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बिहार: तेजस्वी के ‘बाबू साहब’ वाले बयान पर बवाल

बिहार विधानसभा चुनाव में मोदी, नीतीश जैसे अनुभवी सियासतदानों के सामने डटकर खड़े लालू के लाल तेजस्वी यादव अपने एक बयान को लेकर घिर गए हैं। लालू-राबड़ी राज में जाति आधारित राजनीति करने के आरोप झेल चुकी आरजेडी तेजस्वी के बयान के बाद डैमेज कंट्रोल में जुटी है लेकिन आने वाले दिनों में देखना होगा कि इस बयान का क्या असर होगा। पहले पढ़िए बयान। 

रोहतास में सोमवार को एक चुनावी सभा में तेजस्वी यादव ने कहा, ‘लालू जी का जब राज था तो ग़रीब सीना तानकर बाबू साहब के सामने बैठता था।’ तेजस्वी की चुनावी रैलियों में उमड़ रही भीड़ से परेशान नीतीश कुमार ने उनके इस बयान को तुरंत लपक लिया और हमला बोल दिया। नीतीश ने एक चुनावी सभा में कहा, ‘इस तरह के लोग किसी को अपना नहीं मानते हैं, ये सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के बारे में सोचते हैं।’

महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव पर हमला करने का ये अच्छा मौक़ा बीजेपी-जेडीयू को मिला तो दोनों ने इसे हाथ से जाने नहीं दिया।

बिहार में बाबू साहब को सवर्ण जाति में राजपूतों और भूमिहार जाति से जोड़ा जाता है। नीतीश ने तेजस्वी के इस बयान को आरजेडी के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह के सम्मान से जोड़ दिया। नीतीश ने कहा, ‘जो रघुवंश बाबू 1990 से लगातार साथ देते रहे, उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया। जो लोग सत्ता हासिल करने के चक्कर में समाज में टकराव उतपन्न करने की कोशिश कर रहे हैं, उन लोगों ने रघुवंश बाबू के साथ क्या व्यवहार किया।’

इसके बाद बारी बीजेपी की थी और बिहार में बीजेपी के बड़े चेहरे और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी सामने आए। उन्होंने कहा, ‘आरजेडी की पूरी राजनीति सवर्णों को गालियां देने की रही है। यही आरजेडी है, जिसने जब नरेंद्र मोदी ने ऊंची जातियों के ग़रीब लोगों को 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया तो लोकसभा का बहिष्कार कर दिया।’ 

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सुशील मोदी ने आगे कहा, ‘जिनकी पूरी राजनीति ‘भूरा बाल’ साफ करने की रही है, यानी भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ, इनका ख़ात्मा कर दो, जिनके दम पर ये राजनीति करते रहे, आज फिर से ये बिहार को जाति-पाति की राजनीति में बांटना चाहते हैं।’

जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन ने आरजेडी के शासनकाल पर हमला बोला और कहा कि तेजस्वी के पिता ने अपनी सरकार के दौरान ‘भूरा बाल’ साफ करो की बात कही थी। लालू यादव पर यह आरोप लगता है कि उनके शासनकाल के दौरान बिहार में सवर्णों के विरोध की राजनीति होती थी। 

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आरजेडी के सांसद और प्रवक्ता मनोज झा ने डैमेज कंट्रोल करते हुए एक न्यूज़ चैनल से कहा, ‘जब वो (तेजस्वी) बाबू की बात करते हैं, उस तरह के साहबों की, वे जो नौकरशाह जो बिहार को रौंद चुके हैं, जो ब्लॉक से लेकर थाने से लेकर सचिवालय तक कमीशन खाते हैं और जनता की गाढ़ी कमाई ख़त्म होती है, वैसे लोगों के बारे में है।’ 

बिहार चुनाव पर देखिए चर्चा- 

तेजस्वी की सफाई

ख़ुद को चारों तरफ से घिरा देख तेजस्वी मैदान में आए और उन्होंने ट्वीट कर सफाई दी। तेजस्वी ने कहा, ‘जो लोग भ्रष्ट अधिकारी बाबुओं की ग़ुलामी से छुटकारा दिलाने के हमारे संकल्प को जातियों से जोड़ रहे हैं, ये उनकी बिहार को पीछे धकेलने और बदनाम करने की मानसिकता की उपज है।’ उन्होंने कहा कि महागठबंधन नए बिहार का निर्माण जाति-धर्म के बंधन से ऊपर उठकर 12 करोड़ बिहारवासियों के सहयोग से करेगा।

पहले चरण के मतदान से ठीक पहले तेजस्वी द्वारा दिए गए इस बयान से रोज़गार के मुद्दे पर चल रही बहस फिर से जाति पर आकर टिक गई है। उत्तर प्रदेश और बिहार में कहा जाता है कि चुनावों में जाति का सबसे अहम स्थान है। उम्मीदवार चुनने से लेकर उसके जीतने तक की गणित सिर्फ़ जाति पर निर्भर करती है।

फिर आया जाति का जिक्र 

आरजेडी ने जब इस बार 10 लाख रोज़गार की बात कही तो शुरू में इसकी खिल्ली उड़ाने वाली बीजेपी को अपने घोषणा पत्र में 19 लाख रोज़गार देने की बात कहनी पड़ी। पाकिस्तान, जिन्ना, कश्मीर की बात कर रहे बीजेपी के नेता रोज़गार के मुद्दे पर आने के लिए विवश हो ही रहे थे कि तेजस्वी का यह बाबू साहब वाला बयान आ गया। 

देखना होगा कि बीजेपी और जेडीयू ने जिस तरह तेजस्वी के बयान को मुद्दा बना लिया है, उससे क्या किसी तरह की जातीय गोलबंदी होगी। इस तरह के बयान से क्या आरजेडी को फ़ायदा होगा या नुक़सान, ये चुनाव नतीजे आने पर पता चलेगा लेकिन इतना तय है कि रोज़गार के मुद्दे पर दौड़ रहा बिहार का चुनाव एक बार जातियों के दलदल में धंसता दिख रहा है। 

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