एक साल से भी कम समय पहले की बात है जब भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 98 हजार यानी 62% से अधिक वोट लाकर पटना में बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से लगातार चौथी बार जीत हासिल की थी। इस सीट पर नितिन नवीन से पहले उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा का कब्जा हुआ करता था लेकिन तीन दशक से जीत का परचम लहराने वाली भारतीय जनता पार्टी को उपचुनाव में 45 हजार वोट लाने में भी पसीने छूट गए और उसे 50 हजार से ज्यादा वोटों का नुकसान हुआ। इस तरह इस सीट से जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर को लगभग बीस हजार वोटों से जीत मिली।

इस उपचुनाव के लिए सभी 31 राउंड की गिनती के बाद प्रशांत किशोर को 64151 वोट आए जबकि भारत की जनता पार्टी के नीरज कुमार को 44827 वोट मिले। इस तरह प्रशांत किशोर ने 19324 मतों से जीत हासिल की और पहली बार बिहार विधानसभा के सदस्य बनेंगे। राजद की रेखा कुमारी 14085 वोट ला सकीं।
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यह चुनाव मोदी-शाह को संदेश: प्रशांत

प्रशांत किशोर ने जीत हासिल करने के बाद अपने पहले बयान में बांकीपुर की जनता का आभार व्यक्त करने के बाद कहा कि जिन्होंने उन्हें वोट दिया है उनके लिए और जिन्होंने नहीं दिया है, उनके लिए भी जो कुछ भी बन पड़ेगा वह करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि यहां का चुनाव केवल विधायक चुनने का नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक संदेश देने का था। उन्होंने इस मौके पर खास तौर बच्चों की पढ़ाई और रोजगार का मसला उठाया। सबसे अहम बात उन्होंने यह कही कि बीजेपी को बिहार में किसी अच्छे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए। ध्यान रहे कि प्रशांत किशोर बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी को दागी बताते हैं और उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ रहे हैं।

बीजेपी में यह हार किसकी?

बीजेपी की इस हार में अगर सबसे कम चर्चा होगी तो वह होगी उसके उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा की। इस हार की चर्चा के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ-साथ नए-नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, पटना साहिब सीट के बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद और खुद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी रहेंगे। यह सही है कि इस उपचुनाव में सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह हिस्सा नहीं ले रहे थे लेकिन जैसे हर जीत का श्रेय उन्हें दिया जाता है, वैसे ही इस हार के लिए भी उनकी लोकप्रियता में कमी को कारण माना जाएगा। यह भी कहा जा सकता है कि बीजेपी के लिए हर सीट पर उन दोनों के नाम पर जीत हासिल करने का दौर धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है।

नितिन नवीन और सम्राट चौधरी दोनों के लिए पद ग्रहण करने के बाद यह पहला चुनाव था और वह उसी में हार गए। इसके साथ ही यह बात भी चर्चा में रहेगी कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद भारतीय जनता पार्टी पहले ही चुनावी इम्तिहान में फेल कर गई।

हालाँकि भारतीय जनता पार्टी ने नीतीश कुमार और उनके बेटे निशांत कुमार का वीडियो संदेश जारी कर बीजेपी को वोट देने की अपील कराई थी लेकिन ऐसा लगता है कि इस अपील ने कोई काम नहीं किया।

प्रशांत किशोर 2025 के विधानसभा चुनाव में खुद तो उम्मीदवार नहीं बने थे लेकिन उनके सभी उम्मीदवार बुरी तरह पराजित हुए थे और विधानसभा में उनकी पार्टी का खाता भी नहीं खुला था। प्रशांत किशोर ने जब इस सीट पर उपचुनाव लड़ने की घोषणा की तो लोग उन्हें सबसे मज़बूत उम्मीदवार तो मान रहे थे लेकिन इस बात को लेकर शक था कि क्या वह भारतीय जनता पार्टी के ‘तंत्र’ के आगे टिक पाएंगे। फ़िलहाल इस सवाल का जवाब हां में मिला है। इसकी वजह यह थी कि बीजेपी का उम्मीदवार भले ही कमजोर था लेकिन पार्टी के तौर पर वह सबसे मज़बूत थी और आरएसएस का समर्थन भी उसके साथ रहता ही है।
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नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई थी सीट

यह बात सबको पता है कि नितिन नवीन को युवा चेहरा बताकर भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय करने के नाम पर उन्हें बांकीपुर सीट से इस्तीफा देना पड़ा। तब यह बात इस तरह प्रचारित की गई कि भारतीय जनता पार्टी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ऐसे रणनीतिकार हैं जो किसी को भी कहीं से उठाकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकते हैं और उनकी खाली सीट पर कोई भी जीत सकता है। चुनाव के दौरान इस बात की बहुत चर्चा रही कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने यह बयान दिया कि उनकी पार्टी की तरफ़ से कोई “कुत्ता-बिल्ली भी खड़ा हो जाए तो उसे जीत मिलेगी ही।” प्रशांत किशोर ने भी इस बात की खूब चर्चा की।

