बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी ने खुद ही अपना प्रत्याशी बदलकर इसे प्रतिष्ठा वाला उपचुनाव बना दिया है। यह उपचुनाव प्रशांत किशोर के राजनीतिक अस्तित्व का भी फैसला करेगा। बीजेपी क्या उन्हें कामयाब होने देगी। वरिष्ठ पत्रकार समी अहमद की रिपोर्टः
पटना के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से प्रशांत किशोर के नामांकन दाखिल करने के बाद यह उनके लिए जय या क्षय का सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।
पिछले तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी की पिता-पुत्र के कब्जे वाली सीट पर नामांकन के पहले ही अगर कहीं घबराहट दिखाई तो वह भाजपा ही थी जिसे अपना उम्मीदवार बदलना पड़ा। तीसरी तरफ आरजेडी की रेखा कुमारी (गुप्ता) हैं जो पार्टी के स्टार प्रचारक तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति में अकेले खूंटा गाड़ने की कोशिश में लगी हुई हैं।
इस सीट पर उपचुनाव इसलिए हो रहा है कि यहां के तत्कालीन विधायक नितिन नवीन ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बनाए जाने की वजह से और राज्यसभा भेजे जाने के मद्देनजर विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दिया था।
इस तरह इस सीट की एक पहचान यह बन गई है कि अब यह सीट भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट है और अगर यहां से उनकी पार्टी हारती है तो न सिर्फ नितिन नवीन के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाएगा बल्कि सम्राट चौधरी के लिए भी सवाल खड़े होंगे क्योंकि उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी बिहार में पहला चुनाव लड़ रही है।
पीके यानी प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी पिछली बिहार विधानसभा चुनाव में जिस तरह सभी सीटों पर हार की शिकार हुई थी और जैसे वह अपने दावों में नाकाम होने के बाद राजनीति से संन्यास लेने का वादा कर चुके थे, उसे देखते हुए यह लगता है कि उन्होंने इस बार एक ऐसा जोखिम उठाया है जिसमें हार या जीत उनके राजनीतिक करियर के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव कितना महत्वपूर्ण है इसका एक नज़ारा सोमवार को भी देखने को मिला जब उनकी नामांकन यात्रा में उनकी पार्टी ने पूरा दम खम दिखाया और कई मौके पर तो भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों से तनावपूर्ण स्थिति भी बनी।
एक दिलचस्प बात यह है कि नामांकन के बाद राजनीतिक समीकरणों की चर्चा थोड़ी देर के लिए पीछे चली गई और इस बात को खूब प्रचार मिला कि प्रशांत किशोर की आमदनी और उनकी शिक्षा क्या है। ध्यान रहे कि प्रशांत किशोर बाद में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बारे में चुनाव से ठीक पहले शिक्षा पर सवाल उठा चुके थे तो जवाब में उनकी शिक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए गए थे। मोटे तौर पर यह पता चला कि प्रशांत किशोर और उनकी पत्नी के पास लगभग 200 करोड़ रुपए की संपत्ति है। उनकी डॉक्टर पत्नी उनसे ज्यादा अमीर हैं और प्रशांत किशोर ने बड़े पैमाने पर शेयर बाजार में पैसे लगा रखे हैं। एक दिलचस्प बात यह भी है कि प्रशांत किशोर की कंपनी ने जन सुराज पार्टी को 85 करोड़ और जन सुराज फाउंडेशन को 50 लाख रुपये का दान दिया है।
प्रशांत किशोर ने अपनी शिक्षा के बारे में बताया है कि उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा 1991 में बक्सर के स्कूल से पास की जबकि इंटरमीडिएट पटना के मशहूर साइंस कॉलेज से किया। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीबीए और हैदराबाद से मास्टर इन हेल्थ केयर मैनेजमेंट की डिग्री हासिल करने की जानकारी दी है। इस समय बिहार में उनके हेल्थ केयर मैनेजमेंट की पढ़ाई और विश्व स्वास्थ्य संगठन में उनके काम करने के बारे में भी काफी बहस चल रही है।
बहरहाल, बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के लिए लगभग दो दर्जन उम्मीदवार मैदान में हैं लेकिन इस चुनाव में जो सबसे अहम बात लगती है, वह यह है कि प्रशांत किशोर एक और जहां सबसे चर्चित उम्मीदवार हैं तो दूसरी और पार्टी के स्तर पर भारतीय जनता पार्टी सबसे मजबूत नजर आती है। याद रखने की बात यह है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में राजद की रेखा कुमारी ने 46 हजार से ज्यादा वोट पाए थे लेकिन नितिन नवीन ने 98 हजार से ज्यादा वोट लाकर जीत हासिल की थी।
