पंचानवे साल के एक सिख बुजुर्ग की साँस अटकी हुई है। डिमेंशिया का मरीज़ है और उसकी यादों में बसी है किशोर उम्र की एक मासूम सी मोहब्बत, लौटकर आने का वादा, अपने लोगों से बिछड़ने का ग़म और अपनी मातृभूमि।
 
विभाजन ने उजाड़ दिया तो सरहद के इस पार चले आए जिसे हिंदुस्तान नाम दिया गया था। इस पार बस गए और संघर्षों से गुज़रते हुए एक मुकाम भी हासिल कर लिया, मगर दिल की दुनिया उजाड़ ही रही, वह नहीं बसी तो नहीं ही बसी।

मृत्यु-शैया पर पड़े बुज़ुर्ग की जान अटकी हुई है अपनी मोहब्बत जिया में। वह बस जिया से एक बार मिलना चाहता है, बात करना चाहता है। और जैसे ही वह सरगोधा के उस घर में उससे बात कर लेता है उसे सुकून मिल जाता है और वह प्राण त्याग देता है।

उससे यानी जिया से नहीं, क्योंकि वह तो दस साल पहले उसका इंतज़ार करते-करते मर चुकी है। मगर उसकी बड़ी-सी तस्वीर ही उसे अपनी जिया लगी, ज़िंदा जिया, वही 17-18 साल वाली जिया।
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वह बार-बार सरगोधा का रुख़ करता है। अपने ड्राइवर को धमकाकर बॉर्डर पर भी ले जाता है जहाँ फौजी उसे रोक देते हैं। लेकिन डिमेंशिया के मरीज़ को बँटवारा याद नहीं, सरहद याद नहीं। उसे तो ये पता है कि लाहौर से दो घंटे लगते हैं।

विभाजन के ज़ख़्मों पर मरहम लगाती फ़िल्म

आप इसे नॉस्टेल्जिया कह सकते हैं और है भी। लेकिन ये फ़िल्म केवल इतना नहीं कहती। ये फ़िल्म विभाजन के ज़ख़्मों को एक अलग तरह से कुरेदती भी है और मरहम भी लगाती है। हमें एहसास करवाती है कि ऐसी कितनी कहानियाँ विभाजन की भेंट चढ़ गई होंगी, ऐसे कितने रिश्ते टूट गए होंगे जो बरसों तक त्रासदी बनकर लोगों को सताते रहे होंगे।

इस फ़िल्म को बड़े कैनवास पर देखना चाहिए। ये मानवीय संबंधों की त्रासद दास्तान तो है ही, उस सियासत की परतें भी खोलती है जो मज़हब और राष्ट्रवाद की आड़ में ख़ूनी खेल खेलती है।

फ़िल्म में सांप्रदायिक उन्माद को बहुत संतुलित ढंग से दिखाया गया है और कहीं किसी तरह का पक्षपात नहीं दिखता, जो कि आज के समय में बहुत मुश्किल काम है।

हायपर नेशनलिज़्म के इस दौर में मुसलमानों को खलनायक न दिखाना बड़ी चुनौती भी है और बॉक्स ऑफिस से मुँह मोड़ना भी। लेकिन निर्देशक ने दोनों को बहुत ही सावधानी से साधा है।

अगर यही फ़िल्म विवेक अग्निहोत्री, आदित्य धर, सुदीप्तो सेन या आशुतोष गोवारीकर जैसा कोई निदेशक बनाता तो सोचिए इसका क्या हश्र होता। फिर वह फ़िल्म नहीं होती, हिंदुत्व का प्रोपेगंडा बन जाती।

इसे भी कुछ लोग प्रोपेगंडा बता रहे हैं। अगर एक पल के लिए उनकी दलील को मान भी लें तो ये नफ़रती प्रोपेगंडा का काउंटर प्रोपेगंडा है, मानवता का प्रोपेगंडा है।

नसीरुद्दीन शाह की दमदार एक्टिंग

लेकिन इस फिल्म पर कोई भी टिप्पणी अधूरी रहेगी अगर नसीरुद्दीन शाह की बात न की जाए तो। बिस्तर पर लेटे-लेट वे पूरी फ़िल्म को अपनी गिरफ़्त में ले लेते हैं। हर वेदना, खुशी, भय, अनिश्चितता, आशा-निराशा, ग्लानि, चाहत, गुस्सा, सब कुछ उनके चेहरे पर इस तरह पढ़ा जा सकता है कि इसके अतिरिक्त इस सबकी अभिव्यक्ति कुछ और तरीक़े से हो ही नहीं सकती थी।
अगर मुझे कहने की इज़ाज़त दें तो कहूँगा वे इस समय हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के बेहतरीन अभिनेता हैं। भारत में तो उनकी टक्कर का एक भी अदाकार नहीं है। उनको पाकर हर कैरेक्टर धन्य हो जाता है। ऐसा लगता है कि वह नसीर के लिए ही रचा गया था।

अभिनय जिया और उसके किशोर प्रेमी ने भी बहुत अच्छा किया है। उस कच्ची उम्र का लड़कपन, मासूमियत, भावुकता सब बहुत शिद्दत से स्क्रीन पर आता है। मगर नसीर की तो बात ही और है।

हर फ़िल्म में कमियाँ ढूँढ़ी जा सकती हैं, इसमें भी मिल जाएंगी। कोई भी फ़िल्म पूर्ण नहीं होती। कुछ न कुछ रह ही जाता है कहने को। लेकिन इस फ़िल्म में वो कहानी मुकम्मल होती है जो कहने की कोशिश की गई।
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कुछ लोगों को लगता है कि इसमें सिखों और मुसलमानों की हिंसा दिखाई गई मगर हिंदुओं की नहीं। लेकिन वे भूलते हैं कि ये फ़िल्म बंटवारे पर जितनी नहीं है उतनी एक सिख लड़के और मुस्लिम लड़की की प्रेमकथा पर है।

वे उस दृश्य को भी भूल जाते हैं जिसमें मुसलमान ही मुसलमान पर हमले कर रहे हैं, उनकी औरतों पर अत्याचार कर रहे हैं और एक मुसलमान ही मुस्लिम बलवाई को गोली से उड़ा देता है। विभाजन के हज़ारों रंग हैं मगर एक फ़िल्म की कथा जितने को समेटने की ज़रूरत समझती है, उतना ही समेटे तो बेहतर होता है, अन्यथा पटरी से उतर जाती है।

विभाजन पर ढेरों फ़िल्में बनी हैं। सीरियल बने हैं। तमस और गरम हवा को क्यों भूला जाए। वे भी अपने दौर के मील की पत्थर थे और आज भी उनका महत्व कम नहीं हुआ है। दरअसल, हमें विभाजन को विभिन्न स्तरों पर समझने के लिए बहुत सारे साहित्य और कलाओं की ज़रूरत है। मैं वापस आऊँगा तो उसका एक छोटा सा अंश है- महत्वपूर्ण अंश।