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राहुल की असली चुनौती शुरू होती है... अब

बीजेपी के वे नेता जो राहुल गाँधी का ‘पप्पू’ कहकर मज़ाक उड़ाया करते थे, आज उन्हीं के सामने पस्त हैं। मोदी-शाह जैसे कुशल नेताओं और बीजेपी के स्टार प्रचारकों के सामने ‘अकेले’ डटे राहुल ने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दीं, जहाँ अब बीजेपी को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने की ज़रूरत आन पड़ी है। लेकिन क्या अब राहुल की चुनौतियाँ ख़त्म हो गईं?
पुरुषोत्तम अग्रवाल

तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे के राजनीतिक निहितार्थों की चर्चा करने के पहले इसके सांस्कृतिक रूप से शुभ परिणामों को नोट कर लेना चाहिए। कितना रोचक है संबित पात्रा को सभ्यता का पाठ पढ़ाती उन ऐंकर महोदया को देखना जो स्वयं बदतमीज़ी की पाठशाला पिछले कई सालों से चलाती रही हैं। कितना सुखदायी है, इतने बरसों बाद बीजेपी के प्रवक्ताओं को सामान्य स्वर में बात करते सुनना, और कितना रोचक है उनका यह प्रयत्न देखना कि इन चुनावों से मोदी जी की लोकप्रियता के गिरने-उठने का कोई संबंध न जुड़ने पाए। 

वास्तविकता यह है कि अपने स्वभाव के अनुरूप मोदीजी ने इस चुनाव को अपने ऊपर स्वयं ही केन्द्रित कर लिया था, राजस्थान में तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा ही था कि आप मुझे वोट दें। इस आह्वान में संकेत निहित था कि भले ही आप वसुंधरा राजे से नाराज हों, लेकिन मुझसे तो नहीं हैं ना, सो मेरे नाम पर वोट दें। इस लिहाज़ से राजस्थान के नतीजे एक मायने में बीजेपी के भीतर मोदी-शाह के मुक़ाबिल वसुंधरा राजे की ताक़त का सबूत भी देते हैं। सब जानते हैं कि वहाँ टिकट वितरण में उन्होंने अमित शाह की नहीं चलने दी थी, और अब वे वाज़िब रूप से यह कह सकती हैं कि इतने स्पष्ट असंतोष के बावजूद राजस्थान में भाजपा का सूपड़ा साफ़ नहीं होने दिया है। बाद के दिनों में आरएसएस ने भी स्थिति की गंभीरता समझते हुए, वसुंधरा राजे से अपनी नाराज़गी को दरकिनार करते हुए बीजेपी को जिताने में जी-जान लगा दी थी। इसी तरह, मध्य प्रदेश में ज़बरदस्त सत्ताविरोध की बातों के बावजूद कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत न मिल पाना न केवल संघ/बीजेपी की संगठन क्षमता का बल्कि शिवराज सिंह चौहान के अपने सामर्थ्य का भी परिचय देता है। दूसरे शब्दों में, इन चुनावों का एक अर्थ यह भी है कि अब बीजेपी में मोदी-शाह की मनमानी पर कुछ रोक तो लगेगी।

लोकसभा चुनाव पर असर

तेलंगाना और मिज़ोरम का निस्संदेह अपना महत्व है, लेकिन बीजेपी के कोण से देखें तो तीन हिन्दीभाषी राज्यों में उसके जन-समर्थन में कमी आना निश्चय ही खतरे की घंटी है। छत्तीसगढ़ ने तो सारे अनुमानों को झुठलाते हुए कांग्रेस को तीन-चौथाई बहुमत दे दिया है। इसका अपना महत्व है, क्योंकि यहाँ बात विकास के नाम पर संसाधनों की लूट और आदिवासियों को बर्बाद करने की तो थी ही, अजीत जोगी की न्यूसेंस वैल्यू की भी थी। अब कांग्रेस छत्तीसगढ़ में पूरे आत्मविश्वास से आगे बढ़ सकती है। बाक़ी दो राज्यों में कांग्रेस की जीत में वह चमक नहीं है, वह बस काँटे की टक्कर में थोड़ा-सा आगे होने का ही संतोष हासिल कर सकी है। फिर भी कुल मिला कर यह तो स्पष्ट है कि लोक-सभा चुनावों में इन राज्यों में कांग्रेस अब बीजेपी के सामने नए आत्मविश्वास के साथ जाएगी। 

