बिहार में पिछले 20-25 सालों में मर्डर और रेप जैसी घटनाओं को सरकार चला रही पार्टियों के नेताओं ने हर बार इस तरह खारिज किया है कि राज्य के अंदर और बाहर आम लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो गया है कि दरअसल यहां अपराध की क्या स्थिति है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि जमुई में एक छात्रा के साथ यौन हिंसा का जो ताजा मामला चर्चा में है उसका यह मतलब नहीं है कि यह अचानक हुई कोई आपराधिक घटना है। यह कहा जा सकता है कि रेप की घटना पर भी राजनीति होती है और बिहार में सरकार चला रही पार्टियों के नेता इस मुद्दे को दबाने में महारत रखते हैं।

जदयू ने 2005 से पहले के बिहार की बात क्यों की?

जमुई की वीभत्स घटना के बाद भी केंद्रीय मंत्री और जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह जैसे नेता यह बयान दे रहे थे कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अपने सहयोगी यानी आरजेडी से पूछें कि 2005 से पहले बिहार के क्या हालात थे। जदयू के एक और नेता ने तो इसे छिटपुट घटना बताकर पल्ला झाड़ लिया। मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का यह बयान बहुत चर्चित रहा है कि अगर उनके शासनकाल में रात के बारह बजे भी किसी महिला के साथ कोई घटना हो जाए तो वह इस्तीफा दे देंगे। जमुई की घटना तो सरेआम शाम में हुई लेकिन इस्तीफा देने की बात तो दूर सरकार के नेता इस पर शर्मिंदा होने के लिए भी तैयार नजर नहीं आते हैं।

बिहार में आए दिन मर्डर और रेप की घटनाएँ होती रहती हैं लेकिन इन्हें इस तरह नॉर्मलाइज कर दिया गया है कि इनके खिलाफ समाज और सरकार की संवेदना जल्दी नहीं जगती। यह भी कहा जा सकता है कि ऐसी घटनाओं का जब तक वीडियो सामने नहीं आए तब तक आम लोग, समाज, सरकार और विपक्ष इसकी चिंता बिल्कुल नहीं करते।
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इस बात को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि जिस दिन जमुई की भयावह घटना पर पूरे देश और सोशल मीडिया में आक्रोश देखा जा रहा था, उसी दिन पटना जिले के बिहटा थाना क्षेत्र के एक गांव से लापता हुई दसवीं की छात्रा की लाश लखनऊ रेलवे ट्रैक के पास मिली। छात्रा के घर वालों ने उसके अपहरण, रेप और मर्डर का आरोप लगाया है लेकिन मीडिया में और सामाजिक पटल पर इस खबर की कोई खास चर्चा नहीं।

बिहार दुष्कर्म के कैसे-कैसे मामले

बिहार में शौच के लिए जाने वाली महिलाओं और किशोरियों के साथ दुष्कर्म और कई मामलों में रेप के बाद मर्डर की ख़बरें भी अख़बार के अंदरूनी पन्नों पर छपती रहती हैं। अभी 7 सितंबर को मधेपुरा में तीन रिश्तेदार किशोरियों के साथ दुष्कर्म और उनके बेहोशी की हालत में मिलने की ख़बर छपी थी, लेकिन अंदर के पन्नों पर। उसी दिन सीतामढ़ी में भी मेला देखने गई एक किशोरी के साथ सामूहिक दुष्कर्म की ख़बर छपी हुई थी। ऐसी घटनाओं की चर्चा शायद इसलिए भी नहीं होती क्योंकि इनका वीडियो वायरल नहीं होता। अफसोस की बात है कि ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया वीडियो के वायरल होने और ना वायरल होने पर निर्भर करती है।

यह बात भी तय है कि ऐसे मामलों में पीड़ित महिलाएं और किशोरियां कमजोर वर्ग की होती हैं जिनके लिए सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर आवाज बिल्कुल नहीं उठाई जाती। चूंकि रेप की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं और इसका विरोध नहीं होता तो आम लोग भी इसे सामान्य ढंग से लेने लगते हैं।

नीतीश कुमार का ऐसा 'सुशासन'!

नीतीश कुमार के शासनकाल में इस बात का भी आरोप लगा कि सरकार से जुड़ने वाले आपराधिक तत्वों को खुला छोड़ दिया गया। इसका मतलब यह था कि अगर राजनीतिक रूप से मज़बूत आपराधिक तत्व नीतीश कुमार के साथ रहें तो वह कार्रवाई से बच सकते हैं। इस बात को अनंत सिंह और राजबल्लभ यादव के उदाहरण से समझा जा सकता है। अनंत सिंह इस समय नीतीश कुमार की पार्टी के विधायक हैं लेकिन जब उनकी नजदीकी राजद के साथ थी तो उन्हें उनके घर में एके-47 मिलने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। अनंत सिंह ने जब पाला बदलकर नीतीश कुमार के साथ जाने का फ़ैसला किया तो बिहार सरकार यह केस अदालत में हार गई और एनडीए सरकार विश्वास मत जीत गई।

