप से असम में विदेशी नागरिकों की पहचान से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने एक ओर जहां यह स्पष्ट किया कि नागरिकता साबित करने का कानूनी दायित्व संबंधित व्यक्ति पर ही रहेगा, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित किया कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर निर्णय केवल निष्पक्ष, पारदर्शी और संविधानसम्मत प्रक्रिया के बाद ही लिया जा सकता है।
अब इन सभी 27 मामलों की सुनवाई संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों में नए सिरे से होगी और वे स्वतंत्र रूप से उपलब्ध साक्ष्यों तथा कानून के आधार पर फैसला करेंगे।