चिराग पासवान और जीतन राम मांझी
एक तरफ बीजेपी के शासन वाले उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को अपमानित करने का मामला राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है तो दूसरी तरफ पहली बार बीजेपी के मुख्यमंत्री के शासन में आए बिहार में दो प्रमुख दलित नेताओं- चिराग पासवान और जीतन राम मांझी आरक्षण के मुद्दे पर अपनी राजनीति चमकाने में एक दूसरे से इस्तीफा की मांग कर रहे हैं। चिराग पासवान इस समय केंद्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के जबकि जीतन राम मांझी एमएसएमई के मंत्री हैं।
दरअसल, राष्ट्रीय राजनीति और विशेष कर बिहार में दलित नेता के तौर पर रामविलास पासवान के गुजरने के बाद और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती के एक तरह से किनारे लगने के बाद चिराग पासवान दलित नेता के तौर पर अपना स्थान बनाने में लगे हैं तो दूसरी ओर इस जगह के लिए जीतन राम मांझी ने पहले खुद को पेश किया और अब अपने बेटे संतोष कुमार सुमन उर्फ संतोष मांझी को आगे ला रहे हैं। ऐसे में एक तरफ चिराग पासवान हैं तो दूसरी तरफ जीतन राम मांझी और उनके पुत्र की जोड़ी है।
दलित नेता के तौर पर कांग्रेस पार्टी की ओर से जगजीवन राम से लेकर उनकी पुत्री मीरा कुमार तक का नाम रहा है और अब इस समय कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्तर के ऐसे नेता हैं और दलित राजनीति में उत्थान के एक प्रतीक भी माने जाते हैं। फिलहाल उत्तराखंड के हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद वहां कथित तौर पर बीजेपी नेताओं द्वारा शुद्धिकरण की घटना चर्चा में है और इस उदाहरण से भी चिराग पासवान जीतन राम मांझी के बयान को गलत बता रहे हैं।
इस मामले को समझने के लिए यह याद करना जरूरी है कि जब सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर उप वर्गीकरण यानी कोटे में कोटा और क्रीमी लेयर की मांग उठी थी तब भी इस मुद्दे पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की राय अलग-अलग थी। जीतन राम मांझी का कहना है कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण का ज्यादातर लाभ केवल कुछ ही सक्षम जातियों को मिल रहा है इसलिए वह कोटे के अंदर कोटे के समर्थक हैं। सक्षम जातियों से जीतन राम मांझी का इशारा पासवान और रविदास समुदाय से रहा है जबकि वह मुसहर, भुइयां और अन्य अति पिछड़े दलित जातियों के लिए कोटे के अंदर कोटे की मांग करते हैं।
दूसरी तरफ चिराग पासवान का तर्क यह है कि अनुसूचित जाति आरक्षण का आधार सामाजिक है, आर्थिक नहीं। इसीलिए उनकी दलील यह है कि छुआछूत की प्रताड़ना अभी जारी है और अनुसूचित जाति को मिलने वाला आरक्षण इसी आधार पर है।
चिराग-राहुल की राय एक जैसी!
