एक तरफ दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ मुकदमे उठाए जाने का समझौता हुआ तो दूसरी तरफ बिहार में व्यापक पहलवान पर पुलिस की ‘उठाया-उठाई’ चल रही है जिसके तहत लगभग 500 प्रदर्शनकारियों को उपद्रवी और साजिशकर्ता बता कर जेलों में डाला गया या हिरासत में लिया गया है। इस दौरान जहानाबाद और सीवान जिले में पुलिस ने फायरिंग की तो कुछ जिलों में इंटरनेट भी बंद किया गया।
गिरफ्तार होने वालों में भाकपा-माले के विधायक संदीप सौरभ सहित कई दर्जन छात्र नेता व कार्यकर्ता शामिल हैं। ‘आइसा’ के बिहार अध्यक्ष धनंजय कुमार, राज्य सचिव दीपांकर मिश्रा, उपाध्यक्ष सबा आफरीन व बिहार मीडिया प्रभारी कुमार दिव्यम को भी गिरफ्तार किया गया है। दिल्ली में जंतर मंतर पर धरना के दौरान भूख हड़ताल करने वालीं ‘आइसा’ की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा वोरा उनके समर्थन में आज पटना पहुंच रही हैं। उम्मीद की जा रही है कि वह जेल में बंद छात्र नेताओं से मुलाकात करेंगी।
पुलिस के क्रैकडाउन के बारे सबसे ज्यादा इस बात की आलोचना हो रही है कि उसने प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें इस तरह अखबारों में छपाई जैसे वह कोई दुर्दांत अपराधी हों। यही नहीं मुजफ्फरपुर की पुलिस ने तो आनन फानन प्रदर्शनकारियों की तस्वीरों को उपद्रवी की तस्वीर बताकर उन्हें पकड़ने में मदद देने वालों के लिए 10-10 हजार रुपए के इनाम की भी घोषणा कर दी। पटना और दूसरे शहरों में छात्रावासों और दूसरी जगहों से बड़े पैमाने पर प्रदर्शनकारियों को उठाया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि बिहार पुलिस राज्य के पैमाने पर गिरफ्तारियों की एकीकृत जानकारी नहीं दे रही है लेकिन अलग-अलग जिलों से जो जानकारी मिल रही है उसे यही लगता है कि बड़े पैमाने पर लोगों को ‘उठाया’ जा रहा है।
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यह गिरफ्तारियां 22 जुलाई को पटना और दूसरे जिलों में प्रदर्शन और 25 जुलाई को बिहार बंद के दौरान हुए छात्रों के आंदोलन को लेकर हुई है। जिन छात्र प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है उनके घर वालों का कहना है कि उनके बच्चों को दो दिनों तक हिरासत में लेकर उन्हें इस थाने से उस थाने दौड़ाया गया और उन्हें यह बताया नहीं गया कि उनके बच्चे कहां रखे गए हैं।
पुलिस की कार्रवाई कितने अंधाधुंध तरीके से की गई है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अकेले पटना में उसे ‘30 महिलाओं और 30 नाबालिगों’ को छोड़ना पड़ा हालांकि उसने उनसे बॉन्ड भी भरवाया गया। पुलिस की कार्रवाई में उनकी तिकड़म का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनसे एफआईआर की मांग की जा रही थी तो उसने टाल मटोल किया। यहां तक कि तेज प्रताप जैसे चर्चित नेता की भी शिकायत रही कि उन्हें एसपी ने कहा कि वह एफआईआर मंगवा कर दे रहे हैं लेकिन उन्हें उसकी कॉपी गिरफ्तारी के दिन नहीं दी गई।

सीवान में प्रदर्शनकारियों पर एके 47 से फायरिंग के आरोप हैं।

कुछ खबरों में बताया गया है कि अकेले पटना में ही कम से कम 200 लोगों को जेल भेजा गया है जिन में पूर्व मंत्री और लालू प्रसाद के पुत्र तेज प्रताप यादव भी शामिल हैं। इसके बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी सीवान जिले में हुई है जहां कम से कम 100 लोगों को जेल में डाला गया है। यहां ढाई हजार अज्ञात लोगों पर भी केस दर्ज किया गया है। सीवान में पुलिस फायरिंग का आलम यह रहा कि एक सिपाही ने एक-47 से फायरिंग कर दी हालांकि बाद में उसे सस्पेंड किया गया है। सीवान में पुलिस की फायरिंग में कम से कम तीन प्रदर्शनकारी घायल बताए गए हैं।
छपरा में चालीस से ज्यादा नामजद और डेढ़ सौ से अधिक प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए हैं। औरंगाबाद में एक दर्जन नामजद और एक हजार अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर कम से कम तीन प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा भी कई शहरों में प्रदर्शनकारियों को उपद्रवी बताकर गिरफ्तार किया गया है। पूरे सूत्रों का कहना है कि अज्ञात मुकदमे में बाद में किसी भी टारगेटेड इंसान को गिरफ्तार किया जा सकता है।

इधर बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने चेतावनी दी कि अगर सोमवार तक आंदोलनकारी छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस नहीं लिए गए तो आरजेडी पूरे राज्य में आंदोलन करेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में जबरन और फर्जी केस कर छात्रों को जेल में डाला जा रहा है और कई विधायकों को भी उठाया गया है।

इस बीच पुलिस ने अखबारों में यह बात भी छपवाई है कि कैसे दो अधिकारी उपद्रवियों की हिंसा में घायल हुए और उनका गंभीर हालत में इलाज चल रहा है। बिहार पुलिस यह नैरेटिव चला रही है कि दरअसल प्रदर्शन के नाम पर उपद्रव किया गया है जिसमें सरकारी अधिकारी घायल हुए हैं और इसी के जवाब में कार्रवाई की जा रही है। यह भी कहा जा रहा है कि दरअसल दिल्ली से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने बिहार में हर हाल में आंदोलन को कुचलने का जो संदेश दिया है उसी के मुताबिक पुलिस यह क्रैकडाउन कर रही है।
पटना जिला प्रशासन ने अखबारों में एक पूरे पेज का विज्ञापन छात्रों और अभिभावकों के नाम संदेश देने के लिए किया। इसमें कहा गया कि लोकतंत्र में अपनी मांगों और विचारों को अभिव्यक्त करने का अधिकार हर नागरिक को है लेकिन इसी आंदोलन को उपद्रव बताते हुए आधे से ज्यादा पेज पर सौ से अधिक तस्वीरें छपीं और उन्हें असामाजिक तत्व बताया।
अखबारों में विज्ञापन का कारोबार देखने वाले एक सूत्र का कहना है कि जहां नीतीश कुमार की सरकार किसी बड़े अखबार को एक करोड़ का विज्ञापन देती थी, अब वह सम्राट चौधरी की सरकार में बढ़कर तीन करोड़ रुपए का हो गया है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि अब इन अखबारों का जलना बाकी रह गया है।