नितिन नबीन

प्रशांत किशोर ने इस उपचुनाव के लिए लगभग दो महीने पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। इसके बाद से कई ऐसी बातें हुईं जो उनके पक्ष में गई और भारतीय जनता पार्टी की घबराहट सामने आती रही। यह बात शुरू से चर्चा में रही कि कैसे भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवार अभिषेक कुमार का नाम रातों-रात वापस ले लिया और फिर नीरज कुमार सिन्हा को वहां नया उम्मीदवार बनाया। प्रशांत किशोर ने इस बार जो मेहनत की इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने कार्यकर्ताओं के लिए वह विधानसभा क्षेत्र के एक थाने में जाकर बैठ गए और थानेदार से काफी बहस भी की।

आरजेडी की हार कैसे हुई?

इधर, पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाली आरजेडी की रेखा कुमारी उर्फ रेखा गुप्ता के साथ समस्या यह हुई कि उनके स्टार प्रचारक तेजस्वी यादव ठीक चुनाव के वक्त विदेश के दौरे पर थे और वह आखिरी तीन-चार दिन तक ही उनके पक्ष में प्रचार कर सके। हालाँकि प्रशांत किशोर का विपक्ष के चेहरे के तौर पर उभरना बिहार में तेजस्वी यादव के लिए एक गंभीर चुनौती मानी जाती है लेकिन ऐसा लगता है कि राजद ने उन्हें हराने के लिए बहुत गंभीर प्रयास नहीं किए। इससे राजद के परंपरागत वोटों का बिखरा हुआ और मुस्लिम मतदाताओं को यह लगा कि भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए बेहतर उम्मीदवार प्रशांत किशोर ही हैं। मुसलमानों का एक वर्ग अब भी प्रशांत किशोर को भारतीय जनता पार्टी की बी टीम मानता है लेकिन उसके बड़े हिस्से के लिए प्रशांत किशोर के नाम में आकर्षण था और वह हर हाल में भारतीय जनता पार्टी को हराने वाले उम्मीदवार के साथ जाना चाहते थे।

जंतर मंतर का जेन जी आंदोलन

प्रशांत किशोर के लिए किस्मत की बात यह भी रही कि ठीक चुनाव के दौरान दिल्ली के जंतर मंतर पर जेन जी का आंदोलन हुआ और बिहार में भी छात्रों ने उग्र प्रदर्शन किया। ध्यान रहे कि बिहार में मेडिकल प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ के अलावा दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं का पेपर लीक होने का मामला भी छात्र-नौजवानों को परेशान करता रहा है। ऐसे में हुए आंदोलन के दौरान पुलिस से छात्रों की भिड़ंत और बड़े पैमाने पर प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ माहौल तैयार कर दिया। भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार वैसे ही कमजोर माना जा रहा था और पार्टी के खिलाफ ग़ुस्से की वजह से छात्रों नौजवानों का बड़ा वर्ग प्रशांत किशोर के साथ चला गया। इसके अलावा कामगारों का धड़ा भी इस बार प्रशांत किशोर के साथ नजर आया।

भरत भूषण तिवारी मुठभेड़ भी बड़ी वजह?

ऐसा माना जा रहा है कि भोजपुर में भरत भूषण तिवारी का मुठभेड़ में पुलिस के हाथों मारा जाना भी नौजवानों में और खासकर सवर्ण वर्ग में बीजेपी के ख़िलाफ़ गया। भारतीय जनता पार्टी के मतों में भारी कमी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि ऊंची जाति के युवा मतदाताओं ने अपना वोट प्रशांत किशोर को दिया।

जहाँ तक राजद की बात है तो उसकी उम्मीदवार रेखा गुप्ता ने पिछली बार की तुलना में इस बार एक तिहाई वोट भी हासिल नहीं किए। पिछली बार रेखा गुप्ता को 46 हजार से ज्यादा वोट आए थे लेकिन इस बार वह 15 हजार का आँकड़ा भी नहीं पार कर सकीं। इसलिए लिहाज से इस उप चुनाव का नतीजा केवल भारतीय जनता पार्टी के लिए चेतावनी का संकेत नहीं, बल्कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में तेजस्वी यादव के भविष्य को भी चुनौती देने वाला हो सकता है। ध्यान रहे कि प्रशांत किशोर की निकटता कांग्रेस से रही है और कांग्रेस के एक वर्ग में इस बात को लेकर सहमति है कि तेजस्वी यादव को छोड़कर प्रशांत किशोर के साथ बिहार में नया विपक्ष खड़ा किया जाए।