जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने जिस सेक्यूलर एजेंडे पर चलने का दावा करते रहे हैं, ऐसा लगता है कि अब उसकी अंतिम दीवार भी ढहने वाली है। इसकी वजह बनी है केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की वह घोषणा जिसमें उन्होंने 2029 से पहले 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की बात की है। यह 21 वैसे राज्य हैं जहां या तो भारतीय जनता पार्टी की सरकार है या वह वहां दूसरी पार्टियों के साथ सरकार चल रही है।
नीतीश का आख़िरी क़िला
ध्यान रहे कि इससे पहले सीएए, ट्रिपल तलाक़ और अनुच्छेद 370 जैसे कई ऐसे मामले रहे हैं जिन पर जेडीयू ने पहले तो यह स्टैंड लिया कि वह इसका समर्थन नहीं करेगा लेकिन बाद में नीतीश कुमार ने इन सभी मुद्दों पर समझौता कर लिया। ध्यान रहे कि नीतीश कुमार यह जताने-बताने की कोशिश करते रहे हैं कि वह भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनाने के बावजूद उसके ऐसे मुद्दों पर उसके साथ नहीं हैं जिनसे उनकी सेक्युलर छवि को नुकसान पहुंचेगा। यही नहीं जब वक्फ संशोधन बिल का मुस्लिम समुदाय ने भारी विरोध किया तब भी नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी की नीति का समर्थन कर दिया। अब बारी उनके संभवतः अंतिम सेक्युलर किले पर है यानी बिहार में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना। ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नीतीश कुमार के इस किले को भी ढाहने की तैयारी पूरी कर चुके हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने न केवल भारतीय जनता पार्टी के शासन वाली सरकारों में बल्कि भाजपा के साथ दूसरी पार्टियों के सहारे चल रही एनडीए सरकार में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की बात कही तो बिहार में इस पर प्रतिक्रिया होनी थी। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जनता दल यूनाइटेड ने समान आचार संहिता (यूसीसी) का हमेशा से विरोध किया है। इसके बावजूद केंद्रीय गृह मंत्री ने अगर यह ऐलान किया तो दरअसल जनता दल यूनाइटेड को भी एक संदेश मिला कि अब उसके एक और एजेंडे को भारतीय जनता पार्टी खत्म करने वाली है।
नीतीश के क़रीबियों की क्या राय?
चूंकि लंबे समय से नीतीश कुमार की सेहत सही नहीं मानी जा रही है इसलिए उनकी ओर से किसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं है लेकिन उनके द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा भी इस मामले पर चुप्पी साधे हैं और अभी उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार है। संजय झा को पहले से ही भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा के निकट माना जाता है लेकिन जदयू में जो लोग नीतीश कुमार की विचारधारा के करीब हैं, वह अमित शाह द्वारा सभी एनडीए शासित राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की इस घोषणा से बिल्कुल नाराज दिख रहे हैं। फिलहाल जदयू के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री श्याम रजक का बयान साफ तौर पर इसके खिलाफ आया है लेकिन यह कहना मुश्किल है कि उनका विरोध किस हद तक टिक पाएगा। बहरहाल, श्याम रजक का कहना है कि उनके नेता (नीतीश कुमार) ने साफ तौर पर यह कहा था कि बिहार में यूसीसी को लागू होने नहीं देंगे और “हम इस पर कायम हैं।”
श्याम रजक ने यह बात भी याद दिलाई कि बिहार में भले ही भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री है, लेकिन सरकार एनडीए की है और जेडीयू समेत कई राजनीतिक दल इसके घटक हैं। दूसरी तरफ जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने अपने बयान में कुछ और संकेत देते हुए कहा कि पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा इस विषय पर केंद्रीय गृह मंत्री से बात करेंगे। इस बात पर शक है कि संजय झा अमित शाह को बिहार में यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं लागू करने पर राजी कर पाएंगे या वह इसके लिए पूरे मन से कोशिश भी करेंगे।
इस मामले में जीतन राम मांझी और उनके बेटे, जो अपनी पार्टी हिंदुस्तानी एवं मोर्चा के अध्यक्ष भी हैं, संतोष सुमन साफ तौर पर भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे के साथ नजर आते हैं। हालांकि पार्टी के संरक्षक जीतन राम मांझी का कोई बयान सामने नहीं आया है लेकिन संतोष सुमन ने इस मसले को आरक्षण में कोटे में कोटा से जोड़ते हुए बयान दिया है। ऐसा लगता है कि वह इस बात के लिए तो तैयार हैं कि उनकी पार्टी बिहार में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे का समर्थन करेगी लेकिन शायद वह इसके बदले यह चाहते हैं कि सरकार कोटे में कोटा का प्रावधान जल्द से जल्द आए।
चिराग समर्थन या विरोध में?
इस मुद्दे पर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी सीधे तौर पर कोई विरोध नहीं जताया है। वह यह जरूर कह रहे हैं कि भारत का सामाजिक ताना-बाना विविधतापूर्ण है और हर वर्ग की अपनी परंपराएं और रीति रिवाज हैं। इस मामले में वह संविधान की पांचवीं व छठी अनुसूची, अनुच्छेद 371 ए और 371 जी में अनुसूचित जनजातियों को दी गई छूट की चर्चा करते हैं। इससे यह सवाल पैदा होता है कि जिस तरह भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करते वक्त अनुसूचित जनजातियों को छूट दी है, क्या उसी तरह चिराग पासवान बिहार में भी इस छूट के साथ यूसीसी के लिए तैयार हो जाएंगे?
इसी तरह भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से खुद राज्यसभा जाने वाले और अपने पुत्र को विधान परिषद का सदस्य बनवा कर मंत्री पद दिलवाने वाले राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा भी अमित शाह के इस प्रस्ताव का साफ-साफ विरोध करते नहीं दिखते हैं। फिलहाल वह यह चाहते हैं कि केंद्र सरकार का क्या प्रस्ताव है, वह सामने आए तो उस पर उनकी पार्टी विचार विमर्श करे। सवाल यह है कि क्या उपेंद्र कुशवाहा इतने अनजान हैं कि उन्हें यह नहीं मालूम कि भारतीय जनता पार्टी यूसीसी में क्या प्रावधान लेकर आएगी? इस तरह भारतीय जनता पार्टी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के यूसीसी प्लान के लिए बिहार में एनडीए के घटक दलों द्वारा बहुत ही क्षीण विरोध की उम्मीद है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जदयू के बाकी नेताओं और उसके राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा का इस मसले पर क्या रुख रहता है। अगर हम जेडीयू और नीतीश कुमार के पुराने रवैयों को ध्यान में रखें तो इसकी संभावना ज्यादा है कि नीतीश कुमार के साथ सेक्यूलरिज्म का जो आखरी तमगा बचा हुआ था वह भी गायब हो जाएगा।