इस सीट पर नितिन नवीन 2010 से चुनाव लड़ते आ रहे हैं और हर चुनाव में उन्हें जीत हासिल हुई है। इससे पहले यह सीट पटना पश्चिम के नाम से कहलाती थी और वहां उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने चार बार जीत हासिल की थी। इस तरह देखा जाए तो 1995 से 2026 तक इन्हीं पिता-पुत्र का इस सीट पर कब्जा रहा है। 2006 में पिता के निधन के बाद हुए उपचुनाव में पटना पश्चिम से पहली बार नितिन नवीन ने जीत हासिल की थी।
2025 के विधानसभा चुनाव और 30 जुलाई को होने वाले उप चुनाव में उम्मीदवार के स्तर पर बुनियादी फर्क यह है कि भारतीय जनता पार्टी के पास एक मजबूत उम्मीदवार था और मजबूत विपक्ष में केवल राजद की रेखा कुमारी ही थीं। इस बार भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के बारे में वह बात तो बिल्कुल नहीं कहीं जा सकती जो नितिन नवीन में थी। सबसे अहम बात यह की अपनी रणनीति और तैयारी के लिए मशहूर भारतीय जनता पार्टी को शायद पहली बार इस तरह बिहार में अपना उम्मीदवार बदलना पड़ा। पहले उसने अभिषेक कुमार सिन्हा बंटी को अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन नामांकन के एक ही दिन बाद बंटी ने घबराहट में प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह ऐलान किया के वह पारिवारिक कारणों से उम्मीदवारी वापस ले रहे हैं।
यह एक ऐसा ऐलान था जिसके बारे में आम लोगों की राय यह है कि शायद वह भी जानते हैं कि यह सही वजह नहीं थी। वैसे तो कहा यह जा रहा है कि उनके माता-पिता का नाम चारा घोटाले में था, इसलिए पार्टी ने उनसे नाम वापस करने को कहा लेकिन यह बात इसलिए सही नहीं मालूम होती क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत डॉक्टर जगन्नाथ मिश्रा भी चारा घोटाले में सजा पा चुके थे, इसके बावजूद उनके पुत्र नीतीश मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर न केवल चुनाव जीत कर आए बल्कि मंत्री भी बनाए गए।
एक दूसरी राय यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने जमीनी कार्यकर्ता के नाम पर बंटी को टिकट तो दे दिया लेकिन स्थानीय तौर पर ही उनका काफी विरोध हुआ जिसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने उनका चुनाव से हटाने का फैसला किया। 10 जुलाई को एनडीए की बैठक हुई और उसके कुछ देर बाद यह ऐलान किया गया। उनकी जगह एक और कायस्थ नेता नीरज सिन्हा को पार्टी का टिकट दिया जिन्होंने 13 जुलाई को नामांकन कर लिया। नीरज को भी जन सुराज पार्टी ने मजाक का निशाना बनाया और उन्हें ‘पकड़ुआ’ उम्मीदवार बताया।
इस वजह से कई लोग यह मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी कम से कम इस चुनाव का पहला चरण हार चुकी है और अब अपनी पार्टी के दम पर उसे जीत मिल जाए तो अलग बात है। भारतीय जनता पार्टी को अपने संगठन के अलावा शायद कायस्थ और दूसरे परंपरागत समर्थकों से ज्यादा उम्मीद है। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग तीन लाख 79 हजार है। बताया जाता है कि इसमें सवर्ण जातियां लगभग 33% है जो भारतीय जनता पार्टी के परंपरागत समर्थक माने जाते हैं। अकेले कायस्थ समुदाय की आबादी लगभग 14% बताई जाती है जिन्हें इस सीट पर सबसे निर्णायक माना जाता है।
वैश्य समुदाय का वोट भारतीय जनता पार्टी को उम्मीदवार के नाम की वजह से नहीं बल्कि पार्टी के नाम की वजह से मिल सकता है जिनकी आबादी लगभग 9% है। इस 9% वोट पर वैश्य समाज से आने वाली राजद की रेखा गुप्ता की भी अच्छी पकड़ मानी जाती है। इसके अलावा 12% यादव और करीब 10% मुस्लिम समुदाय से भी उन्हें उम्मीद होगी। हालांकि रेखा गुप्ता की सबसे बड़ी परेशानी यह मानी जा रही है कि उनके पक्ष में तेजस्वी यादव मैदान में नहीं उतर पाए हैं क्योंकि वह इस समय विदेश के दौरे पर हैं।
जातीय समीकरण के लिहाज से देखा जाए तो प्रशांत किशोर के पास अपना कोई वोट बैंक नहीं है लेकिन बताया जाता है कि उनकी टीम ने इस बार मुस्लिम समुदाय में जगह बनाने की काफी कोशिश की है। प्रशांत किशोर अक्सर यह दलील देते हैं कि बिहार में जाति के नाम पर वोट नहीं पड़ते क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर ऐसा होता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर इतनी बड़ी संख्या में लोग भारतीय जनता पार्टी को वोट नहीं देते। बांकीपुर का इलाका, और इलाकों से पढ़ा लिखा माना जाता है और यह देखने की बात होगी कि क्या वहां के लोग जातीय समीकरण से ऊपर उठकर और विचारधारा को कुछ समय के लिए अलग रखते हुए चर्चित उम्मीदवार के नाम पर प्रशांत किशोर का समर्थन करते हैं या वह पुराने ढर्रे पर ही विधायक चुनते हैं।