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सुशांत पर सियासत! चुनाव से पहले बिहार बीजेपी का पोस्टर- '...ना भूलने देंगे' क्यों?

सुशांत की मौत के मामले में जब बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की ही 3 एजेंसियाँ- सीबीआई, ईडी और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो जाँच कर रही हैं तो फिर बिहार बीजेपी के कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ ने 'सुशांत के लिए न्याय' अभियान क्यों छेड़ रखा है? इसने अब एक पोस्टर जारी किया है जिस पर लिखा है- ना भूले हैं! ना भूलने देंगे!!' पोस्टर पर यह भी लिखा है कि 'सुशांत के लिए न्याय'। सवाल है कि इसने ऐसा पोस्टर क्यों जारी किया जो साफ़ तौर पर राजनीतिक लाभ दिलाने वाला लगता है? हालांइक बीजेपी इसे पूरी तरह से नकारती रही है कि वह सुशांत की मौत के मामले का राजनीतिक लाभ ले रही है। तो सच्चाई क्या है? 

जब से सुशांत की मौत का मामला आया है तब से ही इसे बिहार में राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया है। यह इसलिए है कि बिहार में चुनाव होने हैं और सुशांत की मौत को बिहार की अस्मिता से जोड़ कर पेश किया जा रहा है। चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष।

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बहरहाल, बिहार बीजेपी में कला संस्कृति प्रकोष्ठ ने जो पोस्टर जारी किया है उस पर सुशांत सिंह राजपूत की तसवीर लगी है और तसवीर के ऊपर हैश टैग के साथ जस्टिस फॉर सुशांत लिखा गया है। इतना ही नहीं, इस तसवीर पर भाजपा का चुनाव चिन्ह कमल का भी निशान है, जिसके नीचे लिखा है कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ, भाजपा, बिहार प्रदेश। सुशांत की मौत के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोपों को कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ खारिज करता है और कहता है कि यह उनके लिए भावना से जुड़ी बात है न कि राजनीतिक मुद्दा। इसका कहना है कि वे यह अभियान ऑनलाइन और ऑफ़लाइन सुशांत की मौत के बाद से ही चला रहे हैं। 

प्रकोष्ठ ने 25000 कार स्टिकर बनवाए हैं और वह जुलाई से ही इसे अलग-अलग ज़िलों में बाँट रहा है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, बिहार बीजेपी के कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ के संयोजक वरुण कुमार सिंह ने कहा, 'हमने उसी संदेश के साथ 30,000 मास्क तैयार करवाए हैं और इसे पहले से ही वितरित करा रहे हैं। हम जुलाई के पहले हफ़्ते में पटना में समूहों में बैठकें कर रहे थे। यह केवल एक संयोग है कि कुछ लोगों ने स्टिकर पर ध्यान दिया और वे इसे राजनीतिक मुद्दे से जोड़ रहे हैं।' वरुण ने यह भी कहा कि उन्होंने सुशांत पर दो एपिसोड में वीडियो भी बनाए हैं और वह जल्द ही इसे जारी करेंगे। 

सुशांत की मौत का मामला कितना राजनीतिक है, यह इसके शुरुआती घटनाक्रमों से भी पता चलता है। शुरुआत में सुशांत की मौत का यह मामला जब आया तब इसे आत्महत्या बताया गया था, लेकिन जैसे-जैसे बिहार में विपक्षी दलों ने इस मामले को उठाया, सत्ता पक्ष भी इसमें कूद पड़ा।

फिर इस मामले ने तूल पकड़ा। तेजस्वी यादव से लेकर रविशंकर प्रसाद तक सुशांत के परिवार वालों से मिले। चुनाव से पहले अलग-अलग राजनीतिक दलों ने मौत के मामले में संदेह जताना शुरू किया और फिर बिहार के गौरव से जोड़कर इसे पेश करना शुरू किया। इसी बीच इस मामले में पटना में एफ़आईआर दर्ज कराई गई। यही वजह है कि दो अलग-अलग राज्यों की पुलिस की शुरुआती जाँच के बाद इस पर विवाद हुआ और फिर सीबीआई जाँच की माँग उठी। इस मामले में जैसे ही सीबीआई जाँच को हरी झंडी मिली राजनीतिक दलों ने इसे भुनाना शुरू किया। सभी दलों में इस बात का श्रेय लेने की होड़ मच गई। हर दल अपनी पीठ थपथपाने लगा। 

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सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला जैसे ही आया था सबसे पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे लपक लिया। नीतीश ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद यह साफ़ हो गया कि बिहार सरकार की ओर से क़ानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया है। पटना से बीजेपी के सांसद और केन्द्र सरकार में क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संवाददाता सम्मेलन बुलाकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर ख़ुशी ज़ाहिर की और कहा कि ‘न्याय की जीत हुई, अब सुशांत सिंह की आत्मा को शांति मिलेगी।’ तेजस्वी भी पीछे नहीं रहे और कहा था कि 'ये तो हम ही हैं जिसने सुशांत सिंह को न्याय दिलाने के लिए सड़क से लेकर संसद तक आन्दोलन को तेज़ किया। तब जाकर नीतीश की सरकार को कुंभकर्णी नींद से जागना पड़ा।’ इसके अलावा लोजपा, ‘हम’ और दूसरे दल भी अपनी-अपनी पीठ थपथपा रहे थे।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचमुच सुशांत सिंह राजपूत को न्याय दिलाने की होड़ मची है? या फिर असल बेचैनी वोट की राजनीति साधने को लेकर है?

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अमित कुमार सिंह
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