इसी तरह रजत के विधायक रहे पूर्व मंत्री राजबल्लभ यादव को एक नाबालिग से रेप के मामले में न केवल गिरफ्तार किया गया बल्कि उसे 9 साल तक जेल खटना पड़ा। राजबल्लभ के परिवार ने सरकार से राजद को अलग किए जाने के बाद विश्वास मत के दौरान जब पाला बदलकर नीतीश कुमार का साथ देने का फ़ैसला किया तो एक बार फिर राज्य सरकार अदालत में केस हार गई और राजबल्लव को बरी कर दिया गया।
नीतीश कुमार अपने जमाने में यह नारा लगाते थे कि उनकी सरकार ना तो किसी को फँसाती है और ना किसी को बचाती है। आपराधिक मामलों में अपने पाले में आए लोगों के मुक़दमे में नीतीश कुमार की सरकार क्या बिना किसी वजह हारती होगी? इन दो चर्चित मामलों के अलावा और भी कई ऐसे मामले हैं जहां सरकार की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती थी कि आपराधिक मामलों के अभियुक्तों का राजनीतिक झुकाव किधर है।

नीतीश शासन में अपराध

रेप और मर्डर और दूसरी आपराधिक घटनाओं पर बिहार में जो राजनीति पिछले दो दशक से हो रही है, उसे समझने की ज़रूरत है। इस राजनीति के सबसे बड़े प्रणेता पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रहे हैं जो अपनी जबान के जोर से लोगों से यह मनवाने की कोशिश करते रहे कि उनके शासनकाल में अपराध या तो हुआ नहीं, हुआ तो वह ऑर्गनाइज्ड क्राइम नहीं था और आखिर में यह बात भी कहते थे कि अब क्राइम के बाद कार्रवाई होती है।

नीतीश कुमार के इस दावे और नारे को मीडिया ने भरपूर प्रचार दिया और आम लोगों को कभी इस बात का एहसास होने नहीं दिया कि दरअसल बिहार में अपराध ने अपना स्वरूप जरूर बदला है, उसकी भयावता में कमी नहीं आई है। इस बात को साबित करने के लिए उदाहरणों की कमी नहीं है। पटना की सबसे व्यस्त सड़कों में से एक पर प्राइवेट हॉस्पिटल में सुबह सवेरे हथियार लेकर घुसने और इत्मीनान से मर्डर करने का मामला बहुत चर्चित जरूर हुआ लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। बिहार में हत्या की ऐसी दर्जनों वारदात हुई हैं। यह और बात है कि नीतीश कुमार और उनके सहयोगी दल भारतीय जनता पार्टी ने इन घटनाओं की भयावता को कम करने के लिए 2005 के पहले के बिहार के कथित जंगल राज को अपने काल के अपराध के बचाव का हथियार बनाया और उसमें कामयाब भी रहे।
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अपराध और मीडिया

इस बात पर चर्चा ज़रूरी है कि नीतीश कुमार ने अपने जमाने के हर बड़े अपराधिक कांड को आम लोगों की चर्चा से दूर रखने के लिए मीडिया का सहारा लिया और लोगों में 2005 के पहले के बिहार के अपराधिक माहौल को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया। इसमें कोई शक नहीं कि लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के कार्यकाल के दौरान कुछ बेहद वीभत्स घटनाएं हुई थीं लेकिन ऐसा भी नहीं था कि पूरा बिहार शाम पांच बजे से पहले घरों में कैद हो जाता था। यह कहा जा सकता है कि उस समय विपक्ष के तौर पर नीतीश कुमार ने और दिवंगत सुशील कुमार मोदी ने अपनी भूमिका निभाई लेकिन जब यह सत्ता में आए तो उनके समय के विपक्ष ने इस भूमिका को निभाने में कामयाबी हासिल नहीं की।

एक तरफ लालू-राबड़ी के कार्यकाल में इन घटनाओं को राष्ट्रीय मीडिया में भी खूब प्रचार प्रसार मिला तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार की छवि सुशासन बाबू की बनाई गई, इसलिए आम लोगों के मन में यह बात समा गई कि नीतीश कुमार के शासनकाल में अपराध कम हो रहे हैं। ऐसे में होता यह था कि नीतीश कुमार के शासनकाल में हुए अपराध की खबरें दबाई जाने लगीं। सुशासन बाबू की इस छवि को बनाने में मीडिया ने अपनी भागीदारी इसलिए भी निभाई क्योंकि उसे नीतीश कुमार की सरकार से विज्ञापन के पैसे लेने थे। इसके अलावा मीडिया पर हावी सवर्ण वर्ग लालू प्रसाद की पिछड़ावादी राजनीति का दुश्मन बना था और उसे नीतीश कुमार के बहाने भारत की जनता पार्टी को मजबूत करना था।