पुलिस के हाथों फर्जी मुठभेड़, जिसे आमतौर पर एनकाउंटर का नाम दिया जाता है, की तारीफ करने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की बोली बिहार में बिल्कुल बदल चुकी है और अब वह कानून के राज की मांग कर रहे हैं। इस ‘हृदय परिवर्तन’ की वजह बनी है भरत भूषण तिवारी नाम के युवा की पुलिस की गोली से हुई मौत। आमतौर पर ऐसे फर्जी मुठभेड़ की तारीफ करने वाले नेताओं ने अब इस मामले की तुलना ‘ब्रह्म हत्या’ तक से कर दी है।

ऐसे में यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है कि क्या बिहार में जाति देखकर एनकाउंटर का समर्थन और विरोध किया जा रहा है? बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने हालांकि इस एनकाउंटर की भी जांच की मांग की है लेकिन इससे पहले वह यह आरोप लगाते रहे हैं कि पुलिस जाति देखकर कार्रवाई कर रही है जिसे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी साफ तौर पर इनकार करते हैं। इस एनकाउंटर का विरोध करने वालों में सबसे आगे भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं और उसके एक नेता ने तो इस एनकाउंटर की तुलना ‘ब्रह्म हत्या’ से कर दी।
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सम्राट चौधरी पर बीजेपी नेताओं का दबाव?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी ‘अपराधियों को उसी की भाषा’ में जवाब देने का दम भर रहे हैं लेकिन पिछले चार-पांच दिनों से अपनी ही पार्टी के नेताओं के दबाव के आगे झुकते हुए उन्होंने इस मामले की न्यायिक जाँच का आदेश दे दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी दी, “भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में दिनांक 17.06.2026 को हुई पुलिस मुठभेड़ की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच हेतु उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा न्यायिक जांच कराने का निर्णय लिया गया है। न्यायिक जांच का उद्देश्य घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्षता एवं पारदर्शिता के साथ जांच सुनिश्चित करना है।”

ध्यान रहे कि 17 जून की सुबह एसटीएफ और पुलिस की जवाबी फायरिंग में भरत तिवारी घायल हो गया था जिसकी बाद में पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में इलाज के दौरान मौत हो गई। इस मामले में शाहपुर थाना अध्यक्ष राजेश मालाकार को सस्पेंड कर दिया गया था।

मुठभेड़ के दिन यह बताया गया था कि भरत भूषण तिवारी मानसिक रूप से अस्वस्थ था और पुलिस का कहना है कि वह पिस्टल लहरा कर हवाई फायरिंग कर रहा था। जब इस मामले की जाँच के लिए पुलिस उसके सामने पहुँची तो उसने पुलिस पर भी पिस्तौल तान दी।

पुलिस का कहना है कि लगातार सरेंडर के लिए कहने के बावजूद वह माना नहीं और पुलिस पर फायरिंग करता रहा। इसके जवाब में पुलिस ने आत्मरक्षा में फायरिंग की जिससे वह पहले घायल हो गया और बाद में उसकी मौत हुई। दूसरी तरफ भरत तिवारी के घर वालों का कहना है कि सरेंडर करने के बावजूद पुलिस ने उसे गोली मारी।

पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग

इस एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए स्थानीय लोगों ने अगले दिन दोषी पुलिसकर्मियों को बर्खास्त करने और हत्या का मुकदमा दर्ज करते हुए जेल भेजने की मांग की और सड़क जाम कर उग्र प्रदर्शन भी किया। आमतौर पर ऐसे प्रदर्शनों को असामाजिक तत्वों की करतूत बताने वाले मीडिया ने इसे ‘इंसाफ दिलाने के लिए सड़क पर डटे रहना’ बताया।

इसके बाद से इस एनकाउंटर के खिलाफ बयान आने शुरू हो गए और सोशल मीडिया पर भी इसका विरोध किया जाने लगा। बक्सर में बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा कि भरत तिवारी कोई वांछित अपराधी या कुख्यात नहीं था।

एनकाउंटर समर्थक विजय सिन्हा क्या बोले?