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ठीक एक साल पहले राहुल गाँधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। इस एक साल में उन्होंने साबित कर दिया कि अब वे बेमन से राजनीति कर रहे व्यक्ति से जनता की नब्ज़ तक पहुँचने की कोशिश कर रहे परिपक्व राजनेता में बदल रहे हैं। मीडिया के बड़े हिस्से द्वारा निभाई गई दरबारी भूमिका के बावजूद, कांग्रेस संगठन की पतली हालत के बावजूद और उनके ही नहीं, उनके पूरे परिवार के विरुद्ध चलाए गये अश्लील कुत्सा-अभियान के बावजूद राहुल अंतत: एक सक्षम नेता के रूप में अपने-आपको स्थापित कर सके, यह साधारण उपलब्धि नहीं।
अब, ऊपर-ऊपर जो चाहे कहते रहें, बीजेपी और संघ राहुल को हलके में नहीं ले सकते। गुजरात और कर्नाटक से लेकर इन विधानसभा चुनावों तक यह बात तो स्पष्ट हो गई है।

अब भाषा का स्तर संभलेगा?

बीजेपी के मोदी-शाह युग की एक विशेषता यह भी है कि जिह्वा पर नियंत्रण को गुण नहीं, दुर्गुण माना जाने लगा है। आम तौर से माना जाता है कि राजनेता जितने बड़े पद पर पहुँचता है, उसकी भाषा उतनी ही मर्यादित और बातचीत उतनी ही सीमित होती जाती है, होती जानी चाहिए। मोदी जी इस नियम के अपवाद हैं। पिछले गुजरात चुनाव में वे मनमोहन सिंह पर पाकिस्तान के साथ साज़िश करने का आरोप लगा चुके हैं। उन्हें यह गौरव भी प्राप्त है कि जब मुंबई में आतंकवादी हमला चल रहा था, ऐन उसी पल वे देश के प्रधानमंत्री के विरुद्ध शुद्ध राजनैतिक बयानबाज़ी कर रहे थे। इन चुनावों में वे ‘पचास करोड़ की गर्ल फ्रेंड’ से तरक्की कर ‘कांग्रेस की विधवा’ जैसी शब्दावली तक पहुँचे। यदि ऐसी शब्दावली के बावजूद बीजेपी इन तीन राज्यों में वापसी करती तो आप कल्पना कर सकते हैं कि राजनैतिक शब्दावली का पतन किस धरातल तक पहुँचता। 

कांग्रेसमुक्त या अहंकारमुक्त?

मोदीजी और शाहजी से तो नहीं, बीजेपी के अन्य नेताओं से उम्मीद की जा सकती है कि वे इस बात पर विचार करें। ख़ास कर यह ध्यान रखते हुए कि नोटबंदी के तुगलक़ी फ़रमान के नतीजों की ज़िम्मेवारी से अब सभी लोग कतरा रहे हैं। मोदी जी के अपने चुनिंदा लोग इस्तीफ़े दे कर जा रहे हैं। योगी आदित्यनाथ का ‘नाम बदलो, बेतुकी बातें करो’ अभियान रंग नहीं ला पा रहा है। कांग्रेसमुक्त भारत के सपने देखने वाला बड़बोलापन मुँह की खा रहा है। इस प्रसंग में सबसे बढ़िया टिप्पणी पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा की है -‘ देश कांग्रेसमुक्त होने की ओर नहीं, अहंकारमुक्त (ऐरोगेंस फ़्री) होने की ओर बढ़ रहा है।’ 

कांग्रेस की रणनीति

हिन्दीभाषी राज्यों में कांग्रेस की सत्ता-वापसी ज़ाहिर है कि कांग्रेस के लिए उत्साहवर्धक है, लेकिन लोकसभा चुनावों में मुद्दे अलग ढंग से आएँगे। बीजेपी अपने कोर अजेंडा यानी सांप्रदयिक ध्रुवीकरण पर और तेज़ी से आएगी, मोदी-शाह की तो यह लाइन है ही, यह बीजेपी के मूल स्वभाव के भी अनुकूल है। ऐसे में कांग्रेस किस तरह की रणनीति अपनाती है, देखने की बात यह होगी। राहुल गाँधी को ख़ारिज करना तो अब ख़ैर किसी के लिए मुमकि़न नहीं, लेकिन उनकी असली चुनौती शुरू होती है अब।

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