इस मामले में चिराग पासवान और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की राय एक जैसी मालूम होती है। राहुल गांधी का कहना है कि बीजेपी और आरएसएस की सोच यह है कि दलितों को तरक्की और सम्मान नहीं मिलनी चाहिए और इसी वजह से उन्होंने इस मामले में एससी एसटी ऐक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। फर्क यह है कि चिराग पासवान भारतीय जनता पार्टी का नाम नहीं लेते और उसकी वजह भी साफ है क्योंकि वह मोदी सरकार में मंत्री हैं।
मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद हल्द्वानी में शुद्धिकरण के नाम पर जो कुछ हुआ, उसके में जीतन राम मांझी ने खुद को भी पीड़ित बताया लेकिन आरक्षण के मुद्दे पर उनकी राय अलग है। याद रहे कि जब जीतन राम मांझी जब कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे तो उनके भी एक धर्मस्थल में जाने के बाद शुद्धिकरण की शिकायत सामने आई थी। जीतन मांझी के बेटे के बयान से विवाद बढ़ा
वैसे तो चिराग पासवान और जीतन राम मांझी इससे पहले भी कई मुद्दों पर भिड़ चुके हैं लेकिन ताजा विवाद की शुरुआत जीतन राम मांझी से नहीं बल्कि उनके पुत्र संतोष कुमार सुमन के एक बयान से हुई जो इस समय अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, एमएलसी और बिहार के जल संसाधन मंत्री हैं। संतोष सुमन ने अपने बयान में आरक्षण की समीक्षा किए जाने और एससी-एसटी आरक्षण में कोटे के अंदर कोटे का प्रावधान करने की वकालत की। दरअसल इस बयान से पिता और पुत्र दोनों दलित राजनीति में उन वर्गों का चैंपियन बनना चाह रहे हैं जो उनकी नजर में सक्षम जातियों की तुलना में काफी पिछड़े हुए हैं और साथ ही साथ दोनों आरक्षण की समीक्षा की बात कर सवर्ण वर्ग को भी खुश करना चाहते हैं।
चिराग पासवान का हमला
इसके जवाब में इस बार चिराग पासवान का रुख कुछ ज्यादा ही आक्रामक है। उन्होंने समाज में बंटवारे का आरोप लगाने के साथ सीधे-सीधे यह कहा कि अगर जीतन राम मांझी को लगता है कि एससी एसटी में वर्गीकरण और क्रीमी लेयर होना चाहिए तो पहले उन्हें अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने जीतराम मांझी के पुत्र संतोष कुमार सुमन से भी इस्तीफे की मांग कर डाली।
ऐसा लगता है कि चिराग पासवान के इस तरह के हमले के बाद पिता-पुत्र दोनों तिलमिला गए और उन्होंने भी जवाब में चिराग पासवान से इस्तीफे की मांग कर डाली। संतोष कुमार सुमन ने कहा कि उन्होंने क्रीमी लेयर की बात नहीं कही है बल्कि वंचित-शोषित और दलितों की बात की है। संतोष सुमन ने कहा कि चिराग उनके छोटे भाई हैं लेकिन उनकी पार्टी बड़ी है इसलिए पहले वह इस्तीफा दें, तब वह उनका अनुसरण करेंगे। उन्होंने खुद को ‘ढिबरी’ और चिराग को प्रकाशमान बताते हुए यह भी कहा कि अगर उनके इस्तीफा से गरीबों का विकास होता है तो वह उसके लिए तैयार हैं।
दूसरी तरफ संतोष सुमन के पिता जीतन राम मांझी ने कहा कि वह आरक्षण हटाने की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि आरक्षण के अंदर कोटा देने की मांग कर रहे हैं। उनका दावा है कि बिहार में 22 दलित जातियां हैं लेकिन चार जातियों को छोड़कर बाकी सब हाशिए पर हैं। उन्होंने एक तरह से यह आरोप लगाया कि वह गरीब लोगों को देखना नहीं चाहते इसलिए चिराग पासवान ने संतोष सुमन का इस्तीफा मांगा है।
नीतीश-रामविलास पासवान में भी था विवाद
याद करने की बात यह भी है कि एक जमाने में पूर्व मुख्यमंत्री और जदयू के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार और चिराग पासवान के पिता दिवंगत रामविलास पासवान में भी इस मुद्दे पर मतभेद थे। नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल के दौरान महादलित का एक नया शब्द गढ़ा था और महादलित के लिए अलग योजनाओं की घोषणा भी की थी हालांकि बाद में यह मामला सुलट गया था। उस समय भी रामविलास पासवान को यह लगा था कि नीतीश कुमार दरअसल दलित और महादलित का भेद कर दलित समुदाय में विभाजन की कोशिश कर रहे हैं और लगभग यही बात आप चिराग पासवान कर रहे हैं।
यह दिलचस्प राजनीतिक मोड़ है कि चिराग पासवान को आरक्षण के समर्थन में अपने तर्क के लिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ शुद्धिकरण जैसी घटना के उदाहरण का सहारा लेना पड़ा है जबकि जीतन राम मांझी ऐसी घटना को आरक्षण के मामले में नजरअंदाज करना चाहते हैं हालांकि खुद वह अपने को ऐसे धार्मिक ‘शुद्धिकरण’ का शिकार बता चुके हैं। कांग्रेस पार्टी इस समय शुद्धिकरण को उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात में ब्लॉक स्तर तक ले जाने की बात कर रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह बिहार में भी ऐसा कोई कार्यक्रम करती है और जीतन राम मांझी के लिए एक राजनीतिक दुविधा की स्थिति पैदा होती है।