कभी इस तरह के एनकाउंटर की वकालत करने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी इस एनकाउंटर को दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण बताया। वह पहले अपराधियों को नहीं बचने की बात कर रहे थे लेकिन इस घटना के बाद उन्होंने कहा कि जो भी अधिकारी या कर्मचारी लापरवाही करेगा उसे बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार पुलिस का काम राज्य में विधि व्यवस्था काम रखना है लेकिन इसकी आड़ में किसी बेगुनाह की जान नहीं जानी चाहिए।

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे ने एक सवाल के जवाब में कहा कि ब्रह्म हत्या (का शाप) लगेगा। उनके अनुसार, “भगवान राम को भी ब्रह्महत्या लगा था। रावण की हत्या की थी। रावण तो राक्षस था, लेकिन विद्वान था। भगवान राम ने प्रायश्चित किया था। भरत तिवारी के हत्यारों को भी प्रायश्चित करना पड़ेगा।” चौबे ने भरत तिवारी को क्रांतिकारी और शहीद बताते हुए बाबू वीर कुंवर सिंह और मंगल पांडे के बराबर बताया। चौबे ने एनकाउंटर के बारे में कहा कि यह पुलिस की कुत्सित, घृणित और विद्वेषपूर्ण मानसिकता को दर्शाता है। हालाँकि, उनकी ही सरकार ने इस मामले की न्यायिक जाँच का आदेश दिया है लेकिन इससे पहले ही चौबे ने इस घटना को नृशंस हत्या करार दे दिया है। 

दिलचस्प बात यह है कि अश्विनी चौबे ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ-साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से आग्रह किया है कि वह इस कांड का संज्ञान लेते हुए दोषी पुलिस प्रशासन के खिलाफ तत्काल कार्रवाई कर उच्च स्तरीय जाँच का आदेश दें।

तेजस्वी यादव क्या बोले?

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस एनकाउंटर को साफ़ तौर पर फर्जी बताते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को माफी मांगने को कहा। उन्होंने एक बार फिर आरोप लगाया कि पहले भी जाति देखकर फर्जी एनकाउंटर होते रहे हैं। तेजस्वी ने कहा कि गायघाट और मधुबनी के मामले में अभी तक न्याय नहीं मिला है। तेजस्वी ने एक सवर्ण युवा के एनकाउंटर में मारे जाने के सवाल को उठाकर दरअसल यह साबित करने की कोशिश की है कि वह ऐसे मामले में जाति देखकर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं।

तेजस्वी यादव

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी योगी मॉडल से इनकार करते हैं लेकिन उनके कार्यकाल की एक खास बात योगी सरकार की तरह ही ‘एनकाउंटर’ और ‘हाफ एनकाउंटर’ है। ऐसा लगता है कि सम्राट चौधरी एक तरफ भारतीय जनता पार्टी की उस नीति के तहत चलने को मजबूर हैं जिसमें विरोधियों का एनकाउंटर कर योगी मॉडल की बात की जाती है तो दूसरी तरफ वह इस दबाव में भी हैं कि किसी निर्दोष को एनकाउंटर करने की छूट पुलिस को नहीं दी जानी चाहिए।

नीतीश तो कभी एनकाउंटर के पक्ष में नहीं रहे

सम्राट चौधरी वैसे तो बिहार में पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन वह नीतीश कुमार की पार्टी के समर्थन के बिना सरकार नहीं चला सकते और इस मामले में जनता दल यूनाइटेड के नेताओं का बयान भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बयान से अलग रह रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपराध और अपराधियों से किसी समझौते का सख्ती से विरोध करते थे लेकिन उन्होंने कभी एनकाउंटर या फर्जी एनकाउंटर की नीति को बढ़ावा नहीं दिया। दूसरी तरफ़ यह बात भी सही है कि भरत भूषण तिवारी से पहले एनकाउंटर में जिन लोगों को मारा गया उनके मामले में जदयू के नेताओं ने भी या तो चुप्पी साधी रखी या सरकार के साथ खड़े होने में भलाई समझी।

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अब जब भारतीय जनता पार्टी के नेता ही अपनी सरकार की पुलिस पर सवाल उठाने लगे तो जनता दल यूनाइटेड के कुछ नेता भी इस एनकाउंटर के विरोध में बयान दे रहे हैं। जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने भी यह कहा है कि इस मामले का जो वीडियो सामने आया है वह निश्चित रूप से संदेह पैदा करता है। उन्होंने पुलिस कर्मियों को निलंबित करने को काफी नहीं माना और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की।

सम्राट चौधरी की सरकार में भोजपुर एनकाउंटर से पहले भी एनकाउंटर हुए हैं और कुछ लोगों की उसमें मौत भी हुई है, लेकिन जितनी निंदा भोजपुर एनकाउंटर की हो रही है उसका छोटा सा हिस्सा भी बाकी एनकाउंटर्स के लिए नहीं था। ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह बेहतर नहीं होता कि सभी एनकाउंटर्स की ज्यूडिशियल इंक्वायरी होती? क्या यह बेहतर नहीं होता कि एनकाउंटर की जगह होने वाले फेक एनकाउंटर को हर हाल में रोका जाता?